PATNA (APP TEAM) : 2024 की लड़ाई कैसी होगी। इसे लेकर मंथन शुरू हो गया है। इतना तय है कि इसका सेंटर पॉइंट इस बार बिहार बनने वाला है और लड़ाई भी रोचक होने वाली है। वर्तमान राजनीतिक स्थिति बनी रही, कोई किंतु-परंतु नहीं हुआ तो बेशक 2024 की लड़ाई मंडल बनाम कमंडल की होगी। सियासी पंडितों की मानें तो सियासी गाड़ी उसी दिशा में आगे बढ़ रही है। इस गाड़ी पर अभी बहुत से पैसेंजर चढ़ेंगे और बहुत से उतरेंगे। इसी कड़ी में जदयू संसदीय बोर्ड के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा से लेकर राजद विधायक सुधाकर सिंह तक को देखा जा रहा है। 

दरअसल, 2024 का शंखनाद 2023 के नए साल की शुरुआत के साथ ही हो गया है और यह शंखनाद बिहार से ही शुरू हुआ है। नए साल में सबसे पहले बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने बिहार दौरा किया और उनका बिहार से सीधा कनेक्शन भी रहा है। वहीं कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी भारत जोड़ो यात्रा के बहाने बिहार पहुंच गए। जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह तो बिहार के ही हैं और आरजेडी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू यादव वर्तमान में स्वास्थ्य लाभ के लिए सिंगापुर में हैं। उनका सिंगापुर में किडनी ट्रांसप्लांट हुआ है, लेकिन जिस तरह से बिहार में पॉलिटिक्स आगे बढ़ रही है। राम मंदिर, रामचरित मानस तथा जातीय जनगणना के इर्द-गिर्द मुद्दे घूम रही है, उससे साफ संकेत मिलने लगे हैं कि 2024 की लड़ाई ‘मंडल बनाम कमंडल’ की होने वाली है। हालांकि बीजेपी इसे यूपी विधानसभा चुनाव की तरह ‘मंडल+कमंडल’ (मंडल प्लस कमंडल) की ओर ले जाना चाह रही है। 

सियासी पंडितों की मानें तो बेशक 2024 की लड़ाई मंडल बनाम कमंडल की होगी, लेकिन यह सिंपल मंडल बनाम कमंडल की नहीं होगी, बल्कि यह चुनावी लड़ाई ‘भव्य मंदिर बनाम फुल मंडल’ वाली होगी यानी बीजेपी भव्य राम मंदिर बनाने को लेकर आगे बढ़ रही है तो जातीय जनगणना में अगुआ बने बिहार में नीतीश कुमार जितनी जिसकी हिस्सेदारी, उतनी उसकी भागीदारी के कंसेप्ट पर आगे बढ़ रही है। यानी अब फुल रिजर्वेशन की बात होगी। नये साल की शुरुआत के साथ ही बीजेपी ने बिहार से अपना चुनावी बिगुल लगभग फूंक दिया है। 3 जनवरी को लोकतंत्र की जननी वैशाली में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इसका आगाज किया। उन्होंने नीतीश कुमार से लेकर तेजस्वी यादव तक को खूब तगड़े से घेरा। हालांकि, बीजेपी जंगलराज से आगे नहीं बढ़ पायी। वे बिहार के लोगों को जंगलराज का भय दिखाते रहे। वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी 11 राज्यों के दौरे पर निकले हुए हैं। इसका आगाज उन्होंने बिहार के पड़ोसी राज्य झारखंड से शुरू किया। इसी कड़ी में वे त्रिपुरा पहुंचे। त्रिपुरा की जनसभा में अमित शाह ने अयोध्या में बने राम मंदिर के उद्घाटन की तारीख की घोषणा कर दी। उन्होंने कहा- ‘अयोध्या में अगले साल 1 जनवरी को भव्य राम मंदिर का उद्घाटन हो जाएगा। 1 जनवरी 2024 को अयोध्या में गगनचुंबी राम मंदिर बनकर तैयार मिलेगा।’ इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि बीजेपी के राम मंदिर कितना अहम मुद्दा है, क्योंकि उद्घाटन के चार माह बाद ही आम चुनाव है…  

सियासी पंडितों की मानें तो बीजेपी चुपके से फिर से उसी रास्ते पर चल पड़ी है, जिस रास्ते को कभी अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने आगे बढ़ाकर बीजेपी को शीर्ष पर पहुंचाया था। आज भले ही अटल बिहारी इस दुनिया में नहीं हैं और लालकृष्ण आडवाणी सियासत के हाशिए पर हैं, लेकिन मंडल और कमंडल पॉलिटिक्स में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। इसके लिए थोड़ा फ्लैशबैक में चलना होगा। आपको पता ही होगा कि 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या हो गयी थी। उसके बाद 1985 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने जबर्दस्त ढंग से सियासी छलांग लगायी थी। लेकिन, 1985 से 1990 के बीच कई ऐसी राजनीतिक घटनाएं हुईं, इससे कांग्रेस की जमीन खिसकती चली गयी। इसके बाद ही क्षेत्रीय पार्टियां मजबूत हुईं। इसी की परिणति आज जेडीयू, आरजेडी समेत अन्य पार्टियां हैं। अन्य राज्यों में भी क्षेत्रीय पार्टियों ने अपना सिर उठाया और जब नौवीं लोकसभा के रूप में 1989 में चुनाव हुए तो इंडियन पॉलिटिक्स में एक नए युग की शुरुआत हुई। शुरुआत थी गठबंधन सरकारों का दौर और इसी के साथ हुई मंडल और कमंडल की पॉलिटिक्स। इसी दौर में सियासी गलियारे में ‘सामाजिक न्याय’ जैसे शब्द ने एंट्री की। 

