FEATURE DESK (APP) : भाई-बहन के प्रमुख त्योहार के बारे में किसी से पूछिये तो एक पंक्ति में सीधा बोल देगा रक्षा बंधन। यह सही भी है, क्योंकि फिल्म से लेकर मार्केट तक का फोकस रक्षाबंधन पर ही रहता है। ऐसे में उससे भी पुराना त्योहार भाई दूज गुम होता जा रहा है, जबकि यह सनातनी के साथ भाई-बहन के अनूठे प्रेम की कहानी है। इसमें भी कई मान्यताएं हैं। देवताओं से भी जुड़े हुए प्रसंग हैं।  ऐसे में आप 5 तथ्यों में भाई दूज से जुड़े प्रसंगों-मान्यताओं को समझ सकते हैं। 

1 दिवाली के दूसरे दिन भाई दूज : हिंदुओं के प्रमुख त्योहार में भाई दूज का भी बहुत महत्व है। इंट्रो में ही हम बता चुके हैं कि यह रक्षा बंधन से काफी पुराना और हिंदू धर्म से जुड़ा हुआ पर्व है। यह हर साल दिवाली के दूसरे दिन आता है। आप कह सकते हैं कि यह यम पंचक का अंतिम त्योहार है। स्कंद पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण दोनों में ही इसकी महत्ता का वर्णन है। इस दिन हर भाई का दायित्व है कि वह विवाहित बहन के घर जाएं। वे अपनी बहन के हाथ का पका भोजन ग्रहण कर सामर्थ्य के अनुसार उन्हें यथाशक्ति सोने- चांदी के गहने, कपडे़, मिठाई आदि भेंट करे। यदि बहन अविवाहित और छोटी है तो उसकी इच्छानुसार उसे भेंट दे। इस मौके पर बहन अपने भाई को तिलक कर उसकी लंबी उम्र के लिए हाथ जोड़कर यमराज से प्रार्थना भी करती है।  स्कंदपुराण में यह भी लिखा है कि इस दिन पूजन करने से भाई की उम्र लंबी होती है। 

2 बजरी खिलाने की है परंपरा : भाई दूज को लोक भाषा में गोधन पूजा भी कहा जाता है। इस दिन बहनें अपने भाई को बजरी कूट कर खिलाती है। खासकर बिहार के मिथिलांचल से लेकर भोजपुर तक इस परंपरा को काफी संजीदगी से निभाया जाता है। अब तो पटना से लेकर पूर्व बिहार तक में इस पर्व का फैलाव हो गया है। एक समय था, जब सनातन धर्म में भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का प्रतीक के रूप में केवल भाई दूज का ही त्योहार था। हम यहां बात कर रहे थे बजरी खिलाने की। बजरी मटर का ही छोटा रूप है। बहनें इसे कूटकर अपने भाई को खिलाती हैं, ताकि उसका भाई बज्र जैसा मजबूत हो। मिथिलांचल में बहनें यह भी कहती हैं कि वे गंगा-यमुना नहीं अपने भाई को न्यौता दे रही हैं और भगवान उसके भाई को हर कष्ट से बचाए। उसे सांप, बाघ से भी बचाए। सांप-बाघ के पीछे लोग यही मानते हैं कि शुरुआती दौर में चारों तरफ केवल जंगल था। तब लोगों को सांप-बाघ से काफी डर लगा रहता था और यह पर्व की परंपरा चली आ रही है।  

