PATNA / DELHI (APP) : मिशन 2024 की समां बंधने लगी है। चुनाव में अभी लगभग दो साल है। लेकिन 2024 में फतह की जोरदार तैयारी शुरू हो गई है। तमाम राजनीतिक दलों का शंखनाद भी होने लगा है। बीजेपी की ओर से अमित शाह तो विरोधियों की ओर से नीतीश कुमार ने घेराबंदी शुरू कर दी है। नीतीश कुमार की ओर से लालू यादव भी बैटिंग कर रहे हैं। समय के साथ इसमें धार भी आने लगी है। सियासी गरजा-गरजी भी उसी अंदाज में होने लगी है। हालांकि, विरो​धी की ओर से लीड कौन करेंगे। इसकी तस्वीर अभी धुंधली है। लेकिन, बिहार से आरजेडी और जेडीयू ने केंद्र की बीजेपी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए कमर कस ली है। 

विराधियों में अभी लालू यादव और नीतीश कुमार के साथ केसीआर, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, नवीन पटनायक, जगमोहन रेड्डी, उद्धव ठाकरे समेत कांग्रेस को एक प्लेटफॉर्म पर आना बाकी है और इन सबको एक मंच पर लाना मतलब कि तराजू पर मेढक तौलने के समान है, लेकिन, इन सबके बीच बीजेपी यूपी मॉडल तो लालू-नीतीश बिहार मॉडल पर बात कर रहे हैं और इसी मॉडल से 2024 में फतह की तैयारी चल रही है। 

दरअसल, आरजेडी के देश भर के नेताओं का जमावड़ा दिल्ली में दो दिनों तक लगा रहा। पहला दिन 9 अक्टूबर को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई तो दूसरे दिन 9 अक्टूबर को खुला अधिवेशन हुआ। राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर एक बार फिर लालू यादव काबिज हो गए। फिर से उनकी ताजपोशी कर दी गई। राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में लालू यादव समेत तेजस्वी यादव ने सभी विरोधियों से एकजुट होने की अपील की और सबसे बड़ी बात कि इसमें ‘बिहार मॉडल’ को प्राथमिकता देने की बात कही गयी। तेजस्वी यादव ने कहा, ‘महागठबंधन के ‘बिहार मॉडल’ को देश भर में चलाया जाएगा और इसी मॉडल से 2024 में बीजेपी को केंद्र से उखाड़ फेंका जाएगा।’ उन्होंने यह भी कहा, ‘दिल्ली की सत्ता में काबिज लोगों के शह पर देश में गंगा-जमुनी विरासत को समाप्त करने और उन्माद फैलाने का माहौल बनाया जा रहा है।’ आरजेडी की बैठक में प्रस्ताव पास कर राजनीतिक, आर्थिक और विदेश मामलों संबंधी प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। इसके अलावा अधिवेशन में बीजेपी से लेकर नरेंद्र मोदी को भी खूब सुनाया। 

लेकिन, यहां पर हम बात कर रहे हैं बिहार मॉडल और यूपी मॉडल की। दरअसल, बीजेपी ‘यूपी मॉडल’ से 2024 को जीतना चाह रही है तो महागठबंधन ‘बिहार मॉडल’ का डंका बजाना चाह रहा है। यानी इस बार बिहार मॉडल वर्सेज यूपी मॉडल के बीच जमकर सियासी मारामारी होने वाली है। बता दें कि नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू बहुत पहले से ‘बिहार मॉडल’ की बात कहते आ रहा है और यही वजह है कि इस बार बिहार को ही राजनीति की प्रयोगशाला बनाया जा रहा है। बीजेपी के चाणक्य समझे जाने वाले अमित शाह का बिहार दौरा लगातार हो रहा है। महज 20 दिनों में ही वे दो बार बिहार आ चुके हैं। 

