स्मृति शेष : सखुए के दोने में रखी मिठास, हटिया चौक की भोर और मोहन साव; स्मृतियों में डूबा हवेली खड़गपुर

Mukhiyajee Reporter | Haveli Kharagpur

सखुए के पत्ते का दोना, बांस की छोटी-सी डलिया और हटिया चौक की भोर में उठती गरम जलेबी की खुशबू। हवेली खड़गपुर के हलवाई मोहन साव अब नहीं रहे, पर उनकी दुकान की मिठास आज भी लोगों की स्मृतियों में घुली है। छह दशक से अधिक समय तक एक ही जगह दुकान चलाने वाले मोहन साव केवल दुकानदार नहीं थे, वे हटिया के रोजमर्रा के जीवन का एक पड़ाव थे। वरीय पत्रकार भारतीय बसंत कुमार ने उन्हें याद करते हुए लिखा है कि पुराने अखबार बेचकर खरीदी गयी वह जलेबी आज की किसी महंगी मिठाई से ज्यादा स्वादिष्ट थी। पढ़िए उनका यह स्मरण…

किसी अपने के चले जाने पर सबसे पहले उसकी कोई बड़ी उपलब्धि याद नहीं आती। याद आती है कोई छोटी-सी बात। उसकी आवाज, उसका चेहरा, दुकान का एक कोना, किसी चीज की खुशबू या बचपन का कोई ऐसा दृश्य, जिसके बारे में तब कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन वही हमारी सबसे कीमती स्मृति बन जाएगा। हटिया चौक के हलवाई मोहन साव जी के जाने की खबर सुनकर मेरे मन में अनेक स्मृतियां पसर गयीं। गरम जलेबी की वह खुशबू, हटिया चौक की वह दुकान, बांस की छोटी-सी डलिया और सखुए के पत्ते का दोना। जैसे अचानक बहुत पीछे छूट गया और अपना ही कोई समय सामने आ खड़ा हुआ हो। हमारे घर में जब भी जलेबी आती थी, मोहन साव जी के यहां से ही आती थी। हम लोग पुराने अखबार बेचते थे। उस समय पुराने अखबार बेचकर मिले पैसे भी अपने आप में बहुत बड़ी चीज थे। उन पैसों को लेकर एक खास उत्साह होता था कि अब इनसे क्या खरीदा जाए। लेकिन हमारे लिए फैसला लगभग तय रहता था। मनोज भैया के नेतृत्व में सबसे पहले मोहन साव जी की दुकान से जलेबी खरीदी जाती थी।

स्व मोहन साव का फाइल फोटो

आज लगता है, वह जलेबी कितनी साधारण चीज थी और उससे जुड़ी हमारी खुशी कितनी बड़ी। पुराने अखबारों की कीमत से खरीदी गयी वह मिठाई शायद आज की किसी महंगी मिठाई से कहीं अधिक स्वादिष्ट थी, क्योंकि उसमें हमारे बचपन की पूरी दुनिया घुली हुई थी। बांस की डलिया। सखुए के पत्ते का दोना। चारों ओर सुतली का घेरा। वह डलिया भी कुछ ऐसी तिकोनी-सी, जैसे कोई टीप हो। आज के सुंदर डिब्बों में मिठाई शायद ज्यादा सुरक्षित रहती होगी, लेकिन उन दिनों की उस साधारण पैकिंग में जो अपनापन था, वह आज भी मन को छूता है। मोहन साव जी की दुकान को याद करता हूं तो लगता है कि वह केवल मिठाई की दुकान नहीं थी। वह हटिया के रोजमर्रा के जीवन का एक छोटा-सा पड़ाव थी। हर सुबह घर बनाने वाले मिस्त्री और मजदूर वहां चाय पीने आते थे। दिन भर की मेहनत शुरू करने से पहले चाय का वह छोटा-सा ठिकाना। कौन जानता है, उनकी उन सुबहों में कितनी बातें हुई होंगी, कितनी योजनाएं बनी होंगी, कितनी चिंताएं कुछ देर के लिए किनारे रखी गयी होंगी। उनकी दुकान पर हर आने वाला केवल ग्राहक नहीं था।

