तिरुक्कुरल पर व्यापक विमर्श, वक्ताओं ने कहा- भारतीय ज्ञान-परंपरा में नैतिकता, मानवीयता और जीवन- मूल्यों का अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज है यह कृति

Mukhiyajee Reporter | Mohit from Shanti Niketan

विश्वभारती के तमिल भाषा इकाई एवं मराठी भाषा इकाई के संयुक्त तत्वावधान में सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ क्लासिकल तमिल (CICT), चेन्नई के सहयोग से संत कवि तिरुवल्लुर की कालजयी कृति ‘तिरुक्कुरल’ पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं प्रदर्शनी का आयोजन 7 एवं 8 अक्टूबर को किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य तिरुक्कुरल के साहित्यिक, दार्शनिक, सामाजिक-सांस्कृतिक एवं समकालीन महत्व पर व्यापक विमर्श करना था। इसका शुभारंभ प्रदर्शनी के उद्घाटन से हुआ। इसके पश्चात संगोष्ठी का आरंभ मंगलाचरण के साथ किया गया। स्वागत भाषण मराठी भाषा के अध्यापक डॉ. रणवीर सुमेध भगवान ने दिया। उन्होंने आगत अतिथियों एवं विद्वानों का स्वागत करते हुए तिरुवल्लुवर की रचनाओं की कालजयी महत्ता और उनकी सार्वभौमिक स्वीकार्यता के कारणों पर प्रकाश डाला।

विश्वभारती के कुलसचिव डॉ. विकास मुखोपाध्याय ने उद्घाटन भाषण में तिरुक्कुरल के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह कृति भारतीय ज्ञान-परंपरा में नैतिकता, मानवीयता और जीवन- मूल्यों का अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज है। वाराणसी से पधारे डॉ. जगदीसन टी. ने मुख्य वक्तव्य में तिरुक्कुरल की विषय-वस्तु, दर्शन तथा उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका पर विस्तार से विचार किया। लातूर से मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित प्रो. श्रीकांत गायकवाड़ ने भी तिरुक्कुरल की समकालीन प्रासंगिकता पर अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर एक महत्वपूर्ण साहित्यिक उपलब्धि के रूप में ओड़िया विभाग के अध्यापक डॉ. शरत जेना द्वारा हिंदी में रचित पुस्तक ‘ओड़िया उपन्यास में नारी नायक’ का लोकार्पण विश्वभारती के कर्मसचिव, भाषा भवन के प्राचार्य तथा उपस्थित विद्वानों के कर-कमलों से संपन्न हुआ। अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. मृणाल कांति मंडल ने रवींद्रनाथ ठाकुर की इस ज्ञानभूमि पर तिरुक्कुरल जैसी सार्वभौमिक महत्त्व की कृति को केंद्र में रखकर आयोजित कार्यक्रम की सार्थकता और महत्त्व को रेखांकित किया। धन्यवाद ज्ञापन के क्रम में डॉ. सेंथिल प्रकाश एस. ने तिरुक्कुरल में निहित सार्वभौमिक ज्ञान, नैतिक मूल्यों और उसकी समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। विमर्श के दौरान दर्शनशास्त्र विभाग के डॉ. मुरुगेसन ए. ने तिरुवल्लुवर के दार्शनिक पक्ष पर विचार प्रस्तुत किए। प्रो. हरिश्चंद्र मिश्र ने तिरुक्कुरल के भोजपुरी अनुवाद के अपने अनुभव साझा करते हुए इसकी भाषा और भावों की सहजता पर चर्चा की।

संगोष्ठी के दूसरे दिन भी तिरुक्कुरल के विभिन्न आयामों पर विद्वानों एवं शोधार्थियों ने अपने विचार प्रस्तुत किए। डॉ. अमरेंद्र कुमार एवं डॉ. जगदीश ने तिरुक्कुरल में निहित मानवीयता के संदेश को रेखांकित करते हुए कहा कि इसमें मनुष्य के आचरण की शुद्धता और नैतिक जीवन पर विशेष बल दिया गया है। डॉ. शरत जेना ने तिरुक्कुरल के ओड़िया अनुवाद की प्रक्रिया तथा उसमें निहित मूल भावों को रेखांकित किया। डॉ. सुकेश लोहार ने तिरुक्कुरल में वर्णित श्रेष्ठ राजा के गुणों पर चर्चा करते हुए कहा कि राजा को जनकल्याणकारी नीतियों का निर्माता और लोकहित के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए। डॉ. अर्जुन कुमार ने तिरुक्कुरल में निरूपित आदर्शों को तिरुवल्लुवर के व्यावहारिक जीवनानुभव का प्रतिबिंब बताते हुए उसके जीवनोपयोगी पक्ष पर प्रकाश डाला। इसके अतिरिक्त डॉ. नोरबू ग्यालत्सेन नेगी, बोदी बास्की, डॉ. विष्णु पद पाल, आलोक पटुआ, सुश्री गीतारानी, सुश्री मोनालिसा सहित अनेक वक्ताओं ने तिरुक्कुरल के विभिन्न पक्षों पर अपने शोधपत्र एवं विचार प्रस्तुत किए। सत्र का समापन प्रो. मृणाल कांति मंडल एवं डॉ. निमाई चंद साहा के शुभकामना संदेशों के साथ हुआ। अंत में मराठी भाषा इकाई के अध्यापक डॉ. रणवीर सुमेध भगवान ने सभी अतिथियों, विद्वानों, शोधार्थियों एवं आयोजन से जुड़े सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम के विभिन्न सत्रों का संचालन डॉ. शिबनाथ डूटा, आलोक पटुआ, सुश्री शिखा बेहरा, सुश्री अदिति मंडल एवं सुश्री मोनालिसा ने किया।