Mukhiyajee Reporter | Patna
बिहार के मुंगेर जिले से जुड़ी एक ऐसी खबर सामने आयी है, जिसने वैज्ञानिक जगत के साथ-साथ इतिहास और पर्यावरण से जुड़े लोगों का भी ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। मुंगेर स्थित आईटीसी (ITC) परिसर में खड़ा विशालकाय वटवृक्ष अब दुनिया के सबसे पुराने जीवित वटवृक्षों में शामिल हो गया है। वैज्ञानिक जांच में इसकी आयु 700 वर्ष से अधिक आंकी गयी है। यदि यह निष्कर्ष व्यापक वैज्ञानिक समुदाय द्वारा अंतिम रूप से स्वीकार किया जाता है, तो यह वृक्ष विश्व के सबसे पुराने ज्ञात जीवित बरगदों में एक विशेष स्थान प्राप्त करेगा। हालांकि 800 वर्ष पुराना वटवृक्ष तेलंगना के महबूब नगर में है।
ऐसी ही खबरों को पढ़ने के लिए देखते रहें मुखियाजी डॉट कॉम
लखनऊ स्थित बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने अत्याधुनिक रेडियोकार्बन डेटिंग तकनीक के माध्यम से इस वृक्ष का अध्ययन किया। इसमें उसे लगभग तीन वर्ष लगे। दरअसल, बरगद के पेड़ों में सामान्य वृक्षों की तरह वार्षिक वलय (Annual Rings) स्पष्ट रूप से नहीं बनते, इसलिए उनकी आयु निर्धारित करना हमेशा चुनौतीपूर्ण माना जाता है। वैज्ञानिकों ने वृक्ष के पुराने तनों और जटाओं के नमूनों की जांच की, जिसके बाद प्राप्त परिणामों ने शोधकर्ताओं को भी आश्चर्यचकित कर दिया। अध्ययन के अनुसार, इस वटवृक्ष की आयु लगभग 700 वर्ष से अधिक है। इस खोज का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि अब तक The Great Banyan को दुनिया के सबसे प्रसिद्ध और प्राचीन बरगदों में गिना जाता रहा है। मुंगेर के इस वटवृक्ष की वैज्ञानिक आयु निर्धारण ने इसे वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है।
इतिहास के दृष्टिकोण से देखें तो यह वृक्ष केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि समय का जीवित दस्तावेज है। जब इसकी जड़ें धरती में फैलनी शुरू हुई होंगी, तब भारत में दिल्ली सल्तनत का दौर था। इसके बाद इस वृक्ष ने मुगल साम्राज्य का उदय और पतन देखा, अंग्रेजी शासन की स्थापना देखी, स्वतंत्रता संग्राम की गूंज सुनी और स्वतंत्र भारत के निर्माण का भी साक्षी बना। 700 वर्षों के दौरान न जाने कितनी पीढ़ियां आयीं और चली गयीं, लेकिन यह वटवृक्ष आज भी अपनी विशाल शाखाओं और जटाओं के साथ अडिग खड़ा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी लंबी आयु वाले वृक्ष केवल प्राकृतिक धरोहर नहीं होते, बल्कि वे किसी क्षेत्र की जैव विविधता, जलवायु इतिहास और पारिस्थितिक संतुलन के महत्वपूर्ण संकेतक भी होते हैं। ऐसे वृक्षों का संरक्षण केवल स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी भी है।

बहरहाल, मुंगेर का यह वटवृक्ष बिहार के लिए गर्व का विषय है। यह उस भूमि की पहचान को और मजबूत करता है, जिसने प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक ज्ञान, संस्कृति, इतिहास और प्रकृति की अनेक अनमोल धरोहरों को संजोकर रखा है। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से जूझ रही है, तब 700 वर्षों से जीवित यह वटवृक्ष मानवता को प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण का संदेश देता हुआ दिखाई देता है। कहना गलत नहीं होगा कि मुंगेर का यह वटवृक्ष केवल बिहार का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की साझा विरासत है, एक ऐसी जीवित धरोहर, जिसकी छांव में इतिहास की सात सदियां सांस लेती रही हैं और आगे भी लेती रहेंगी।







