PATNA (APP) : आचार्य नंदलाल बसु। किसी परिचय के मोहताज नहीं। पूरे विश्व की कला जगत इन्हें जानती है। बिहार ने जन्म दिया तो पश्चिम बंगाल ने एक नई ऊंचाई दी। दरअसल, भारतीय संविधान की रचना में योगदान देने वाली बिहार की शख्सियतों का जब भी जिक्र आता है, तो उनमें नंदलाल बसु का नाम भी पूरे सम्मान से लिया जाता है। नंदलाल बसु उन चुनिंदा कलाकारों में शामिल हैं, जो भारतीय आधुनिक कला के प्रणेता माने जाते हैं। 3 दिसंबर, 1882 को जन्म लेने वाले आचार्य नंदलाल बसु के बारे में सबकुछ जानिए इन 5 बातों में। 

1 मुंगेर के हवेली खड़गपुर में हुआ था जन्म : नंदलाल बसु कहां के थे? यह हर कोई जानना चाहती है। दरअसल, ये बंगाली समाज से आते हैं और इनके जीवन का दो तिहाई से अधिक हिस्सा पश्चिम बंगाल के शांति निकेतन में ही बीता  और लोग जब इनका जन्म स्थान खड़गपुर पढ़ते हैं तो लोग बंगाल वाला खड़गपुर को लेकर कंफ्यूजन में पड़ जाते हैं। लेकिन हकीकत यही है कि नंदलाल बसु का जन्म बिहार के मुंगेर जिला स्थित हवेली खड़गपुर में हुआ था। इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही ली। वहां के बेसिक स्कूल में इन्होंने हाई स्कूल तक की पढ़ाई की तथा आगे की पढ़ाई के लिए पश्चिम बंगाल चले गए। वहीं बचपन में माँ को कलाकृति बनाते देख नंदलाल बसु के मन में भी चित्र बनाने की ललक जगी। पहले तो ये आड़े-तिरछे चित्र बनाते रहे। इसके बाद इनकी मेहनत रंग लाई। एक बार जब इन्होंने चित्रकारी की दुनिया में कदम रखा तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा और शांति निकेतन में मास्टर मोशाय के नाम से ये फेमस हो गए। और आज, बिहार और बंगाल ही नहीं, पूरा देश अपने मास्टर मोशाय पर गर्व करता है। 

2 गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के बुलावे पर गए थे शांति निकेतन : यह पूरा प्रसंग शांति निकेतन से जुड़ा हुआ है। दरअसल, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर नंदलाल की कलाकृतियों से काफी प्रभावित हुए थे और गुरुदेव के कहने पर उन्होंने उनकी कई कविताओं के लिए चित्र बनाए थे तथा वे शांति निकेतन गए थे। कहा जाता है कि कोलकाला के बाहरी इलाके में गुरुदेव ने शांति निकेतन की शुरुआत की थी। तब नंदलाल बसु 1922 में शांति निकेतन स्थित कला भवन के पहले प्रिसिंपल बनाए गए थे। शांति निकेतन में ही उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई थी। उन्होंने महात्मा गांधी के दांडी मार्च को दर्शाते हुए श्वेत-श्याम कलाकृति बनाई, जो बापू पर बनाई गई अब तक की सर्वश्रेष्ठ कलाकृतियों में से एक है। नंदलाल की कलाकृतियों में ग्रामीण परिवेश से लेकर पौराणिक कथाओं को बखूबी दर्शाया गया है। आंचलिक सरोकार से लेकर धार्मिक चित्र तो उन्होंने खूब बनाए। भारत सरकार की ओर से दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ और ‘पद्मश्री’ का प्रतीक चिह्न बनाने का श्रेय भी नंदलाल बसु को ही जाता है। 

