संस्कृत शिक्षा को मजबूत बनाने पर गंभीर मंथन, विधान पार्षद जीवन कुमार ने की शिक्षकों-कर्मियों की समस्याओं पर चर्चा

Rajesh Thakur | Patna

गया शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के विधान पार्षद जीवन कुमार ने संस्कृत शिक्षा व्यवस्था को अधिक सुदृढ़, आधुनिक और रोजगारोन्मुख बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की है। उन्होंने अपने सरकारी आवास (शिक्षक सदन) स्थित कार्यालय में शिक्षाविद डॉ एसके सुनील के साथ विस्तृत चर्चा की। बैठक में बिहार में प्रस्तावित ‘संस्कृत विद्यालय 1994 नियमावली’ तथा ‘1976 नियमावली’ के विभिन्न प्रावधानों पर गंभीरता से विचार-विमर्श किया गया। चर्चा के दौरान संस्कृत विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों एवं शिक्षकेत्तर कर्मियों की सेवा शर्तों, उनके अधिकारों एवं सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर विशेष रूप से मंथन हुआ। साथ ही विद्यालयों के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने तथा संस्कृत शिक्षा को वर्तमान समय की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करने के उपायों पर भी विचार किया गया।

विधान पार्षद जीवन कुमार ने कहा कि संस्कृत शिक्षा भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्वपूर्ण धरोहर है और इसे समयानुकूल बनाकर नयी पीढ़ी के लिए अधिक उपयोगी एवं रोजगारपरक बनाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि संस्कृत विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों और कर्मियों के हितों की रक्षा के साथ-साथ संस्थानों की शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार भी समय की मांग है। ज्ञात हो कि जीवन कुमार लंबे समय से बिहार के सरकारी शिक्षकों की समस्याओं को लेकर सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। वे नियमित रूप से अपने निर्वाचन क्षेत्र के शिक्षकों से संवाद करते हैं, विद्यालयों का दौरा कर जमीनी स्थिति का आकलन करते हैं तथा शिक्षकों की समस्याओं को संबंधित विभाग और सरकार के समक्ष मजबूती से उठाते हैं। विधान मंडल के सत्र के दौरान भी वे शिक्षा और शिक्षक हितों से जुड़े मुद्दों को सदन में प्रमुखता से रखते रहे हैं।

दरअसल, यह चर्चा ऐसे समय में हुई है, जब हाल ही में बिहार के शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने राज्य के संस्कृत विद्यालयों और मदरसों की सरकारी स्तर पर जांच कराए जाने की बात कही है। ऐसे में संस्कृत शिक्षा व्यवस्था, विद्यालय प्रबंधन और वहां कार्यरत शिक्षकों-कर्मियों की स्थिति को लेकर शुरू हुई यह गंभीर विमर्श भविष्य की नीति निर्माण प्रक्रिया में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। बहरहाल, शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि संस्कृत विद्यालयों की समस्याओं का समुचित समाधान किया जाता है और उन्हें आधुनिक शैक्षणिक संसाधनों से जोड़ा जाता है, तो राज्य में संस्कृत शिक्षा को नयी दिशा और नयी पहचान मिल सकती है।