PATNA / ODISHA (APP) : 2024 की लड़ाई के लिए नीतीश कुमार ने पूरी तरह कमर कस ली है। विपक्षी एकता को देश के लेवल पर और अधिक मजबूत करने के लिए उन्होंने एक कदम और बढ़ाया। उन्होंने आज ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से मुलाकात की। यह विपक्षी एकता के लिए नीतीश कुमार का 5वां कदम है। नवीन पटनायक से पहले नीतीश कुमार ने राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी और अखिलेश यादव से मुलाकात की थी। लेकिन, जिस तरह बाकी चारों ने नीतीश कुमार से मुलाकात के बाद जोश दिखाया और मीडिया के साथ संयुक्त रूप से संबोधन किया। वैसा जोश ओडिशा में नहीं दिखा। इतना ही नहीं, दोनों नेता जब संयुक्त रूप से मीडिया के सामने आए, तो किसी ने भी महागठबंधन पर पत्ता नहीं खोला। पुरानी दोस्ती की बातें कहकर निकल गए।

दोनों ही सियासत के धुरंधर खिलाड़ी : दरअसल, नीतीश कुमार और नवीन पटनायक आज की तारीख में दोनों ही सियासत के धुरंधर खिलाड़ी हैं और दोनों ही जनता के साथ ही विरोधियों की भी नब्ज पकड़ने में माहिर हैं। ऐसे में इस मुलाकात पर पूरे देश की नजर टिकी हुई थी। साथ ही नीतीश कुमार की तरह नवीन पटनायक भी दो दशक से अधिक समय से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कब्जा जमाए हुए हैं। नीतीश कुमार 2005 से तो नवीन पटनायक 2004 से लगातार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हैं और जनता के बीच नीतीश कुमार से ज्यादा पॉपुलर नवीन पटनायक आज भी हैं। ऐसे में उनसे तुरंत बोलने की उम्मीद भी नहीं थी। वे भी नीतीश कुमार की तरह एक समय में एनडीए में ही थे। बाद में वे अलग हो गए, इसके बाद भी उनका नरेंद्र मोदी से बहुत अच्छा संबंध है। यही वजह है कि दोनों ही नेता यह बताने से परहेज किया कि किस मुद्दे पर बातें हुईं। मीडिया के सामने जब दोनों आए तो पहले नीतीश कुमार ने कहा, ‘हम लोगों का संबंध बहुत गहरा है, इसे कोई पॉलिटिकल मुलाकात मत समझिए, बाकी लोगों के साथ हमारे रिश्ते की तुलना मत कीजिए, हमारी किसी भी तरह के गठबंधन के बारे में कोई बात नहीं हुई है’। इसी बात को नवीन पटनायक ने भी दोहराया। समझा जाता है कि स्थानीय पॉलिटिक्स की वजह से नवीन पटनायक ने भी बड़ा बयान देने से परहेज किया।

कांग्रेस से असली लड़ाई : यह तो आप जानते ही हैं कि ओडिशा में बीजू जनता दल की सरकार है। इस पार्टी के सर्वेसवा नवीन पटनायक हैं। ओडिशा में उनकी असली लड़ाई कांग्रेस से है। जब नवीन पटनायक एनडीए में थे, तब भी उनकी लड़ाई कांग्रेस से थी और जब वे एनडीए से अलग हो गए, तब भी उनकी लड़ाई कांग्रेस से ही है और अब तो वहां उनकी लड़ाई बीजेपी से भी होने लगी है। ऐसे में अचानक से महागठबंधन के लिए बोल देना उनके लिए संभव नहीं हुआ। सियासी पंडित भी मानते हैं कि चुनाव होने में अभी समय है, ऐसे में यह संभव है कि दो-तीन मीटिंग के बाद तस्वीर सामने आ जाए और फिर नवीन पटनायक कुछ बड़ा दांव लेकर मैदान में आएं, इसलिए उन्होंने महागठबंधन पर फिलहाल पत्ता खोलने से बचते रहे।

जनता के मूड को भांपना चाहते हैं पटनायक : नवीन पटनायक के बारे में कहा जाता है कि वे ओडिशा पॉलिटिक्स के बड़े जादूगर हैं। वे न तो उड़िया लिखना जानते हैं और न ही बोलना जानते हैं। इसके बाद भी नवीन पटनायक वहां के लोगों के दिलों में बसते हैं। उन पर भी व्यक्तिगत किसी तरह के घोटाले का आरोप नहीं हैं। वे वहां के जननायक हैं। पॉलिटिकल एक्सपर्ट की मानें तो बीजेपी भी अब वहां पैठ बनाने लगी है। 2019 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में देखने को मिला भी। 2019 के विधानसभा चुनाव में ओडिशा में कुल 146 विधानसभा सीटों में से बीजू जनता दल को 112 तो बीजेपी को 23 सीटें आयी थीं, जबकि कांग्रेस को 9 सीटें मिली थीं। वहीं 2014 में बीजू जनता दल को 117, कांग्रेस को 16 और बीजेपी को 10 सीटें हासिल हुई थीं। इससे पता चलता है कि बीजेपी का विस्तार हो रहा है। ऐसे में महागठबंधन में निर्णय लेने से पहले जनता के मूड को भांपने चाहते हैं।

लोकसभा-विधानसभा का चुनावी समीकरण : ओडिशा का एक चुनावी समीकरण यह भी है कि वहां लोकसभा और विधानसभा चुनाव लगभग एक साथ ही होते हैं और 2004 से ही नवीन पटनायक लगातार मुख्यमंत्री बनते आ रहे हैं। इसके पीछे का राजनीतिशास्त्र समझिए। 2014 और 2019 में मोदी लहर के बाद भी नवीन पटनायक के ग्राफ में कमी नहीं आयी। वहीं बीजेपी के भी कद मजबूत हुए, इससे भी किसी को इनकार नहीं है। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को ओडिशा में कुल 21 में से सिर्फ एक सीट मिली थी, जबकि 2019 में उसकी सीटें बढ़कर 8 हो गयीं। दूसरी ओर, कांग्रेस भी फायदे में रही थी, जबकि नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल की सीटें 20 से घटकर 12 हो गयीं। ऐसे में वह नहीं चाहते हैं कि जल्दबाजी में कोई ऐसा कदम उठा लें, जिससे लोकसभा के चक्कर में उन्हें विधानसभा चुनाव में कोई घाटा हो।

सियासी बंधन को और परखना चाहते हैं : बहरहाल, पत्ता नहीं खोले जाने के पीछे एक कारण यह भी नवीन पटनायक महागठबंधन में आने वाले नेताओं को परखना भी चाहते हैं। दरअसल, ओडिशा में नवीन पटनायक की असली लड़ाई कांग्रेस से है, यह तो आप जानते ही हैं। ऐसे में वे अभी महागठबंधन के सियासी बंधन को और परखना चाहते हैं, ताकि उन्हें पता चल जाए कि महागठबंधन में आने वाले दलों की नीयत साफ है या नहीं ? वे नजदीक से देखना चाहते हैं कि राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव के महागठबंधन में रहते बीजू जनता दल को कितना फायदा और कितना नुकसान होगा ?

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