3 बापू से लेकर नरेंद्र मोदी तक ने की प्रशंसा : वैसे तो नंदलाल बसु विशुद्ध रूप से कलाकार थे और कला ही उनकी पूंजी थी। लेकिन, अंजाने में उनकी कूची सियासी गलियारे में भी दौड़ने लगी। बापू से लेकर नेहरू तक उनकी कूची के दीवाने थे, उनकी सादगी के कायल थे। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने रेडियो कार्यक्रम मन की बात में नंदलाल बसु की प्रशंसा कर चुके हैं। बापू के कहने पर एक से एक चित्र ही नहीं बनाये, बल्कि मंच सज्जा भी किये, साथ ही चित्रों के माध्यम से अंग्रेजों के खिलाफ बौद्धिक लड़ाई भी इन्होंने लड़ी। नंदलाल बसु ने राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी के दांडी मार्च का जो चित्र उकेरा, उसकी कोई जोड़ नहीं है। 1930 में 12 अप्रैल को ‘बापूजी’ के नाम से बने इस चित्र ने च‍ित्रकारी की ही दुनिया में नहीं, बल्कि सियासी गलियारे में भी हलचल मचा द‍िया। बापू वाली यह पेंटिंग लोकसभा से लेकर ब‍िहार विधानसभा तक में नंदलाल की उपस्थिति का अहसास करा रही है। खास बात कि इस च‍ित्र में केवल दो रंगों श्वेत और श्याम का इस्‍तेमाल क‍िया गया है, लेकिन इसमें जीवन के सारे रंग दिखते हैं। 

4 संविधान सभा के लिए मिले थे 21 हजार रुपये : यह प्रसंग भी रोचक है। दरअसल, नंदलाल बसु की पंडित जवाहर लाल नेहरू से शांति निकेतन में जब मुलाकात हुई थी। तब उन्हें भी पता नहीं था कि उनके कंधे पर संविधान की मूलप्रति पर चित्र बनाने की जिम्मेवारी आने वाली है। लेकिन, जब उन्हें जिम्मेवारी मिली तो नंदलाल बसु पीछे नहीं हटे। जिम्मेवारी को चुनौती के रूप में लिया। पूरे संविधान सभा के लिए नंदलाल को 22 चित्र बनाने की जिम्मेवारी मिली और इसे बनाने में चार साल लगे। बता दें कि संविधान के 22 भाग हैं और पृष्ठों की संख्या 221 है। हर पृष्ठ पूर्ण दस्तावेज है और हर पृष्ठ पर चित्र बनाना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन नंदलाल बसु ने संविधान के सभी 22 भागों पर उससे संबंधित चित्र बना कर अपनी कला ही नहीं, राजनैतिक ज्ञान का भी परिचय दिया। खास बात कि उन्होंने संविधान के हर भाग में 8 बाई 13 इंच के चित्र बनाए हैं और इसके लिए उन्हें मेहनताना में 21 हजार रुपये दिए गए थे। 

5 1954 में पद्म विभूषण से नवाजा गया : चित्रकारी के जादूगर नंदलाल बसु देश के पहले नवयुग पेंटर थे, जिन्होंने चित्रकारी के माध्यम से आधुनिक आंदोलनों के विभिन्न स्वरूपों, सीमाओं और शैलियों को उकेरा। बसु की पेंटिंग की तकनीक कमाल की थी। शायद, यही कारण था कि उनकी पेंटिंग से एशिया महादेश पूरी तरह प्रभावित हुआ। नंदलाल बसु की पेंटिंग और चित्रों से यूरोप के चित्रकार भी प्रभावित हुए और कइयों ने उनकी तकनीक को अपनाने का सार्थक प्रयास किया। नंदलाल बसु न केवल चित्रकला और शिल्प के मर्मज्ञ थे, वह एक अच्छे और सुलझे हुए लेखक भी थे। उनके इन्हीं गुणों को देखते हुए भारत सरकार ने 1954 में ‘पद्म विभूषण’ से नवाजा था। उनकी पुस्तकें रूपावली, शिल्पकला और शिल्प चर्चा पढ़कर आज भी कला के छात्र लाभानिवत हो रहे हैं। इतना ही नहीं, उन पर डाक टिकट भी जारी किया गया था। साल 1976 में नंदलाल बोस की कलाकृतियों को आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने उन नौ कलाकारों में शामिल कर लिया, जिन्हें धरोहर का दर्जा हासिल है। राजधानी दिल्ली के नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट में नंदलाल की हजारों कृतियां दरसायी गयी हैं। बता दें कि 16 अप्रैल, 1966 को कोलकाता में उनका निधन हुआ था।

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