सामाजि​क न्याय वाली पॉलिटिक्स के अगुआ वीपी सिंह बने और इस सामाजिक न्याय को बिहार में लालू यादव ने आगे बढ़ाया, इसलिए आज भी लालू यादव के समर्थक उन्हें सामाजिक न्याय का मसीहा कहते हैं। सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी जातियों के लिए वीपी सिंह ने नए अवसरों के द्वार खोल दिये। इतना ही नहीं, वीपी सिंह ने पिछड़ी जातियों को आरक्षण पर बनी ‘मंडल कमीशन’ की सिफारिशों को लागू कर दिया और यहीं से पूरे देश में ​’मंडल पॉलिटिक्स’ ने रफ्तार पकड़ी। आरक्षण विरोधी उनके खिलाफ सड़कों पर उतर आए, लेकिन पिछड़े वर्गों के लिए वे मसीहा बन चुके थे। देश भर में छिड़ी आरक्षण की बहस ने पिछड़े वर्ग को अपनी पहचान का एहसास दिलाया और इसके बाद तो उन्हीं की राह पर खासकर बिहार और यूपी में लालू यादव और मुलायम सिंह यादव चल पड़े। बिहार में जिस तरह आरजेडी और जेडीयू ने अपनी नयी पहचान बनायी तो यूपी में सपा, बसपा ने टाइम टू टाइम सत्ता पर कब्जा जमाया। 

सियासी पंडितों की मानें तो कमंडल पॉलिटिक्स का फायदा उठाकर बीजेपी ने राममंदिर का नारा उछाला। इस तरह ‘मंडल पॉलिटिक्स’ के काट में बीजेपी ने ‘कमंडल पॉलिटिक्स’ को लांच किया। इसी दौर में यूपी में कल्याण सिंह के रूप में बीजेपी को कमंडल पॉलिटिक्स यानी हिंदुत्ववादी राजनीति को पिछड़ी जातियों से जोड़ा। इसकी वजह से वीपी सिंह की सत्ता चली गयी, लेकिन यूपी में मायावती को नयी पहचान मिली। यादव व मुस्लिम वोटों का गठजोड़ बना, जिसका फायदा यूपी में मुलायम सिंह को और बिहार में लालू यादव को मिला। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पहल के बाद मंदिर विवाद अब खत्म हो चुका है। ऐसे में सियासी पंडित भी मानते हैं कि बीजेपी के पास अब कमंडल पॉलिटिक्स के नाम पर भव्य मंदिर निर्माण का मुद्दा है, जिसके उद्घाटन की तारीख बताकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ‘कमंडल’ पॉलिटिक्स को काफी सलीके से हवा दे दी। चूंकि 2024 के अप्रैल-मई माह में लोकसभा चुनाव होना है और एक जनवरी को राम मंदिर के उद्घाटन की तारीख रखी गयी है। सियासी पंडितों की मानें तो इससे आसानी से समझा जा सकता है कि चुनाव और मंदिर का कैसा संबंध होगा और लोग मंदिर निर्माण को लेकर कितने उत्साहित होंगे। यह अलग बात है कि मंदिर के उद्घाटन से लोकसभा चुनाव में बीजेपी को फायदा होगा या नहीं। लेकिन, 2023 में पूरे वर्ष इस मुद्दे को भुनाने में वह पीछे बिलकुल ही नहीं रहेगी। 

दूसरी ओर, बिहार में सियासत ने पिछले साल ही नयी करवट ले ली है। नीतीश कुमार अब महागठबंधन के मुख्यमंत्री हैं। मंडल पॉलिटिक्स के बिहार में हीरो रहे लालू यादव और नीतीश कुमार दोनों ही महागठबंधन के अहम हिस्सा हो गए हैं। जेडीयू ही नहीं, आरजेडी ने भी मान लिया है कि नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री का चेहरा होना चाहिए। ऐसे में सियासी पंडितों की मानें तो 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इस राज्य में ‘मंडल बनाम कमंडल’ की पॉलिटिक्स तेज होगी और इसका असर दिखने भी लगा है। जातीय जनगणना में अगुआ बने बिहार को इसी के एक बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है। सात जनवरी से बिहार में जातीय जनगणना शुरू भी हो गयी है। इसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने स्वागत करते हुए अच्छा कदम बताया है। दोनों ही नेता समाधान यात्रा में वैशाली और सारण में एक साथ शामिल हुए थे।

बहरहाल, बिहार में आने वाले समय में ‘मंडल बनाम कमंडल’ की पॉलिटिक्स और अधिक तेज होगी और लड़ाई 2024 के आते-आते पूरे चरम पर होगी। यह लड़ाई ‘मंडल 1.0’ से बिलकुल अलग होगा यानी ‘मंडल 2.0’ की लड़ाई फुल आरक्षण को लेकर होगा। और यह तस्वीर बिहार में जातीय जनगणना के बाद आ ही जाएगी। फिर तो यही मांग उठेगी कि जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी। मतलब साफ है कि इधर जातीय जनगणना पर ‘मंडल पॉलिटिक्स’ तो उधर बीजेपी की ओर से मंदिर उदघाटन के नाम पर ‘कमंडल पॉलिटिक्स’ चरम पर होगी और इससे किसी को इनकार भी नहीं है। पॉलिटिकल एक्सपर्ट यह भी मानते हैं कि बीजेपी जब भी मात खायी है तो बिहार में ही खायी है। चाहे लालकृष्ण आडवाणी का रथ रोके जाने की बात हो अथवा सत्ता से बाहर किये जाने का मामला हो। एक बार लालू यादव ने बीजेपी को झटका दिया तो एक बार नीतीश कुमार ने। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि मंडल बनाम कमंडल की पॉलिटिक्स अब क्या खेला करती है ?

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