————– विनय कुमार ————
(लॉकडाउन में पारले जी के बहाने बचपन की सैर… यह संस्मरण विनय कुमार ने अपने फेसबुक पोस्ट पर लिखा है। यह उनके निजी विचार हैं। वाराणसी के रहने वाले लेखक विनय बैंककर्मी हैं और उनमें साहित्य के प्रति रूझान है। उनका काव्य संग्रह भी आया हुआ है। कभी काव्य संग्रह पर भी चर्चा होगी। अभी बस ‘पारले जी’ पर )

पारले जी के बहाने बचपन की सैर
इस लॉकडाउन के चलते लगभग हर इंडस्ट्री की हालत पतली हो गयी है और इनके लिए अस्तित्व बरकरार रखने की लड़ाई चल रही है। शायद ही कोई उद्योग-धंधा हो जो यह कह सके कि इस वैश्विक महामारी के दौर में उसने अपना खर्च भी वसूला है, मुनाफे की बात तो दरकिनार है, लेकिन इसी बीच पिछले दिनों यह खबर आयी कि इस लॉकडाउन में ‘पारले जी’ बिस्किट ने बिक्री के नए कीर्तिमान स्थापित किये हैं। एकबारगी तो यकीन नहीं हुआ कि भला इस समय में ऐसा कैसे संभव है, लेकिन फिर याद आया कि जब गरीबों के लिए खाने के लाले पड़े थे तो उनको सबसे आसानी से और सबसे किफायत में जो चीज उपलब्ध थी, वह बिस्किट ही तो थी।

बिस्किट की बिक्री बढ़ना स्वाभाविक ही था
ऐसे में बिस्किट की बिक्री बढ़ना स्वाभाविक ही था और यही हुआ। न सिर्फ मजदूरों ने अपने जीवन को बचाने के लिए ‘पारले जी’ खरीदकर खाया, बल्कि सरकार और अन्य कल्याणकारी संस्थाओं ने भी गरीबों और मजदूरों के लिए सबसे आसानी से उपलब्ध बिस्किट ‘पारले जी’ ही ख़रीदा। इसी वजह से ‘पारले जी’ ने इस लॉकडाउन में अपना मार्केट शेयर भी लगभग 5% बढ़ा लिया।

पिछले दरवाजे से दौड़ जाते थे पारले जी लाने
बिस्किट की बात अगर होती है तो सबसे पहले जो नाम जेहन में आता है, वह ‘पारले जी’ ही है। कुछ नाम चीजों के पर्याय बन जाते हैं, जैसे एक समय वनस्पति का मतलब ‘डालडा’ होता था, डिटर्जेंट पाउडर का मतलब मतलब ‘निरमा’ होता था, उसी तरह बिस्किट का मतलब भी ‘पारले जी’ होता था। अगर हम अपने बचपन को याद करें तो मीठे के नाम पर या लड्डू, बर्फी होती थी और या ‘पारले जी’। घर में आये मेहमान के लिए पहले तो गुड़ हुआ करता था, लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, गुड़ की जगह बिस्किट ने ले ली। कई बार ऐसा होता था कि घर पर कोई मेहमान आये हैं और बिस्किट ख़त्म हो गया है। फिर हम लोगों को पिछले दरवाजे से दौड़ाया जाता था कि जाओ बिस्किट लेकर आओ, और हम दुकान पर बिस्किट न मांगकर ‘पारले जी’ ही मांगते थे।

स्वाद में भी राजा
बिस्किट में भी कई प्रकार हुआ करते थे जैसे सादा और सस्ता वाला बिस्किट जो सुदूर गांवों में आसानी से उपलब्ध था। उसका स्वाद भले अच्छा नहीं होता था, लेकिन एक संतुष्टि जरूर होती थी कि बिस्किट खाया है। क्रीम वाले बिस्किट भी मिलते थे, जो महंगे होने के चलते बड़े घरों में ही ख़रीदे जाते थे, लेकिन इन सब में जो सबसे मशहूर नाम था, वह था ‘पारले जी’। यह कीमत में सस्ते वाले से महंगा था, लेकिन क्रीम वाले से सस्ता। अगर स्वाद की बात करें तो शायद ही इससे बेहतर स्वाद किसी और बिस्किट में मिलता हो।

अपनी मिट्टी से भी जोड़ता है
हमलोग उस दौर में औसतन 15 से 20 किमी साइकिल आराम से चलाते थे और एक ‘पारले जी’ का पैकेट काफी हुआ करता था हमारे लिए। कभी-कभी तो एक पैकेट में दो-तीन लोग भी खा लेते थे, दरअसल जेब तो उस दौर में खाली ही हुआ करती थी।
अपने देश में ही नहीं, जब हम विदेशों में भी थे तो बिस्किट के नाम पर ‘पारले जी’ बड़े आसानी से सुलभ था. और जो आनंद ‘पारले जी’ खाकर मिलता था, वह आनंद उस देश के सबसे अच्छे बिस्किट को भी खाकर नहीं मिलता था. कहीं न कहीं वह हमें अपने देश, अपनी मिट्टी से भी जोड़ता था, इसलिए और भी अच्छा लगता था। बहरहाल, ‘पारले जी’ से जुड़ी इस खबर ने हम सब को अपने बचपन को याद करने का भी एक मौका दे दिया है, जिसमें न जाने कितने मौके याद आते हैं, जब ‘पारले जी’ को पाकर ऐसा लगता था मानों काजू की बर्फी मिल गयी हो…।

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