टूटा नहीं है मन का संकल्प। गौरीकान्त चौधरी “कान्त” की पुण्यतिथि पर उनके पुत्र डॉ. लक्ष्मीकान्त सजल ने इस रिपोर्ट में अपनी यादों को पिरोया है। आज (हिंदी दैनिक) से साभार।

बाबू जी (गौरीकान्त चौधरी “कान्त”) पंचतत्व में विलीन हो चुके थे। समस्तीपुर जिले के अपने गांव नीरपुर-मुजौना में घर के ठीक सामने वाले बगीचे के दक्षिणी-पश्चिमी कोने पर। अपनी अंत्येष्टि के लिए जगह वे जीते जी तय कर गये थे। उन्होंने एक दिन पहले 29 दिसंबर को रात के दूसरे पहर में पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान के स्पेशल वार्ड के आठ नम्बर कमरे में अंतिम सांस ली थी। उस समय वे बिहार सरकार की मैथिली अकादमी के अध्यक्ष थे। आकाशवाणी, पटना से अवकाश प्राप्त करने के बाद राज्य सरकार ने उन्हें अध्यक्ष के पद पर नियुक्त किया था। वे आकाशवाणी, पटना से प्रसारित होने वाले “चौपाल” कार्यक्रम के मुखिया जी के रूप में तीन दशक से भी अधिक समय तक लोकप्रिय रहे।

स्मारक के रूप में बन गयी पहचान

अंत्येष्टि में शामिल लोगों की राय बनी कि अंत्येष्टि-स्थल पर मुखिया जी की मूर्ति लगे। यह जिम्मेदारी मुझे दी गयी। मैंने मन-ही-मन तय किया कि बाबू जी की मूर्ति कांस्य की होगी। प्रतिमा में वे पालथी मार कर बैठे हुए होंगे, वैसे ही जैसे “चौपाल” बैठा करते थे। पर, बाबू जी की चिकित्सा और उनके श्राद्ध कर्म के बाद मैं आर्थिक रूप से पूरी तरह से टूट चुका था। ऐसे में मूर्ति तुरंत लगाना मेरे लिए संभव नहीं था। पर, उनकी पहली पुण्य तिथि पर मूर्ति के लिए प्लेटफॉर्म तैयार हो गया। ढलाई से खड़ी पिलर चारों तरफ से पांच-पांच फीट चौड़ी और जमीन से पांच फीट ऊंची है। बीच में खाली चौकोर चिकनी माटी से भर दिये गये। उसमें तुलसी के पौधे लहलहा उठे। बगल में कनेर का एक पेड़ भी निकल आया। उसके पीले-पीले फूल उस पर गिरने लगे। उसकी पहचान स्मारक के रूप में बन गयी।

समय के तो पंख होते हैं

समय के तो पंख होते हैं। अपनी धुरी पर उसकी अपनी गति है। जो उस गति में समय के साथ नहीं चल पाते, पीछे छूटते चले जाते हैं। अपने अनुकूल वक्त के इंतजार में। वक्त थोड़ा अनुकूल हुआ, तो जाने-माने मूर्तिकार जयनारायण सिंह के पास पहुंचा। बाबू जी की मूर्ति बनाने के लिए वे तैयार हो गये। कुछ ही दिनों में प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्ति तैैैयार हो गयी। मेरे साथ गयी बिटिया ऐश्वर्या तो दूर से देखते ही खुशी से चिल्ला पड़ी- बाबा ! अब, कांस्य प्रतिमा बनाने के लिए प्लास्टर ऑफ पेरिस की बनी मूर्ति से ढांचे का निर्माण होना था। लेकिन, नियति को तो कुछ और ही मंजूर था। मैं गंभीर रूप से बीमार होकर कोमा में चला गया। पता नहीं पटना में पीएमसीएच में था या गुड़गांव के मेदांता में। पल भर के लिए चेतना लौटी, तो लगा कि इस दुनिया से जा तो रहा हूं, पर वहां जाकर बाबू जी को क्या जवाब दूंगा। उनसे जुड़े तीन काम मुझे करने थे और मैं तीनों छोड़ कर जा रहा था।न गया में पिंड देने के पुत्रधर्म का निर्वाह किया था, न मूर्ति लग पायी थी और न ही उनकी अनूदित कृति “मधुशाला” का प्रकाशन ही हो पाया था। लेकिन, चाहने वालों की दुआ और उनकी मदद की वजह से यमराज का रास्ता रोक कर जिंदगी खड़ी हो गयी। मैं जिंदा बच तो गया, पर जिंदगी कर्ज में डूबी हुई थी। ठीक से चल-फिर पाऊं, इसमें साल भर से ज्यादा लग गये। पर, घाव भरा नहीं था। पेट के अंदर से मवाद और खून रिस-रिस कर बाहर आ ही रहा था। उसी हालत में पितृपक्ष में गया जाकर पितरों को पिंड दे आया। अब, मूर्ति की बारी थी। लेकिन, इसके लिए पहले कर्ज से उबरना जरूरी था।