पहले यह बताते हैं कि यूपी मॉडल और बिहार मॉडल है क्या? दरअयल, यूपी मॉडल का राग अलापते बीजेपी वाले अघा नहीं रहे हैं। यूपी में लगातार दूसरी बार योगी सरकार सत्ता में आयी है। योगी आदित्यनाथ के कार्यों की बीजेपी काफी सराहना कर रही है और वह चाहती है कि योगी सरकार के कामकाज को पेश कर बिहार समेत अन्य प्रदेशों में बीजेपी का परचम लहराया जाए। यही वजह थी कि जब बिहार में नीतीश कुमार एनडीए सरकार के मुख्यमंत्री थे, तब भी बीजेपी के कई विधायक बिहार में यूपी मॉडल और योगी मॉडल लागू करने की बात करते थे और उस समय भी जेडीयू के नेता पलटवार करते हुए कहते थे कि यहां बिहार मॉडल और नीतीश मॉडल ही लागू होगा। जेडीयू नीतीश कुमार के कामोें के जरिए आगे बढ़ना चाहता है और अब तो जेडीयू महागठबंधन में शामिल हो गया है। इस तरह, नीतीश कुमार को लालू यादव व तेजस्वी यादव का भी साथ मिल गया और ​वे बिहार मॉडल के जरिए 2024 में नए मोर्चे की सरकार बनाने की जुगत में लग गए हैं। 

पॉलिटिकल पंडित की मानें तो बिहार में भाजपा आत्मनिर्भर होने के लिए इस बार पूरी तरह तैयार है। बता दें कि 23 और 24 सितंबर को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का बिहार दौरा हुआ था। इसी के साथ बीजेपी का अभियान औपचारिक तौर पर शुरू हो गया था। इसके बाद वे फिर जेपी की जयंती पर बिहार आए। इस बार उनके साथ यूपी मॉडल के हीरो योगी आदित्य नाथ भी थे। लेकिन अमित शाह ने पिछले ही दौरे में मिशन 2024 के लिए नेताओं और कार्यकर्ताओं को भरपूर टास्क दे दिए हैं। उन्होंने सीमांचल दौरे के दौरान अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने की कोशिश की, वहीं बड़े नेताओं को टिप्स भी दिए। पूर्णिया की रैली के बाद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने किशनगंज में कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की और उनसे संवाद भी किए थे। कार्यकर्ताओं को अपना बूथ सबसे मजबूत के नारे को धरातल पर लाने की जिम्मेदारी दी।   

इतना ही नहीं, अमित शाह ने बिहार के हर बीजेपी सांसद को अपने संसदीय क्षेत्र के अलावा 5 विधानसभा क्षेत्रों की जिम्मेदारी उठाने को कहा था। विधानसभा क्षेत्र में व्याप्त तमाम तरह की समस्याओं को सुलझाने का जिम्मा सांसद के कंधे पर दिया। पॉलिटिकल पंडित की मानें तो उत्तर प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में जिस तरीके से बीजेपी ने चार दलों के गठबंधन को हराकर मजबूत सरकार बनाई थी, उसी तरीके से बिहार में भी पार्टी ने ब्लू प्रिंट तैयार किया है। सीमांचल से अभियान की शुरुआत करने के पीछे लक्ष्य है कि सीमांचल में अल्पसंख्यकों के अंदर पसमांदा आबादी सबसे ज्यादा है और पार्टी उस वोट बैंक को साध कर लालू यादव के वोट बैंक में सेंधमारी करना। 

