PATNA (APP) : लालू और नीतीश। 1974 से चली आ रही है दोस्ती। यह दोस्ती एक बार फिर परवान पर है। दोनों में पिछले माह जो अधूरा मिलन हुआ था, वह आज पूरा हो गया। इस मिलन की तस्वीरें जारी होते ही सोशल मीडिया पर वायरल हो गयी हैं। बिहार से लेकर दिल्ली तक की सियासत में हलचल मच गयी है। जुलाई में लालू यादव जब बीमार थे, तब अस्पताल में उनसे मिलने नीतीश कुमार पहुंचे थे। तब न लालू यादव बोलने की स्थिति में थे और न नीतीश कुमार कुछ कह पा रहे थे। बस दोनों आत्मा से मिल रहे थे। वह काफी भावुक पल था। लेकिन, आज बुधवार को रात में वह अधूरा मिलन पूरा हो गया। 

देखें तस्वीरें आज 17 अगस्त की

दरअसल, दोस्ती की कोई परिभाषा नहीं होती है। जब दो लोग बिन बात ही एक-दूसरे को समझने लगते हैं, उसी दिन वे दोस्त बन जाते हैं। भले ही बीच में दोनों के बीच कुछ दूरियां आ जाए, लेकिन दुख के दिनों में दुश्मनी की सारी दीवारें ढह जाती हैं। ऐसी ही दोस्ती लालू यादव और नीतीश कुमार के बीच है। भले ही सियासी कारणों से नीतीश कुमार अलग हो गए। लेकिन, नीतीश कुमार के दिल में लालू बसते हैं। अस्पताल में जब उनसे मिलने नीतीश पहुंचे थे, तब वे काफी भावुक हो गए थे। मीडिया के सामने तब उन्होंने इसे खुले दिल से स्वीकार भी किया। कम बोल- लेकिन महज चंद शब्दों में ही लोगों को अहसास हो गया कि उन दोनों की दोस्ती की जड़ें कितनी गहरी हैं। रिश्ते कितने पुराने हैं। और इस रिश्ते की मिठास को केवल महसूस किया जा सकता है। उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है। लेकिन आज दोनों के चेहरों पर आयी रौनक को उनके साथ पूरा बिहार महसूस कर रहा है। और इसके गवाह लालू फैमिली के साथ बिहार कैबिनेट के वरीय मंत्री विजय चौधरी भी बने। 

लेकिन, रिश्तों को कैसे जीया जाता है, कैसे निभाया जाता है। इसमें कितनी संजीदगी होती है। इसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समय-समय पर साबित करते रहे हैं। जब भी लालू को जरूरत हुई नीतीश उनके लिए खड़ा रहे। और जब भी बीजेपी को जवाब देने के वास्ते नीतीश को मदद की जरूरत हुई, लालू उनके लिए बड़े भाई के रूप में अपना बड़ा दिल दिखाया। दोनों की दोस्ती सियासी गलियारे में बड़े भाई – छोटे भाई से लेकर जय – वीरू वाली है। ये कहिए कि जय – वीरू से भी आगे की। आगे इसलिए कि शोले फिल्म तो 1975 में आयी थी। तब लोगों ने ‘जय-वीरू की दोस्ती’ को जाना। लेकिन, इन दोनों की दोस्ती 1974 में ही हो गई थी। उस साल पटना में छात्र आंदोलन शुरू हुआ था और इसका नेतृत्व लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने किया था। इस आंदोलन को जेपी आंदोलन भी कहा जाता है। इसी आंदोलन में दोनों दिग्गज नेता एक-दूसरे के काफी करीब आए और दोस्ती प्रगाढ़ होती चली गयी। नीतीश कुमार उस वक्त महज 24 साल के थे, जबकि लालू यादव की उम्र 27 साल थी। उस समय नीतीश कुमार पटना यूनिवर्सिटी के बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहे थे, जबकि लालू यादव पटना कॉलेज में पढ़ रहे थे। नीतीश कुमार समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर से प्रभावित थे तो लालू यादव जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति से मोटिवेट थे। 1974 से शुरू हुई दोस्ती बेरोकटोक 1994 तक चलती रही।  

लालू सीनियर थे, इसलिए नीतीश कुमार उन्हें बड़ा भाई भी कहते रहे हैं। दरअसल, लालू कॉलेज के दिनों में ही छात्र नेता बन गए थे। वे पटना यूनिविर्सिटी छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए थे। चुनाव जीतने में भी लालू सीनियर थे। वे 1977 में ही सासंद बन गए थे, जबकि नीतीश कुमार तब चुनाव हार गए थे। हालांकि, 1985 में लालू और नीतीश ने एक साथ बिहार विधान सभा चुनाव में बाजी मारी। इस तरह दोनों एक साथ विधायक बने, लेकिन, खास बात यह है कि व्यक्ति और पॉलिटिशियन के रूप में लालू और नीतीश एक-दूसरे के विपरीत हैं। यह जगजाहिर है कि नीतीश बेहद नाप-तौलकर और सधे अंदाज में बोलते हैं, जबकि लालू यादव जो महसूस करते हैं, वह सबके सामने खुले दिल से बोल देते हैं। वे यह नहीं सोचते हैं कि लोग क्या सोचेंगे। 1988 का एक वाकया है। उसी साल कर्पूरी ठाकुर का निधन हो गया था। उनकी जगह नेता प्रतिपक्ष बनने की बारी आयी तो लालू यादव को नेता प्रतिपक्ष बनाने के लिए नीतीश कुमार ने उनके पक्ष में जबर्दस्त लॉबिंग की थी। उन्होंने मोर्चा संभालते हुए तमाम विधायकों को लालू के पक्ष में खड़ा कर दिया था। 

