DELHI (SMR) : मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। महान यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने यह कहा था। उन्होंने कहा था- ‘मनुष्य स्वभाव से एक सामाजिक प्राणी है। समाज एक ऐसी चीज है जो व्यक्ति से पहले आती है।’ लेकिन हम यहां बात कर रहे हैं वरीय पत्रकार संजय सिन्हा की। उन्होंने मां, बहन, दीदी, भाई, भाभी, सखी-सखा के बीचे साली के बहाने चुलबुले रिश्ते की मीठी दास्तां लिखी है। साली शब्द आते ही किसी भी उम्र के विवाहित पुरुष के चेहरे खिल जाते हैं। उमंगें कुलांचे भरने लगती हैं। साली से खुशहाली के इस सफर भरे आलेख को वरीय पत्रकार संजय सिन्हा के फेसबुक वाल से अक्षरशः लिया गया है। इसमें उनके निजी विचार हैं। 

साल 2014 में हुए पहले फेसबुक मिलन समारोह में कई रिश्ते सामने आए थे। मां, बहन, दीदी, भाई, भाभी, सखी और सखा और एक साली भी। मथुरा से आई मेरी साली ने खुल कर मंच से ऐलान किया था कि संजय जीजू मैं आपकी साली हूं। सब हंस पड़े थे। आभासी संसार में तरह-तरह के रिश्ते बनते हैं। मां, बहन, भैया तो बहुतों को मिले, लेकिन पहली बार किसी ने मुझे जीजा बनाया था। दिल्ली के नयनतारा फार्म हाउस में हुए उस मिलन समारोह में साली मिली, फिर उसकी शादी हो गई। शादी के बाद वो नए जीवन में इस कदर रम गई कि जीजू को भूल गई। 

वैसे ये कहना सही नहीं। सालियां कभी जीजू को नहीं भूलतीं। बस वो अपने घर में रम जाती हैं फिर उन्हें समय नहीं मिलता। मुझे कोई शिकायत नहीं। मेरे मन में तो पहले मिलन समारोह की कई सुंदर यादें चलचित्र की तरह चलती रहती हैं। पहले मिलन समारोह में कुछ सखियां भी मिली थीं। उन कुछ सखियों ने ऐलान किया था कि वो बहन-वहन नहीं बनेंगी। बनेंगी तो बस सखी। छोटा था तो दीदी की सखियां होती थीं और मेरे दोस्त। हमारे समय में लड़कों की सखियां नहीं होती थीं। जब मैं किशोरावस्था से निकल कर मूंछों वाला हो रहा था तो सिनेमा हॉल में एक फिल्म धमाल मचा रही थी- ‘मैंने प्यार किया’। उस फिल्म के एक डॉयलाग ने हमारी पीढ़ी का बेड़ा पूरी तरह गर्क कर दिया था। फिल्म में मोहनिश बहल सलमान खान और भाग्यश्री की दोस्ती पर तंज मारते हैं कि एक लड़का और लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते हैं। इस एक डॉयलाग ने मेरी पीढ़ी के लड़कों से लड़कियों को सखी बनाने का आधार ही छीन लिया था। इस डॉयलाग के बाद तो एक लड़की जो मेरी सहेली बन ही रही थी, वो दोस्ती को छोड़ कर प्रेम पत्र थमा गई, ये कहते हुए कि लड़का और लड़की दोस्त नहीं हो सकते। प्रेम कर सकते हैं। जाहिर है रिश्ता टूटना था। 

किसी भी रिश्ते में जब ‘आई लव  यू’ आ जाता है तो रिश्ते संभालने मुश्किल हो जाते हैं। मैं इन तीन लफ्जों से मैं बहुत बचता हूं। फिल्म वाले भले नहीं मानते रहे हों लेकिन संजय सिन्हा मानते हैं कि लड़का-लड़की दोस्त भी हो सकते हैं। आप जानते हैं कि अपने देश में मिडिल क्लास सिनेमा से संचालित होता है। मेरी दीदी जब बड़ी हो रही थी तब उसे धर्मेंद्र से प्यार हो गया था। जब बॉबी फिल्म आई तो ऋषि कपूर भा गया था। लेकिन जब संजय सिन्हा बड़े हो रहे थे तब अमिताभ बच्चन छाए थे। वो फिल्मों में प्रेम कम नाराज़ अधिक रहते थे। कभी ईश्वर से, कभी अपने नाजायज बाप से तो कभी उन दुश्मनों से जिन्होंने बचपन में उनका कुछ बिगाड़ा होता था। अपने को अमिताभ बच्चन भा गए थे। तो यही समझिए कि संजय सिन्हा पटना से भोपाल और भोपाल से दिल्ली पहुंच गए बिना किसी खास चक्कर के। ये भी नहीं कहूंगा कि किसी से दोस्ती हुई ही नहीं। पर मामला दोस्ती तक ही सिमटा रहा। 

