PATNA (SMR) : बिहार में जातीय जनगणना शुरू हो गयी है। पहले चरण में मकान गिने जा रहे हैं। दूसरे चरण में घर-घर जाकर लोगों से सरकारी कर्मी जाति पूछेंगे। इसे लेकर सियासत भी हो रही है। बिहार में सैकड़ों जातियां और उपजातियां हैं। इसी में तेली जाति भी है। तेली जाति ने बहुत चीजों का आविष्कार किया है। बिहारी तेली से जुड़े इस आलेख को दूरदर्शन पटना के असिस्टेंट न्यूज डायरेक्टर अजय कुमार के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से अक्षरशः लिया गया है और जातीय जनगणना के इस दौर में इसकी प्रासिंगकता बढ़ गयी है। अब पढ़िए पूरा आलेख :

तेली जाति ने कोल्हू का अविष्कार नहीं किया होता, तो हमें सरसों, तिसी और तिल के तेल के स्वाद और फायदे नहीं मिले होते। मोहनजोदाड़ो, हड़प्पा और सिंधुघाटी तक में सरसों के तेल-प्रयोग का उदाहरण मौजूद है। ऐसे में कहना पड़ेगा कि मगहिया तेली जाति की जड़ें बहुत गहरी हैं और डायनेमिक भी. दरअसल, कोल्हू धन-संपदा पैदा करने की डिवाइसिस थी। डायनेमिक उपाय थे। खाद्य तेल निकालने की इस तकनीक ने मानव सभ्यता के विकास में खाने-पकाने की संरचना और ढांचे को बदल डाला। इसी के साथ आयुर्वेद चिकित्सा में कई सिद्धांत के बुनियाद पडे। 

बुद्ध-महावीर के युग में इस जाति की बडी प्रतिष्ठा थी। तब, यह जाति श्रेष्ठी या श्रेष्ठी-गण कहे जाते थे। धन-संपदा पैदा करने की डिवाइसेज और डायनमेनिज्म हिंसा-रहित माहौल खोजते हैं। जाहिर है, उस माहौल को पाने के लिए मगहिया तेली जाति के पूर्वज, तब बुद्ध-महावीर के पास गये होंगे। आज भी भारत के पारसी समाज के बाद धन-धान्य से संपूर्ण और संपन्न कोई है तो वह अकेले महावीर के अनुयायी जैन भाई लोग हैं। विश्व भर में तीसरे और एशिया महादेश में सबसे अमीर गौतम अडानी प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। 

नांलदा जिले के बड़गाँव में कमल के फूल के आसन पर विराजमान भूमि-स्पर्श की मुद्रा में तेलिया बाबा का मंदिर है। आज भी वहां तेल-घी चढ़ाए जाते हैं। चढ़ाए गये तेल-मालिश से लोग स्वस्थ रहने की कामना करते हैं। गर्भवती महिलाएं चढ़ाए गये तेल में भोजन पकाकर खाने के बाद हिष्ट-पुष्ट नवजात की कामना करती हैं। चढ़ाए गये तेल-मालिश कर महिलाएं नवजात की हड्डी-गुड्डी मजबूत रहने के प्रति आश्वस्त रहती हैं।

अंग्रेजी राज में सर जॉन हाल्टन (Sir John Houlton) सीविल सर्वेंट्स थे। उनकी एक किताब है Bihar: The Heart of India… किताब में हाल्टन साहब मगध के जातियों के बारे में जिक्र करते हैं। वह लिखते है- ‘एक समय में मगध के तेली अत्यंत समृद्ध-शक्तिशाली कुल-वंश रहे। तब, मगध की धरती पर बौद्ध-धर्म फल-फूल रहा था। इस जाति के महान-पुरुषों ने भव्य कृर्तिस्तंभ-स्मारकों के निर्माण कराए। उनमें बुद्ध की विशाल प्रतिमा और विशाल प्रवेश द्वार शामिल हैं। संभव है उनमें नालंदा महाविहार का विशाल प्रवेशद्वार भी शामिल रहा हो। 

नालंदा के बड़गाँव जहां तेलिया बाबा का मंदिर है और आसपास के गांवों का 1860 में ASI की ओर से सर कनिंघम ने सर्वे किए। सर्वे में विशाल बालादित्य महाविहार और बुद्ध के प्रिय शिष्य रहे सारिपुत्र के जन्म स्थान का पता चला। इससे पहले 1811-12 में फ्रांसिस बुकानन भी बड़गाँव और आसपास के गांवों में गये। बुकानन ने अपने यात्रा-विवरण में बताया है कि बड़गाँव श्रेणिक (श्रेष्टी) राजाओं का निवास स्थल था। 

मगध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में यह जाति अपने योगदानों के लिए जानी गयी तो क्या पता गांधी जी की तरह सारिपुत्र भी इसी जाति के पूर्वज रहे हों। कहते हैं कि अपने समय का विश्वस्तरीय नालंदा महाविहार को बनाने, सजाने, संवारने, चलाने और संरक्षण करने मे हर्षवर्धन, गुप्त राजवंश और बंगाल के पाल राजवंश की प्रमुख भूमिका और योगदान रहा। इनमें गुप्त राजवंश उसी नालंदा के तेली जाति के पूर्वज भी तो हो सकते हैं…!

(नोट : इस आलेख में लेखक के निजी विचार हैं।)

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