प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज ईश्वरीय विश्व विद्यालय की संचालिका बीके स्नेहा के अहम बोल- नर कर्म से बनें नारायण और नारी लक्ष्मी

Rajesh Thakur | Patna

तेजी से बदलती जीवनशैली और आधुनिक दौर की भागदौड़ के बीच आध्यात्मिक संतुलन की जरूरत पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है। इसी संदर्भ में प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज ईश्वरीय विश्व विद्यालय की संचालिका बीके स्नेहा कुमारी ने मुखियाजी डॉट कॉम से विशेष बातचीत में संस्थान के उद्देश्य और वर्तमान समाज की चुनौतियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संस्था का मूल लक्ष्य व्यक्ति को आत्मिक जागरूकता की ओर ले जाना है, ताकि वह अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझ सके। मनुष्य अपने कर्मों के आधार पर ही ऊंचाई प्राप्त करता है। यदि वह सही मार्ग पर चले तो ‘नर से नारायण’ बन सकता है और नारी अपने संस्कारों और गुणों से ‘लक्ष्मी’ का स्वरूप धारण कर सकती है।

आत्मा-परमात्मा का संबंध जीवन का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र : उन्होंने स्पष्ट किया कि आत्मा और परमात्मा का संबंध जीवन का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है। जब तक आत्मा शरीर में है, उसे परमात्मा से जुड़कर रहना चाहिए। यही जुड़ाव व्यक्ति को आंतरिक शक्ति देता है और उसे सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि आज का समाज, विशेषकर युवा वर्ग, तेजी से भटकाव की ओर बढ़ रहा है। नशा, मोबाइल की लत, लोभ और स्वार्थ ने युवाओं को अंदर से कमजोर कर दिया है। इसका परिणाम है कि वे तनाव और अवसाद जैसी समस्याओं में घिरते जा रहे हैं। इस स्थिति से बाहर निकलने का प्रभावी उपाय आध्यात्मिकता और आत्मचिंतन है। नियमित ध्यान, सकारात्मक सोच और संयमित जीवनशैली अपनाकर युवा न केवल मानसिक तनाव को कम कर सकते हैं, बल्कि जीवन में स्थिरता और सफलता भी प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि आज जरूरत इस बात की है कि व्यक्ति खुद से जुड़े। वरना कागजों पर ‘पंडित’ बनने के बावजूद जमीन पर उसका कोई अस्तित्व नहीं रह जाएगा।

सृष्टि चक्र अपने अंतिम पड़ाव पर, जागने का समय : आध्यात्मिक विमर्श को आगे बढ़ाते हुए बीके स्नेहा कुमारी ने सृष्टि चक्र और चारों युगों की अवधारणा पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जैसे घड़ी के घंटे और वर्ष के बारह महीने एक निश्चित क्रम में चलते हैं, उसी प्रकार सृष्टि भी चार युगों- सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग के चक्र में संचालित होती है। उन्होंने बताया कि वर्तमान समय कलियुग का अंतिम चरण है और यह धीरे-धीरे अपने अवसान की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि हर युग का अपना स्वभाव होता है। सतयुग में सत्य और पवित्रता का वास होता है, जबकि कलियुग में विकार और असंतुलन चरम पर पहुंच जाते हैं। आज हम उसी स्थिति का अनुभव कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज का मानव ‘कुंभकरण की नींद’ में सोया हुआ है, जहां उसे अपने वास्तविक स्वरूप और कर्तव्यों का बोध नहीं रह गया है। भौतिक आकर्षण और बाहरी चकाचौंध में उलझकर आत्मिक जागरूकता पीछे छूट गयी है।

जागरण ही लक्ष्य, परिवर्तन ही अवसर : बीके स्नेहा कुमारी ने कहा कि समाज को इस गहरी नींद से जगाने के लिए ही ब्रह्माकुमारीज की बहनें निरंतर प्रयास कर रही हैं। हमारा उद्देश्य किसी को डराना नहीं, बल्कि जागरूक करना है, ताकि व्यक्ति अपने जीवन को समझे, अपने कर्मों को सुधारे और परमात्मा से जुड़कर आने वाले समय के लिए खुद को तैयार करे। उन्होंने इसे परिवर्तन का दौर बताते हुए कहा कि यह केवल अंत का संकेत नहीं, बल्कि एक नए आरंभ की भूमिका भी है। सृष्टि चक्र अनादि काल से चलता आ रहा है और आगे भी चलता रहेगा। ऐसे में यह समय हर व्यक्ति के लिए अवसर है कि वह अपने भीतर की शक्ति को पहचाने और आने वाले नए युग के लिए खुद को तैयार करे।

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