PATNA (SMR) : बिहार में जातीय जनगणना शुरू हो गयी है। इसका पहला चरण पूरा हो चुका है। पहले चरण में मकान गिने गए, जबकि दूसरे चरण में घर-घर जाकर लोगों से सरकारी कर्मी जाति पूछेंगे। इसे लेकर सियासत भी हो रही है, वहीं बिहार में तमाम जातियों के डिजिटल नंबर भी आ गए। अब लोग जाति के बजाय नंबर से जाने जाएंगे। इसी में लोहार जाति भी आती है। लोहार लोहे को गलाना भी जानती है और उससे औजार बनाना भी जानती है। लोहार जाति से जुड़े इस आलेख को दूरदर्शन पटना के असिस्टेंट न्यूज डायरेक्टर अजय कुमार के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से अक्षरशः लिया गया है और जातीय जनगणना के इस दौर में इसकी प्रासिंगकता बढ़ गयी है। बता दें कि इसके पहले अजय कुमार ने बिहारी तेली पर भी सागर्भित आलेख लिखा था। इस खबर के अंत में बिहारी तेली से संबंधित आलेख की लिंक दी गयी है। आप उसे क्लिक कर पूरी खबर को पढ़ सकते हैं। और यहां पर आप लोहार जाति से संबंधित आलेख को पढ़ें :

लोहार अकेली जाति है, जो लोहे को गलाना जानती है। गलाकर उसे फोर्जिंग और टेंपरिंग करना जानती है। खान से निकले कोयले की तुलना में अधजली लकड़ी के कोयले से 2000 से 3000 तक अधिक डिग्री फॉरेनहाइट (०F) तापमान मिलता है, वह भी धौंकनी के मदद से। विज्ञान की यह बुनियादी समझ लोहार में होती है। बारूद से पहले धरती पर लड़े गये युद्धों में हथियार बनाने और सप्लाई का काम लोहार करते थे। विभिन्न बोली-भाषाओं में इनके नाम अलग-अलग हो सकते हैं। मसलन, भारत में लोहार, लोहरा, सिकलीगर, पंचाल (लुहार-सुतार), सैफी आदि। आदि!! यह जाति सभी धर्मों सिक्ख, ईसाई, इस्लाम और हिंदू में पायी जाती है।

1857 के विद्रोह के बाद 1878 में आर्म्स एक्ट बना। उसमें अंग्रेजी राज ने देशी हथियार बनाने और रखने पर रोक लगा दी थी। तब जजमानी प्रथा के तहत किसानों से उपज का एक हिस्सा प्राप्त कर कृषि-उपकरणों की सेवाएं देने तक तक यह जाति सीमित होकर रह गयी। Roman Geographer Pliny की मानें तो चंद्रगुप्त मौर्य की सेना में 6 लाख पैदल, 30 हजार घुड़सवार, 9000 प्रशिक्षित हाथी सैन्य-दल और 8000 रथ-सैनिक-दल थे। अन्य ग्रीक-रोमन लेखकों के अनुसार, चंद्रगुप्त मौर्य की सेना का आकार 75 हजार से लेकर डेढ़ लाख तक हो सकती है। देखें तो चंद्रगुप्त मौर्य की सेना की ताकत सिकंदर महान की सेना से भी बडी़ थी। इतनी बडी़ सेना के लिए हथियार बनाने और सप्लाई करने वाले कौन थे ? जाहिर है लोहार ही रहे होंगे।

मौर्यों के मगध साम्राज्य के अधीन वर्तमान बिहार, झारखंड, उड़ीसा और दक्कन क्षेत्र थे, जहां सभी श्रेणी के लौह-अयस्क (Iron Ore) मौजूद थे। वैसे भी सिंधु और गंगा के मैदानी इलाके तब, बेहतरीन हथियार बनाने के लिए विख्यात और कुख्यात थे। सिल्क रुट से धनिया-तेजपत्ता के साथ यहां से हथियार भी प्राचीन एशिया के हर कोने में गये होंगे।

मगध की धरती प्राचीन काल से आधुनिक युग तक हथियार बनाने के मामले में उर्वर रही है।बंगाल से आकर मीर कासिम ने (1760-64) मुंगेर में तोप-बंदूक का करखाना डाला। कभी मुंगेर में 30-35 कारखाने थे, इसलिए कि सुलभ कारीगर तो थे ही; साथ ही मुंगेर की माटी में सोरा (Potassium Nitrate) आसानी से मिलता है, जो गन-पाउडर के लिए जरूरी और महत्वपूर्ण घटक है।

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