PATNA (MR) : कार्तिक माह हिंदू धर्म का सबसे महत्वपूर्ण महीना है। इस महीने में पूरे माह सूर्योदय से पहले स्नान करने की मान्यता है। इसके अलावा इस माह कई त्योहार एक साथ मनाए जाते हैं। छठ पूजा भी कार्तिक महीने में ही होती है। इसके अलावा दिवाली तो होती ही होती है। भले ही कार्तिक माह की अमावस तिथि को एक दिन दिवाली मनाने की परंपरा है, लेकिन इसके साथ पांच पर्व आगे-पीछे जुड़े होते हैं। कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से शुक्ल पक्ष की द्वितीया तक लगातार 5 पर्व होते हैं। शास्त्रों में इन पांच दिनों को यम पंचक कहा गया है। इन पांच दिनों में यमराज, वैद्यराज धन्वंतरि, लक्ष्मी-गणेश, हनुमान, काली और गोवर्धन पूजा का विधान है। यम पंचक में कौन-कौन से 5 पर्व शामिल हैं। 

धनतेरस : दिवाली के दो दिन पहले कार्तिक माह की त्रयोदशी से यम पंचक शुरू होता है। पहले दिन धनतेरस मनाया जाता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा होती है। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का जनक भी कहा जाता है। बता दें कि भगवान धन्वंतरि का जन्म धनतेरस के दिन हुआ था। भगवान विष्णु के 24 अवतारों में भगवान धन्वंतरि का अवतार 12वां ​है। मान्यता है कि देवों और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन का प्रयास शुरू किया, जिसमें से 14 रत्नों की प्राप्ति हुई। इसके लिए मंदार पर्वत को मथानी और वासुकी नाग को मथानी की रस्सी के तौर पर इस्तेमाल किया गया था। यह मंदार पर्वत बिहार के बांका जिले में ही अवस्थित है। इसी समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि का अवतार हुआ था। धनतेरस को यम दीप जलाने के साथ ही नए गहने और बर्तन आदि खरीदने की भी परंपरा है। लोक मान्यता के अनुसार, इस दिन सोने या चांदी के सिक्के अथवा बर्तन खरीदना काफी शुभ माना जाता है। 

नरक चतुर्दशी : अब बात करते हैं नरक चतुर्दशी की। इसे नरक चौदस भी कहा जाता है। नरक चतुर्दशी को यम दीप निकालने की मान्यता है। खासकर बिहार के कई भागों में इस तरह के यम दीप दरवाजे पर निकाले जाते हैं। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार, इस दिन शाम को चार बातियों वाला दीपक घर के बाहर कूड़े के ढेर पर जलाया जाता है। वैसे एक बाती वाला दीपक भी जलाया जाता है और यही दीपक चलन में आ गया है। लेकिन, इसमें ध्यान रखा जाता है कि यह दीपक पुराना हो। इसके पीछे मान्यता यह है कि स्थान चाहे कोई भी हो, शुभता का वास हर जगह होता है। समय विशेष पर उसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है। 

दिवाली : रोशनी पर्व दिवाली के बारे में कहने की जरूरत ही नहीं। इसके बारे में तो हर कोई जानता है कि दीपों का त्योहार दिवाली कार्तिक माह की अमावस को मनाया जाता है। इस यम पंचक में दिवाली तीसरे दिन होती है। दिवाली सनातनी परंपरा में रात में मनाए जाने वाले प्रमुख पर्वों में से एक है। पौराणिक कथा के अनुसार, तीसरी महानिशा में शुमार कालरात्रि का यह महापर्व है। आम लोग इसे दिवाली या दीपावली के नाम से जानते हैं। कहा जाता है कि दिवाली के दिन सूर्यास्त से अगले सूर्योदय के बीच का काल विशेष रूप से प्रभावी होता है। मोहरात्रि, शिवरात्रि, होलिका दहन, शरद पूर्णिमा की भांति ही दीपावली में भी संपूर्ण रात्रि जागरण का विधान है। कालरात्रि वह निशा है, जिसमें तंत्र साधकों के लिए सर्वाधिक अवसर होते है। इसी दिन खासकर बिहार और पश्चिम बंगाल में काली पूजा का भी प्रावधान है। बिहार के मिथिलांचल में दिवाली के दिन काली पूजा भी मनायी जाती है।  दिवाली बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व भी है। दरअसल, भगवान श्री राम ने लंकापति रावण पर विजय प्राप्त की थी और इसी दिन वह 14 साल का वनवास पूरा कर अयोध्या वापस लौटे थे। भगवान राम के वापस आने की खुशी में प्रकाश पर्व दिवाली मनायी गयी थी। कहा जाता है कि जब भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता अयोध्या वापस आए थे तो उनका स्वागत लोगों ने दीप जलाकर किया था, इसलिए दिवाली को मिलन का त्योहार भी कहा जाता है, इस दिन सभी लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं और मिठाई बांटते हैं। 

गोवर्धन पूजा : गोवर्धन पूजा या अन्नकूट दिवाली के अगले दिन मनाई जाती है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन यह पूजा होती है। इस साल गोवर्धन पूजा मंगलवार 25 अक्टूबर, 2022 को है, लेकिन इसी दिन सूर्य ग्रहण भी लगेगा, जिस कारण इस साल गोवर्धन पूजा दिवाली के अगले दिन नहीं, बल्कि बुधवार 26 अक्टूबर 2022 को मनाई जाएगी। यह त्योहार विशेष रूप से श्रीकृष्ण, गौ माता और गोवर्धन पर्वत की पूजा के लिए समर्पित होता है। गोवर्धन पूजा में अन्नकूट बनाए जाते हैं और गोबर से गोवर्धन की आकृति बनाई जाती है। इसके बाद मान्यता के अनुसार पूजा की जाती है। 

भैया दूज : यह पर्व यम पंचक का 5 वां पर्व है। भाई दूज भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक पर्व है। यह पर्व रक्षाबंधन के भी पहले से सनातनी समाज का हिस्सा रहा है। स्कंद पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण दोनों में ही इसकी महत्ता का वर्णन है। इस दिन प्रत्येक भाई का दायित्व है कि वह विवाहित बहन के घर जाए। उसके हाथ का पका भोजन ग्रहण कर सामर्थ के अनुसार द्रव्य, वस्त्र, मिष्ठान्न आदि भेंट करे। यदि बहन अविवाहित और छोटी है तो उसकी इच्छानुसार भेंट दे।

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