थोड़ी देर के लिए हो गया हताश

कर्ज के बोझ से मुक्ति की सांस मिलते ही मैं पहुंच गया जयनारायण बाबू के वर्कशॉप में। वहां पहुंचते ही मैं हताश हो गया। इसलिए कि, कांस्य प्रतिमा के लिए ढांचा बनने के पहले ही बाबू जी की प्लास्टर ऑफ पेरिस वाली मूर्ति टूट चुकी थी। लम्बे अंतराल की वजह से शायद उन्हें लगा होगा कि मैं इस दुनिया में रहा नहीं। और, मूर्ति भी तो माटी की थी नहीं। जब मांटी की मूरत के मोल होते हैं, तो कांस्य की प्रतिमा कौन ले जाता भला ? मुझे किंकर्तव्यविमूढ़ देख जयनारायण बाबू को बहुत अफसोस हुआ। उन्होंने मुझे दिलासा देते हुए कहा कि बउआ चिंता मत करिये, वैसी ही दूसरी मूर्ति बना देंगे। लेकिन, बाबू जी मूर्ति बना पाते, उसके पहले ही वे बीमार पड़ गये। फिर, एक दिन मुझ तक यह खबर पहुंची कि जयनारायण बाबू नहीं रहे। उनके चले जाने की खबर से मुझे अपनी उम्मीद टूटती दिखाई देने लगी। उनके श्राद्धकर्म के बाद एक दिन जब उनके वर्कशॉप में पहुंचा, तो टूटती उम्मीद को भरोसा मिला। देखा कि, जयनारायण बाबू की वैसी ही कांस्य प्रतिमा तैयार है, जैसी वे बाबू जी की बनाने वाले थे। जयनारायण बाबू के बेटे नन्दकिशोर और शिष्य सुभाष वर्कशॉप को संभाल चुके थे। नन्दकिशोर जी ने जयनारायण बाबू की कांस्य प्रतिमा दिखाते हुए मुझे कहा कि चाचा जी की मूर्ति भी ऐसी ही बनायेंगे भइया! मेरा भरोसा और मजबूत हो गया।
पर, भरोसे को उड़ान मिलने के पहले ही कोरोनाकाल के आगमन की दस्तक पड़ चुकी थी। महीनों के लॉकडाउन के बाद जब अनलॉक शुरू हुआ, तो फिर वर्कशॉप पहुंचा। पर, सुभाष जी अपने गांव में ही फंसे हुए थे। नन्दकिशोर जी भी उन्हीं के आने के इंतजार में थे। इस बीच चौरचन (चकचन्दा) में जब गांव गया, तो हर बार की तरह उपेंद्र भैया मिले। उपेंद्र भैया हमारे पंचायत के मुखिया हैं। उनका पूरा नाम है उपेंद्र पाठक।

मुखिया जी की पहली पुण्यतिथि पर मूर्ति के लिए प्लेटफॉर्म तैयार हो गया। खाली चौकोर चिकनी माटी से भर दिये गये। उसमें तुलसी के पौधे लहलहा उठे। बगल में कनेर का एक पेड़ भी निकल आया। उसके पीले-पीले फूल उस पर गिरने लगे।

मूर्ति की बात चली, तो उन्होंने कहा कि तुम झूठा हो। उन्होंने मुझे इसलिये झूठा कहा कि इतने साल जो गुजर गये थे। जब मैंने मूर्ति बनने से टूटने तक की कहानी सुनायी, तो उनकी आंखें भर आयीं। सिर्फ उपेंद्र भैया ही नहीं, जब भी गांव जाता हूं, तो लोग यह पूछे बिना नहीं रहते कि मुखिया जी की मूर्ति का क्या हुआ ? कई लोग तो भावना में बह कर यह तक कह जाते हैं कि मुखिया जी की मूर्ति लगा देते, तो मरने से पहले देख लेते। उलाहना से लेकर हैसियत और धिक्कार तक के स्वर। उन स्वरों में मेरे मन की पीड़ा मन में ही दबी की दबी रह जाती।

छलक पड़ीं मेरी आंखें

मन ही मन मैंने योजना बनायी थी। इस साल बाबू जी पुण्यतिथि पर उनकी कांस्य प्रतिमा लगाने की। पर, मन की बात मन में ही रह गयी। इतना जरूर है कि मन का संकल्प टूटा नहीं है। फिर से बन गयी है बाबू जी की प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्ति। यह मूर्ति बिल्कुल वैसी ही है, जैसी जयनारायण बाबू ने बनायी थी। सुभाष जी बोले कि चेहरा तैयार है। अब चेहरे को माटी से पैक करेंगे। जब पैक खोलेंगे, तो हाथ-पैर को अंतिम टच देंगे। उसके बाद बनायेंगे वह ढांचा, जिससे बनेगी कांसे की मूर्ति। मैं तो बस प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी बाबू जी की मूर्ति की आंखों में झांक रहा था।उन आंखों में झांकते हुए छलक पड़ीं मेरी आंखें।

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