3 यम-यमुना की कहानी : भाई दूज का पर्व यम-यमुना की कहानी से भी जुड़ा है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान सूर्य नारायण और संज्ञा की दो संतानें- एक पुत्र यमराज और दूसरी पुत्री यमुना थी, मगर एक समय ऐसा आया, जब संज्ञा सूर्य का तेज सहन कर पाने में असमर्थ होने के कारण उत्तरी ध्रुव में छाया बनकर रहने लगी। इसके कारण ताप्ती नदी और शनिदेव का जन्म हुआ। उत्तरी ध्रुव में बसने के बाद संज्ञा (छाया) का यम व यमुना के साथ व्यवहार में अंतर आ गया। इससे व्यथित होकर यम ने अपनी नगरी यमपुरी बसाई। वहीं यमुना अपने भाई यम को यमपुरी में पापियों को दंड देते देख दु:खी होती, इसलिए वह गोलोक में निवास करने लगीं। लेकिन यम और यमुना दोनों भाई-बहन में बहुत स्नेह था।  एक दिन अचानक यमुना को अपने भाई यम की याद आई। कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया के दिन यमुना ने भाई यमराज को भोजन के लिए निमंत्रण देकर उन्हें अपने घर आने के लिए वचनबद्ध कर लिया। ऐसे में यमराज ने सोचा कि मैं तो प्राणों को हरने वाला हूं, मुझे कोई भी अपने घर नहीं बुलाना चाहता, इसलिए बहन जिस सद्भावना से मुझे बुला रही है, उसका पालन करना मेरा धर्म है। बहन के घर आते समय यमराज ने नरक निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया। यमराज को अपने घर आया देखकर यमुना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।  

4 यमुना ने मांगा था वरदान : अब बात करते हैं यमुना के वरदान की। यमुना ने अपने भाई यमराज से वरदान मांगा था। दरअसल, यमुना ने स्नान के बाद पूजन करके, स्वादिष्ट व्यंजन परोसकर यमराज को भोजन कराया। यमुना द्वारा किए गए इस आतिथ्य से यमराज ने प्रसन्न होकर बहन को वर मांगने का आदेश दिया। इस पर यमुना ने कहा कि, ‘हे भद्र! आप प्रति वर्ष इसी दिन मेरे घर आया करो और मेरी तरह जो बहन इस दिन अपने भाई को आदर-सत्कार करके टीका करे, उसे तुम्हारा भय न रहे।’ कहा जाता है कि यह वरदान सुनकर यमराज पहले तो सोच में पड़ गया, लेकिन वचन वाली बात थी। उन्होंने अपनी बहन से वरदान मांगने को खुद कहा था। ऐसे में वे अपनी बहन को कैसे निराश कर सकते थे। सो, यमराज ने तथास्तु कहकर अपनी बहन यमुना को वरदान पूरा होने की बात कही। इतना ही नही नहीं, यमराज ने बहन यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण आदि भी दिया। इसके बाद वे यमलोक की ओर प्रस्थान कर गए। कहा जाता है कि तभी से इस दिन से ये पर्व मनाने की परंपरा चली आ रही है। इसी कारण ऐसी मान्यता है कि भाई दूज के दिन यमराज तथा यमुना का पूजन भी अवश्य करना चाहिए।  

5 यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है भाई दूज : भाई दूज को लोग यम द्वितीया के नाम से भी जानते हैं। दरअसल, यमराज से जुड़ा यह पर्व है और कार्तिक माह की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है, इसलिए भाई दूज के साथ ही इसे यम द्वितीया भी कहा जाने लगा है। वहीं धर्म ग्रंथों के अनुसार, कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन यमुना ने अपने भाई यम को आदर-सत्कार स्वरूप वरदान प्राप्त किया था, जिस वजह से इसे यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है। दरअसल यमराज के वर के अनुसार जो व्यक्ति इस दिन यमुना में स्नान करके यम का पूजन करेगा, मृत्यु के पश्चात उसे यमलोक में नहीं जाना पड़ता है। वहीं सूर्य की पुत्री यमुना समस्त कष्टों का निवारण करने वाली देवी स्वरूपा मानी गई हैं। इस कारण यम द्वितीया के दिन यमुना नदी में स्नान करने और यमुना व यमराज की पूजा करने का विशेष महत्व है। इस दिन बहन अपने भाई को तिलक कर उसकी लंबी उम्र के लिए हाथ जोड़कर यमराज से प्रार्थना भी करती हैं। पुराणों के अनुसार, इस दिन की गई पूजा से यमराज प्रसन्न होकर मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।

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