दिल्ली आया था नाक के नीचे मूंछें आ चुकी थीं। नौकरी भी लग चुकी थी। ये प्रेम करने का सही समय था। जेब में पैसे हों, नाक के नीचे मूंछें हो तो कौन प्रेम नहीं करता? पर अपना मामला अलग था। पता नहीं मैंने क्यों नौकरी करते हुए बचे समय के लिए पढ़ाई में दाखिला ले लिया। पढ़ाई, शाम को नौकरी। उन्हीं दिनों फिल्म आई ‘मैंने प्यार किया’। अब ऐसे में पढ़ाई के दौरान जिससे दोस्ती हुई थी उसने अचानक आई लव यू वाला पत्र लिख कर दे दिया। समझिए उसी दिन रिश्ते पर ग्रहण लग गया। 

पढ़ाई के बाद नौकरी में रम गया और फिर ऑफिस में जैसे ही एक लड़की से दोस्ती हुई उससे शादी हो गई। मतलब सखा-सखी का मामला खत्म हो गया। मुझे यकीन हो गया कि लड़का-लड़की सखा-सखी नहीं हो सकते। लेकिन जब मैं फेसबुक पर आया तो मुझे एक साली मिली और कुछ सखियां भी मिलीं। मुझे याद है कि मैंने पहले मिलन समारोह में मंच से जब ऐलान किया कि फलां ने दावा किया है कि वो आभासी संसार में मेरी पहली सखी हैं तो एक सखी जो पहले से वहां मौजूद थीं, तुरंत रूठ गईं और शाम को ये तंज कसती हुई चली गईं, “संजय जी, पहली सखी तो मैं थी।” सखी-सखी में ईर्ष्या? ईर्ष्या प्रेम का ही एक रूप है। वैसे तो फेसबुक पर बहुत से लोग इश्क, मुहब्बत के चक्कर में भी जुड़ते हैं। लेकिन अपने को तो रिश्तों की तलाश थी। इन आठ वर्षों में कई बार समुद्र मंथन हुआ। और इनसे कई रिश्ते निकलने लगे। ऐसा समय भी आया जब वो स्थाई रिश्ते बने। 

वैसे रिश्तों के इस समुद्र मंथन में कई तरह के लोग मिले। किसी ने किसी को ठग लिया। किसी ने किसी को धोखा दे दिया। किसी ने किसी का इस्तेमाल कर लिया। कई लोग मेरे ऑफिस आए नौकरी पा गए।। कई लोग ऑफिस में फोटो खिंचवा कर चले गए। कई लोगों ने कई लोगों से काम से रिश्ता जोड़ा, कई लोग अपना व्यापार चमका गए। कई लोगों ने फोटो खिंचवा कर इधर-उधर रौब गांठ लिया। सब हुआ। कुछ लोगों ने आरोप लगाए। मैं सब सुनता रहा, देखता रहा। गांधी जी का बंदर बना रहा। न बुरा देखो, न बुरा सुनो, न बुरा कहो। ये जीवन है। जीवन एक सिनेमा। कई रंग, कई दृश्य।

हम साल दर साल हम मिलते रहे। बहुत से रिश्ते बन, बहुत से छूटे। इनमें से जो लोग बिना स्वार्थ के मिलते रहे, उनके रिश्तों की कमाई आज कई गुना होकर उनके पास लौट रही है। रिश्तों की कमाई उन्हीं की लौटती है, जो बिना स्वार्थ के जुड़ते हैं। दरअसल, दुनिया में सिर्फ पैसों का व्यापार ही नहीं बढ़ता, रिश्तों का पौधा भी बढ़ कर वृक्ष बन जाता है। बिना किसी स्वार्थ के, बिना काम के। बस खुश रहने के लिए, खुश रखने के लिए। कहानी शुरु हुई थी साली से, पहुंच गई खुशहाली पर। फिर जीवन का मकसद है खुश रहना। हर पल खुश रहना। चाहे साली को याद करके खुशी मिले या खुशहाली को। आप भी खुश रहें। सभी को खुश रखें। सिर्फ उन्हीं यादों को याद रखें, जिनमें खुशियां हों। खुश आदमी ही खुशी बांट सकता है।

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