कभी कोई साधु आ जाता तो मोहन जी कई बार उसे बिना पैसे लिए चाय पिला देते। उस समय शायद इसे कोई विशेष बात मानकर दर्ज नहीं किया जाता था। उनके लिए यह सहज था। लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि यही छोटी-छोटी बातें किसी आदमी का असली परिचय बनाती हैं। बाबूजी (सेवानिवृत प्रिंसिपल) के कॉलेज में जब कोई समारोह या एनएसएस का शिविर होता, या मेरे घर कोई अतिथि आते, तो इसी दुकान की मिठाई परोसी जाती थी। पहले का फूस और छप्पर बहुत साल हुए बदल चुका है, अब पक्की दुकान है, पर मेरी स्मृति में अब भी कोयला-लकड़ी का बड़ा-सा चूल्हा, काली कड़ाही और भारी-भरकम कलछुल तैरता है। उनके भीतर दुकानदारी के साथ-साथ एक घरेलू-सा अपनापन था। आईबी रोड के लोगों के साथ उनका रिश्ता भी केवल दुकानदार और ग्राहक का नहीं था। लंबे समय के परिचय ने उस संबंध को पारिवारिक बना दिया था। छह दशक से अधिक समय तक एक ही जगह दुकान चलाना कोई मामूली बात नहीं है। इतने वर्षों में उन्होंने केवल मिठाई नहीं बेची होगी; उन्होंने लोगों को बदलते देखा होगा, परिवारों को बढ़ते देखा होगा, बच्चों को बड़ा होते देखा होगा और एक पीढ़ी को दूसरी पीढ़ी में बदलते देखा होगा। हमारी अपनी स्मृतियों में भी वे इसी तरह धीरे-धीरे शामिल हो गए।

मोहन साव की कद-काठी की एक स्थिर-सी तस्वीर मन में है। जैसे समय उनके आसपास बदलता रहा, लेकिन मोहन साव अपनी जगह वैसे ही बने रहे। हटिया चौक के उस पुराने दृश्य में उनकी दुकान और उनका चेहरा किसी स्थायी निशान की तरह था। तब हमें क्या पता था कि ये दृश्य एक दिन इतने महत्वपूर्ण हो जाएंगे। बचपन में हम यह नहीं सोचते कि किसी दुकान पर खड़े इस आदमी को हम वर्षों बाद याद करेंगे। हमें तो बस जलेबी चाहिए थी। कितनी छोटी थीं तब हमारी खुशियां और कितना बड़ा था उनका संसार। आज जब वह संसार पीछे छूट चुका है, तब समझ में आता है कि मोहन साव जैसे लोग हमारे जीवन में कितनी चुपचाप जगह बनाते हैं। वे कोई बड़ी भूमिका निभाने का दावा नहीं करते। वे बस अपना काम करते हैं; हर सुबह दुकान खोलते हैं, चाय बनाते हैं, जलेबी तलते हैं, लोगों को मिठाई देते हैं, किसी मजदूर को चाय पिलाते हैं, किसी साधु को बिना पैसे चाय दे देते हैं और इसी तरह देखते-देखते कई दशक बीत जाते हैं। लेकिन इसी साधारण जीवन के बीच वे हमारे जीवन की असाधारण स्मृतियां बना जाते हैं।

बहरहाल, आज मोहन साव नहीं हैं। लेकिन शायद कुछ लोग अपने जाने के बाद भी पूरी तरह नहीं जाते। वे हमारी आदतों, हमारी बातचीत और हमारी स्मृतियों में रह जाते हैं। अब कभी जलेबी सामने आएगी तो शायद उसका स्वाद पहले जैसा नहीं लगेगा। अनायास मन हटिया चौक की तरफ चला जाएगा। आंखों के सामने वह दुकान आएगी। बांस की डलिया दिखाई देगी। सखुए का दोना दिखाई देगा। मोहन साव भी दिखाई देंगे, फिर याद आएगा कि पुराने अखबार बेचकर मिले उन पैसों से खरीदी गयी जलेबी कितनी बड़ी खुशी हुआ करती थी। उनकी दुकान अब भले उस रूप में न हो, वे हमारे बीच न हों, लेकिन हमारे बचपन की उस गली में, हटिया चौक की उन सुबहों में और जलेबी की उस खुशबू में वे हमेशा मिलते रहेंगे। यही किसी आदमी के जीवन की सबसे बड़ी कमाई है कि उसके जाने के बाद भी लोग उसे केवल याद न करें, बल्कि उसे अपने जीवन के किसी खूबसूरत हिस्से में फिर से पा लें। मोहन साव जी को विनम्र, आत्मीय और भावपूर्ण श्रद्धांजलि। आपकी जलेबी की मिठास में हमारा बचपन हमेशा जीवित रहेगा। और अंत में दो और बातें… दो साल पहले अपने बेटे वाग्यम को उनकी दुकान पर ले गया था। तब उन्होंने सब कुछ छोड़कर नन्हे वाग्यम को बहुत कुछ खिलाने का प्रयास किया था। और मेरे कपीन चा जब जीवित थे, तब एक बार चाय पीने इस दुकान तक आते ही थे।