इधर, महागठबंधन बीजेपी को परास्त करने के लिए बिहार मॉडल अपना रहा है। दिल्ली में आरजेडी की दोदिवसीय बैठक में भी इस पर जोर दिया गया है। दूसरी ओर, यूपी में भी सपा गठबंधन इसी बात पर जोर दे रहा है। दरअसल, 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस ने हाथ मिलाया, लेकिन भाजपा नहीं रुकी। 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा ने धुर विरोधी बसपा को गले लगाया, लेकिन मोदी लहर में सब ढेर हो गया। चुनाव बाद दोनों गठबंधन टूटे, हार का ठीकरा एक-दूसरे के सिर पर फोड़ा। ‘सियासी दोस्त’ फिर बैरी हो गए, लेकिन राजनीति में न दोस्ती स्थायी होती है और न ही दुश्मनी स्थायी होती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में फिर से दुश्मन के दुश्मन दोस्त बनकर एकजुट हो सकते हैं, बिहार के तख्तापलट ने इस सुगबुगाहट के बीच उत्तर प्रदेश में बो दिए हैं। संभावना जताई जा रही है कि सीटों के बंटवारे का पेंच न फंसा तो भगवा आंधी को रोकने के लिए ‘बिहार मॉडल’ पर सपा, बसपा या कांग्रेस के साथ दूसरे छोटे दलों को साथ लेकर तीसरा मोर्चा खड़ा कर सकती है। 

पॉलिटिकल पंडित की मानें तो जब से बिहार में जेडीयू, आरजेडी, कांग्रेस और अन्य दलों ने एकजुट होकर बीजेपी को सत्ता से बेदखल किया है, तब से यूपी में भी यह संभावना जताई जाने लगी है कि उसी तर्ज पर 2024 में लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा के खिलाफ तीसरा मोर्चा खड़ा हो सकता है। इसमें सपा के साथ बसपा या कांग्रेस के अलावा रालोद, अपना दल कमेरावादी, जेडीयू समेत अन्य दल शामिल हो सकते हैं। 

उधर, जेडीयू का दावा है कि बिहार में बना सात दलों का यह गठबंधन सिर्फ बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक बड़ा रोल मॉडल बनेगा। इसी आधार पर साल 2024 का पूरा रोड मैप तैयार किया जाएगा। फिलहाल अभी यह कहना तो जल्दी होगा कि कौन से राजनीतिक दलों के साथ कब-कब बैठकें होंगी, लेकिन यह तय है कि जल्द ही प्रमुख विपक्षी दलों की बैठक में आगे होने वाले चुनावों की पूरी रणनीति तैयार की जाएगी। पॉलिटिकल एक्सपर्ट भी मानते हैं कि बीजेपी से अलग होने के बाद जेडीयू जिस तरह से आक्रामक होकर न सिर्फ केंद्र सरकार पर हमलावर है, बल्कि कांग्रेस जैसे तमाम बड़े राजनैतिक विपक्षी दलों को एकजुट कर आगे बढ़ने के लिए भी योजनाएं बनाने में जुट गया है और जेडीयू के इस अभियान में आरजेडी खुलकर बैटिंग कर रहा है। इसी को लेकर पिछले दिनों लालू यादव ने नीतीश कुमार के साथ सोनिया गांधी से मुलाकात भी की थी। 

बहरहाल, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पिछले दिनों दिल्ली और हरियाणा में खुलकर कह दिया कि यदि सभी दल 2024 में एक प्लेटफॉर्म पर आ जाएं तो रिजल्ट देखने लायक होगा। इससे बीजेपी हारेगी ही नहीं बल्कि बुरी तरह हारेगी। केंद्र से बीजेपी की सरकार उखड़ जाएगी। ऐसे में सभी दलों को मेन मोर्चे में आना ही होगा। यह बाद में तय कर लेंगे कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा। हमलोगों का एकमात्र उद्देश्य है कि किसी तरह बीजेपी को पराजित किया जाना। जब बीजेपी पराजित होगी, तभी गरीबों की सरकार बनेगी। किसानों की अपनी सरकार होगी। अब देखना दिलचस्प होगा कि आगे देश की राजनीति कौन-सा रूख अपनाती है, लेकिन बिहार मॉडल तभी बाजी मारेगा, जब सभी विरोधी एक मंच पर आएंगे। वरना यूपी मॉडल को आगे बढ़ते देर नहीं लगेगी। 

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