ह कहानी है टीटू की, जो पहाड़ों का लड़का है, और उसे पढ़ाई के लिए शहर (लखनऊ) ला कर छोड़ दिया जाता है। अपनी मां, भाई, बहन और बाबा से बिछड़ने का उसे जो दुख लगता है, वह ताउम्र उसे एक जख्म दे जाता है। छोटी-सी उम्र में ही उस बच्चे को शहर में भेज दिया जाता है। जहां उसके रिश्ते के एक चाचा उसे घोर यातना देते हैं। बस एक दुर्गा दीदी ही थी, जो उसका दुख समझती थी। लेकिन उसके भविष्य के लिए वह भी कुछ न कहती। उसके बाबा भी जब फोन करते तो उसके दर्द को महसूस करते, पर समझते थे कि इतना दुख सहेगा तो पढ़ लिखकर अफसर हो जायेगा कहीं। एक किसान बाप की यही तो ख्वाहिश होती है।

दूसरी तरफ टीटू का मन जाने क्या-क्या सोच बैठा। उसे लगता उसे कोई प्यार नहीं करता, इसलिए घर से दूर कर दिये। उसकी दुर्गा दीदी की भी शादी हो गई। वो भी छोड़ कर चली गई। उसे लगा हर कोई उससे दूर हो जा रहा है। इन सबका उसके मन पर बुरा असर पड़ा। वह चिड़चिड़ा हो गया। उसके मन में खीज हो गया सबके लिए। चाचा से मार खा-खा कर उसके शरीर के साथ मन भी कड़ा हो गया। उसका पढ़ने में मन नहीं लगता। नशे की लत लग गई। वह खुद सिंगर बनना चाहता था, पर स्थिति यह हो गई कि अपने बाबा के भी सपने को पूरा नहीं कर पा रहा था। 

लेकिन, यह टीटू था। इसका एक दूसरा रूप भी था। लोग उससे प्यार करते थे। वह लोगों की मदद करता था। वह सबका दोस्त था। सिर्फ खुद का ही दुश्मन बन बैठा था। लेकिन आखिर में वह खुद से भी जीत जाता है और अपने बाबा के सपने को पूरा करता है। 

पुस्तक पर एक नजर

  • समीक्षित पुस्तक : स्याह, सफेद और स्लेटी भी
  • लेखक : रणवीर सिंह चौहान
  • प्रकाशक : दखल प्रकाशन
  • पृष्ठ : 128
  • मूल्य : 150/- 
  • समीक्षक : रजिया अंसारी

रणवीर सिंह चौहान इस उपन्यास के लेखक हैं। ये देहरादून के हैं और इनकी पढ़ाई लखनऊ में हुई है। कहानी को पढ़ते समय लगेगा लेखक खुद अपनी कहानी लिख रहे हैं। कहानी उसी शैली में लिखी गई है। मतलब लेखक टीटू का दोस्त है और वही यह कहानी सुना रहा है। कहानी में लखनवी तहजीब खूब दिखाई गई है। उर्दू और अरबी शब्दों का भरपूर इस्तेमाल हुआ है। शुरुआत थोड़ी उबाऊ है, क्योंकि जब किसी एक किरदार पर आपको पूरा उपन्यास लिखना है तो यह स्वभाविक है, लेकिन धीरे-धीरे आप टीटू के साथ रोयेंगे, हंसेंगे और उसका दर्द महसूस करने लगेंगे। लेखक ने टीटू के लिए लिखते समय पहले उसके दर्द को जीया है। वैसे भी लेखक अपनी हर कहानी का हिस्सा तो होता ही है। छोटी-सी उम्र में जब बच्चा घर से दूर होता है तो उस पर क्या बीतती है, इसका बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया गया है।

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