—– संपादक —–
(कोरोना का संकट बॉलीवुड पर भी है। ऐसे में अब बड़े पर्दे की फिल्में भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आ रही हैं। ऐसी ही एक फिल्म आई है बुलबुल। पीके और एनएच 10 फेम अभिनेत्री अनुष्का शर्मा इस फिल्‍म की प्रोड्यूसर है। लेकिन, यहां फिल्म की समीक्षा नहीं, बल्कि इसके बहाने युवा पत्रकार शोभना ने बताया है कि आज भी समाज में महिलाओं की स्थिति नहीं बदली है। यह आलेख शोभना के फेसबुक वाल से साभार। लेखिका के ये निजी विचार हैं।)

—– शोभना —–

PATNA (SMR)। तुम सब एक जैसे हो… जब उसने ये लाइन कही थी तो लगा था कि जैसे अपना दिल निकाल कर रख दिया हो। और वो सारे दर्द और पीड़ा महसूस कर रही हो। बलात्कर होने के बाद जब उसे समझाया गया कि थोड़ा पागल है, लेकिन चुप रहना क्योंकि गहने मिलेंगे, चुप रहना क्योंकि रेशम मिलेगा, चुप रहना क्योंकि इज्ज़त मिलेगी। चुप रहना उससे नहीं तो उसके भाई से सब मिलेगा। चुप रहना क्योंकि बड़ी हवेलियों के राज़ भी बड़े होते हैं। और ये सब सुनते हुए वो मुस्कुरा रही थी।

आखिर उसकी गलती थी क्या? क्या किया था उसने? क्या उसकी गलती ये थी कि उसे खुद से उम्र में तीन गुने बड़े आदमी से ब्याह दिया गया था? क्या उसकी गलती ये थी कि उसे अपने हम उम्र देवर से मोहब्बत हो गई थी।

जिन प्रसंगों का मैं यहां ज़िक्र कर रही हूं, ये सारी कहानी नेटफ्लिक्स पर मौजूद ‘बुलबुल’ फिल्म की है। एक बेहतरीन कॉन्सेप्ट के साथ ये सिनेमा हर मोड़ पर चौंकाता है। औरत से देवी और देवी से चुड़ैल बनने तक की कहानी को बेहद खूबसूरती से गढ़ा गया है। ये फिल्म बताती है कि कैसे एक स्त्री अत्याचारों को सहती-सहती इतनी मजबूत बन जाती है कि उसे फिर समाज और परिवार की परवाह नहीं होती, उसे फर्क नहीं पड़ता उसके पहले प्यार के वापस आ जाने से। अब उसे सब ढ़ोंग लगने लगता है।

जब बुलबुल के वृद्ध पति को उसके भावनाओं के बारे में मालूम पड़ता है जब उसे ये बात पता चलती है कि वो प्रेम कर बैठी है वो भी उसी के छोटे भाई से तो वो बौखला उठता है, जबकि वो खुद पाक साफ नहीं है उसके भी विवाहेत्तर शारीरिक संबंध हैं। लेकिन बुलबुल के प्रेम में कुछ भी शारीरिक नहीं है, केवल भावनात्मक है। जिसे कभी वो व्यक्त नहीं कर पाई और इसकी सजा पाती रही।

यहां शारीरिक और भावनात्मक संबंध के उल्लेख करने का मकसद यह बहस छेड़ना नहीं है कि आखिर इस कहानी का कौन सा पात्र सही या गलत है या फिर किस तरह के संबंध सही होते हैं। ये तो केवल परिस्थितियां ही तय करती है, मगर जब आप बेगुनाह हों तभी दूसरों की गलतियों पर सजा सुनाने का हक रह जाता है।

अब वो इतनी कठोर बन गई है कि उसे सब पाखंडी लगने लगे हैं। वो उन सारे पुरूषों को लील जाना चाहती है, जिसने महिलाओं पर ज़ुल्म की पटकथा गढ़ी है। एक संवाद है जब नायक गांव के मास्टर जी का ज़िक्र करते हुए कहता है कि मास्टर जी एक भले आदमी हैं और नायिका संवाद को आगे बढ़ाते हुए कहती है कि उसकी पत्नी की पीठ की टूटी हुई हड्डियों से पूछो कि कितना भला आदमी है वो। शायद ये संवाद इसीलिए लिखा गया है, क्योंकि किसी भी पुरूष के बारे में केवल उसकी पत्नी या प्रेमिका ही बता सकती है कि आखिर वो अपने निजी जीवन में कैसा इंसान है और निजी जीवन से ही सार्वजनिक जीवन तय होता है।

सिनेमा के ये कुछ ऐसे अंश हैं जो आंखों तक पहुंच ही नहीं पाते, आंखों के सामने होते हुए भी ओझल रह जाते हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि हम उस दौर में प्रवेश ज़रूर कर रहे हैं, जहां इन कहानियों को समाज में स्थान देने की कवायद जारी है।

अंत एक खूबसूरत संवाद के साथ होता है, जब कहानी का नायक अपने किए पर पश्चाताप करता है और हवेली छोड़ कर चला जाता है। अपने बड़े भाई से कहता है कि हम ये घर छोड़ कर जा रहे हैं इस डर से कि आप जैसे ना बन जाएं, यहां से जा रहे हैं कि शायद आप जैसे बन ही गए हैं। अब तो सही मायने में हमारे बीच खून का रिश्ता है, वो भी उस खून का जिससे हम सब के हाथ रंगे हैं।

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