PATNA (APP) : आनंद मोहन की रिहाई के खिलाफ आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी. कृष्णैया हत्यांकाड में अप्रैल के पिछले पखवारे में उनकी रिहाई हुई थी। दरअसल, इस रिहाई के खिलाफ जी. कृष्णैया की पत्नी उमा देवी सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगायी हैं। इसे लेकर भी सियासी गलियारे में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। इसके पीछे बीजेपी को दोषी ठहराया जा रहा है। बीजेपी के कई बड़े नेता आनंद मोहन की रिहाई को गलत ठहरा रहे हैं, वहीं बीजेपी के ही कुछ नेता बोलने से बच रहे हैं। इन सबके बाद भी आज भी युवा आनंद मोहन के दीवाने हैं। आइए यहां पर हम आपको आनंद मोहन की उन 5 प्रमुख कहानियों को बताते हैं, जो फ्लैशबैक से लिये गये हैं।

  1. इस तरह आए पॉलिटिक्स में : आनंद मोहन छात्र जीवन में ही सियासी गलियारे में आ गए थे। उसी समय से इनकी पॉलिटिक्स शुरू हो गयी थी। आज भी लोगों को विश्वास नहीं होता है कि ये बाहुबली कैसे बन गए ? गलत रास्ते पर कैसे आ गए ? दरअसल, इनका जन्म 26 जनवरी 1956 को सहरसा जिले के पचगछिया गांव में हुआ था। इनके दादा राम बहादुर सिंह एक बड़े स्वतंत्रता सेनानी थे। उसी परिवेश में ये पले-बढ़े। 1974 में जब बिहार में जेपी के नेतृत्व में छात्र आंदोलन शुरू हुआ तो उस समय इनकी उम्र ठीक से 18 साल भी नहीं हुई थी। इन्होंने आंदोलन में भाग लिया। इमरजेंसी के समय इन्हें 2 साल जेल में रहना पड़ा था। यहीं से इनका पॉलिटिकल कॅरियर शुरू हुआ।
  2. बेटा भी अब विधायक बन गया : आनंद मोहन की अब नेक्स्ट पीढ़ी भी पॉलिटिक्स में आ गयी है। इनके बड़े बेटे चेतन आनंद शिवहर से आरजेडी विधायक हैं। पत्नी लवली आनंद सांसद रह चुकी हैं। खुद आनंद मोहन भी सांसद रह चुके हैं। यही वजह है कि आनंद मोहन की अब पॉलिटिकल फैमिली में गिनती होने लगी है। बता दें कि आनंद मोहन की शादी 13 मार्च 1991 को लवली सिंह के साथ हुई थी। बाद में पत्नी ने अपने नाम में आनंद शब्द जोड़ लिया था। शादी के तीन साल बाद 1994 में लवली आनंद ने भी सियासी गलियारे में एंट्री की। उसी साल वैशाली लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में इन्हें सफलता मिली। एक दौर था, जब आनंद मोहन से ज्यादा भीड़ लवली आनंद की चुनावी सभाओं में जुटने लगी थी।
  3. पप्पू यादव से तब खूब थी दुश्मनी : एक समय था, जब पप्पू यादव से आनंद मोहन की जबर्दस्त दुश्मनी थी, लेकिन अब दोनों अच्छे दोस्त बन गए हैं। दरअसल, आनंद मोहन और पप्पू यादव आज भी सियासत के दो बड़े नाम हैं। और 90 के दशक में भी इन दोनों का कद काफी बड़ा था। खास बात कि दोनों ही कोसी क्षेत्र के हैं, और उस जमाने में भी दोनों की तूती बोलती थी। सीमांचल से लेकर कोसी तक में इन दोनों को वर्चस्व था। वर्चस्व को लेकर खूब तनातनी होती रहती थी। खूब गोलियां भी चलती थीं। लेकिन, अब पहले वाली बात नहीं रही। समय के बहाव में दोनों अब दोस्त बन गए हैं। आनंद मोहन की बेटी सुरभि आनंद और बेटे चेतन आनंद दोनों की शादी में पप्पू यादव पहुंचे थे। फिर तो गर्मजोशी से दोनों का मिलन हुआ था।
  4. 5 दिसंबर 1994 की वो काली तारीख : 5 दिसंबर 1994 आनंद मोहन के लिए यह काली तारीख थी, जो उनके जीवन में आयी। दरसल, इस वारदात के एक दिन पहले गैंगस्टर छोटन शुक्ला की हत्या कर दी गयी थी। इसे लेकर आनंद मोहन और उनके समर्थक काफी आक्रोशित थे। उसी समय जी कृष्णैया मुजफ्फरपुर में बैठक निबटाकर गोपालगंज लौट रहे थे। लाल बत्ती वाली कार देखकर भीड़ काफी हिंसक हो गयी थी। और उसी भीड़ की हिंसा के डीएम साहब शिकार हो गए। इस हत्या मामले में आनंद मोहन दोषी करार दिए गए। इन्हें फांसी की सजा सुनाई गई थी। आजाद भारत में पहली बार किसी नेता को फांसी की सजा सुनाई गई थी। बाद में यह सजा उम्रकैद में तब्दील हुई। 15 साल से अधिक समय तक जेल की सजा काट लेने के बाद अब बिहार सरकार ने परिहार के आधार पर इन्हें रिहा कर दिया है। लेकिन, इस रिहाई के खिलाफ जी कृष्णैया की पत्नी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गयी हैं।
  5. रॉबिन हुड वाली छवि आज भी बरकरार : आनंद मोहन में रॉबिन हुड वाली छवि आज भी बरकरार है। ये युवाओं के बीच आज भी काफी लोक​प्रिय हैं। यही वजह रही कि जब तक आनंद माहन जेल में रहे, युवा उनकी रिहाई को लेकर लगातार आंदोलन चलाते रहे। पैरोल पर जब भी बाहर निकले तो उनके समर्थक काफी संख्या में पहुंच गए। आज भी ये राजपूत समाज के बड़े नेता माने जाते हैं। तभी तो ये किसी भी जिला में जाते हैं, रास्ते में जगह-जगह युवा स्वागत में खड़े रहते हैं। इनकी लोकप्रियता से ही घबराकर रिहा वाले दिन इन्हें जेल से अहले सुबह ही रिहाई दे दी गयी, ताकि अप्रत्याशित भीड़ से कोई प्रॉब्लम नहीं हो।
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