Rajesh Thakur | Patna
बिहार विधानमंडल के आगामी बजट सत्र से पहले शिक्षक हितों को लेकर एक अलग और प्रभावी पहल सामने आयी है। गया शिक्षक क्षेत्र से निर्वाचित भाजपा विधान पार्षद जीवन कुमार ने सत्ता पक्ष में रहते हुए शिक्षकों के ज्वलंत मुद्दों पर सरकार से सीधे सवाल पूछने की तैयारी की है। दरअसल, 2 फरवरी से बिहार विधानमंडल का बजट शुरू हो रहा है और यह 27 फरवरी तक चलेगा। इसे लेकर विपक्ष अपनी रणनीति बना रहा है, लेकिन उससे एक कदम आगे जाने की रणनीति एमएलसी जीवन कुमार ने बनायी है। उनकी इस पहल को तमाम शिक्षक प्रशंसा कर रहे हैं। वे उनकी आवाज बन रहे हैं। उनकी इस पहल से शिक्षकों से जुड़े विपक्ष के मुद्दे गौण पड़ सकते हैं। विपक्ष की रेखा धुंधली हो सकती है।

जीवन कुमार ने सोशल मीडिया के माध्यम से शिक्षकों से अपील की है कि वे अपनी समस्याएं साक्ष्य के साथ साझा करें। इसके लिए उन्होंने बाकायदा गूगल फॉर्म जारी किया है, ताकि हर मुद्दा प्रमाणिक रूप से सदन में उठाया जा सके।
वित्तरहित शिक्षकों को वेतनमान देने का प्रश्न हो, अतिथि शिक्षकों की सेवा स्थायी करने का मामला, 300 संस्कृत विद्यालयों के रुके वेतन और प्रस्वीकृति का संकट या स्थानांतरण नीति में पति-पत्नी आधार पर सुधार; इन सभी सवालों को उन्होंने सरकार के सामने रखने का स्पष्ट संकेत दिया है। खास बात कि उनकी इस पहल की सराहना केवल गया शिक्षक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। राज्य के अन्य शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के मास्टर साहेब भी इसे एक ‘सार्थक और भरोसेमंद प्रयास’ बता रहे हैं।


शिक्षक संगठनों से जुड़े कई पदाधिकारियों का कहना है कि पहली बार किसी सत्ताधारी विधान पार्षद ने सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित न रहते हुए एक सिस्टम से शिक्षक समस्याओं को सदन में ले जाने की प्रक्रिया शुरू की है। दरअसल, जीवन कुमार लगातार अपने क्षेत्र में शिक्षकों से सीधी मुलाकात भी कर रहे हैं। वे क्षेत्र में जाकर शिक्षकों से मिल रहे हैं, पटना में रहने पर अपने सरकारी आवास पर बैठक कर रहे हैं। उनकी समस्याओं के बारे में जान रहे हैं। संभव हुआ तो विभागीय अधिकारियों से बात करके ऑनस्पॉट समाधान भी करवा रहे हैं। मतलब साफ है कि इन बैठकों में केवल आश्वासन नहीं, बल्कि समस्याओं का दस्तावेजीकरण और समाधान की समय-सीमा पर चर्चा हो रही है। यही वजह है कि शिक्षक समुदाय में उनके प्रति विश्वास और अपेक्षा दोनों बढ़ी हैं।

बहरहाल, भाजपा विधान पार्षद सियासी और शिक्षा के गलियारों में एक साथ मैसेज दे रहे हैं कि शिक्षकों ने उन्हें जो जिम्मेदारी सौंपी है, वे उस कसौटी पर मुस्तैदी से जुटे हुए हैं। और इस तरह की पहल अन्य शिक्षक पार्षदों को भी करनी चाहिए। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह पहल यह भी मैसेज देती है कि शिक्षा और शिक्षक जैसे संवेदनशील मुद्दे केवल विपक्ष का विशेषाधिकार नहीं। बेशक कहा जा सकता है कि सत्ता पक्ष के भीतर से उठने वाली आवाज, सरकार के लिए कहीं अधिक असरदार साबित हो सकती है। यह तो आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा कि बजट सत्र के दौरान जीवन कुमार के सवाल किस रूप में सदन के पटल पर आते हैं, लेकिन इतना तय है कि शिक्षक हितों को लेकर उठी यह आवाज दूर तलक जाएगी।