2020 में जब विधानसभा सत्र चल रहा था, और एक मामले में नीतीश कुमार खफा हो गए थे। तब नीतीश ने कहा भी था, ‘तुम मेरे भाई समान दोस्त का बेटा हो, उन्हें पता है कि लोकदल का नेता किसने बनाया था।’ लोगों की मानें तो भले ही नीतीश कुमार उस समय काफी गुस्सा दिखा रहे थे, लेकिन उस डांट में भी एक अपनापन दिख रहा था। गार्जियनशिप की झलक मिल रही थी। यही गर्जियनशिप की झलक अस्पताल में दिखी थी। तब नीतीश ने तेजस्वी के काँधे पर हाथ रखा तो उसका यही मैसेज था कि मैं हूं न। जब इफ्तार पार्टी में नीतीश कुमार पहुंचे थे, तब भी वे लालू की अनुपस्थिति में गार्जियन ही थे। और असली गार्जियनशिप तो यह है कि जो सियासी ट्रेनिंग तेजस्वी को लालू नहीं दे सके, वह सियासी ट्रेनिंग नीतीश कुमार दे रहे हैं। सियासी पंडित भी मानते हैं कि 1990 में नीतीश कुमार जैसा सारथी अगर लालू को नहीं मिलता तो उनके लिए मुख्यमंत्री पद दूर की कौड़ी रहता। और 2015 में भी नीतीश कुमार मोर्चा नहीं संभालते तो आज तेजस्वी यादव भी इतनी उंचाई पर आसानी से नहीं पहुंचते। और इसी मोर्चे को एक और नीतीश ने 9 अगस्त को संभाला। 

लेकिन, कहा जाता है कि सत्ता के साथ कई बुराइयां भी नेताओं में घर कर जाती हैं। कुछ ऐसा ही लालू व नीतीश के साथ हुआ। लालू पर कई तरह के आरोप लगे। कई मामलों को लेकर नीतीश कुमार से उनकी दूरियां बढ़ती चली गईं। ट्रांसफर-पोस्टिंग में भ्रष्टाचार के आरोप लगे। इन सब कारणों से नीतीश और लालू के बीच की दोस्ती दरकने लगी। उन दोनों की दोस्ती पहली बार 1994 में टूटी। इसके 10 साल के बाद नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने। लेकिन, यह भी कहा जाता है कि मुसीबत में सच्चा दोस्त ही काम आता है… और बिहार में इन दोनों के बीच ऐसा ही हुआ… 2013 में दोनों के बीच एक बार फिर से दोस्ती परवान चढ़ने लगती है। 2013 में नीतीश कुमार और लालू यादव की गलबहियां करती तस्वीरें जब मीडिया में आयी तो बिहार के सियासी गलियारे में हलचल मच गई। और 2015 में इस दोस्ती ने मोदी लहर को भी ठेंगा दिखा दिया। बिहार में मोदी मैजिक नेस्तनाबूद हो गयी। सोशल मीडिया पर चलने लगा कि लालू यादव का ‘दोस्त’ बिहार का मुख्यमंत्री बन गया और नीतीश के ‘दोस्त’ का बेटा उपमुख्यमंत्री। लालू-नीतीश की दोस्ती की मिसालें दी जाने लगी। एक बार फिर कहा जाने लगा, दोनों के बीच ‘जय-वीरू’ की दोस्ती है। 

लेकिन, इस बार यह दोस्ती महज चार साल भी ठीक से नहीं चली। दोनों के बीच खाई खिंच गई। 2017 के मध्य में दोनों ने अलग राह पकड़ ली। नीतीश कुमार सत्ता में बने रहे, लेकिन ‘दोस्त’ का बेटा नेता प्रतिपक्ष बन गया। लालू और नीतीश की अंतिम मुलाकात 2017 में ही एक कार्यक्रम में हुआ था। भले ही दोस्ती टूट गयी थी, लेकिन उसकी जड़ें नहीं उखड़ी थीं। दोनों साथ नहीं थे, तब भी वे एक-दूसरे का ख्याल रखते थे। और अब तो वे दोनों एक बार फिर ‘नरेंद्र मोदी की बीजेपी’ को ठेंगा दिखाते हुए एक मंच पर आ गए हैं। बिहार में महागठबंधन की सरकार बन गयी है। कैबिनेट ने भी अपना रूप ले लिया है। कैबिनेट गठन के एक दिन बाद लालू यादव पटना पहुंचे तो बिना देर किये नीतीश कुमार अपने वरीय सहयोगी विजय चौधरी के साथ पैदल ही राबड़ी आवास पहुंच गए। गुलाब देकर नीतीश ने अपने पुराने मित्र का अभिनंदन किया। दोनों की मुस्कुराहट देखते ही बन रही थी। बिलकुल निश्छल हंसी। बहरहाल, एक बार फिर नीतीश कुमार ने साबित कर दिया कि दोस्त हो तो उनके जैसा हो। सोशल मीडिया पर भी दोनों की दोस्ती की मिसालें दी जा रही हैं।

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