PATNA (MR) : खेती से आज युवा पीढ़ी भाग रही है। कहने पर टका-सा जवाब मिलता है, ‘अब कौन जाए खेत पर, कहां हल-बैल चलाया जाए’ और भी कितनी बातें सुना देता है। सब्जी के मामले में कमोबेश यही जवाब मिलता है। लेकिन मशरूम की खेती ने एक नई क्रांति ला दी है। घर बैठे खाने के लायक भी उपजा सकते हैं और कमाने के लायक भी। 

बिहार के नालंदा में रहने वाले सुजीत कुमार ने ऐसा कर दिखाया। उन्होंने अमल किया और अभी महज आंशिक शुरुआत में मिली सफलता से वे गदगद हैं। उन्होंने इसे सोशल मीडिया पर भी शेयर किया है। उन्होंने लिखा है- ‘गाँव हर किसी को कुछ नया  सीखने का अवसर देता है। मुझे भी दिया है। इसे समय काटना भी कहा जा सकता है या तो  रोजगार की तलाश भी मान सकते हैं।’

वे आगे लिखते हैं- ‘महज 20 दिन पहले  प्रयोग के तौर पर अपने 10×10 के छोटे कमरे में मशरूम की खेती शुरू की थी। बहुत आसान था, क्योंकि न तो किसी खेत में जाने की जरूरत थी और  न ही कुदाल चलाने की। गेहूं का कट्टू घर में था और पास के शहर में मशरूम का Spon (बीज) मिल गया था। खुशी के साथ यह बता रहा हूं कि आज करीब 2 किलो मशरूम हर दिन तोड़ रहा हूं। उत्पादन भी जारी है और उम्मीद है कि जल्द ही उसी 10×10 कमरे से हर दिन उत्पादन  5 किलो होगा। ‘ 

दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में किसानों का रुझान मशरूम की खेती की तरफ तेजी से बढ़ा है। मशरूम की खेती बेहतर आमदनी का जरिया बन सकती है। बस कुछ बातों का ध्यान रखना होता है। बाजार में मशरूम का अच्छा दाम मिल जाता है। अलग-अलग राज्यों में किसान मशरूम की खेती से अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। बिहार के जिलों में भी इसकी खेती जोर पकड़ने लगी है। 

नालंदा में घर में उपजाए गए मशरूम।

उन्होंने मुखियाजी डॉट कॉम को बताया कि मशरूम की खेती में कम जगह और कम समय के साथ ही पूंजी भी बहुत कम लगती है, जबकि इनकम से उससे कई गुना ज्यादा मिल जाती है। मशरूम की खेती के लिए लोग किसी भी कृषि विज्ञान केंद्र या फिर कृषि विश्वविद्यालय में प्रशिक्षण ले सकते हैं। इसकी खेती करने वाले किसानों से भी सीखा जा सकता है। वे कहते हैं, इस खेती को आप वर्क फ्रॉम होम भी कह सकते हैं। कोरोना काल में इससे बढ़िया और क्या हो सकता है। सेफ लाइफ अर्न इनकम है मशरूम की खेती। 

नालंदा में मशरूम की खेती करते सुजीत कुमार।

गौरतलब है कि विश्व में मशरूम की खेती हजारों वर्षों से की जा रही है, जबकि भारत में मशरूम के उत्पादन का इतिहास लगभग तीन दशक पुराना है। भारत में 10-12 वर्षों से मशरूम के उत्पादन में इजाफा देखा जा रहा है। बिहार में भी कुछ ऐसी ही स्थिति है। हालांकि हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना आदि की तरह बिहार में अभी व्यापारिक स्तर पर इसकी खेती नहीं पहुंची है। भारतीय वातावरण में मुख्य रूप से पांच प्रकार के मशरूम उपजाए जा रहे हैं। इनमें सफेद बटन, ढींगरी (ऑयस्टर), दूधिया, पैडीस्ट्रा व शिटाके मशरूम प्रमुख हैं।

प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, खनिज लवण और विटामिन जैसे उच्च स्तरीय खाद्य मूल्यों के कारण मशरूम पूरी दुनिया में मशरूम का विशेष महत्व है। भारत में मशरूम को खुम्भ, खुम्भी, भमोड़ी और गुच्छी आदि नाम से भी जाना जाता है। देश में बेहतरीन पौष्टिक खाद्य के रूप में मशरूम का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा मशरूम के पापड़, जिम का सप्लीमेन्ट्री पाउडर, अचार, बिस्किट, टोस्ट, कूकीज, नूडल्स, जैम (अंजीर मशरूम), सॉस, सूप, खीर, ब्रेड, चिप्स, सेव, चकली आदि बनाए जाते हैं।

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