6 साल में मानस, 7 में सुंदरकांड और अब संस्कार का संकल्प; 12 वर्षीय वेदांत महाराज से खास बातचीत

Rajesh Thakur | Ghoshpur (Haveli Kharagpur)

नयी दिल्ली से उठी एक बाल-ध्वनि आज देशभर के धार्मिक और सांस्कृतिक मंचों पर गूंज रही है। उम्र महज 12 साल, लेकिन वाणी में परिपक्वता, विचारों में गहराई और लक्ष्य में अद्भुत स्पष्टता। हम बात कर रहे हैं वैदेहीनंदन बाल व्यास पंडित वेदांत जी महाराज की। वे अपने दो दिवसीय कार्यक्रम में शुक्रवार को रामायण रिसर्च काउंसिल के ट्रस्टी रहे दिवंगत आत्मानंद सिंह (आत्मा बाबू) के श्राद्धकर्म के मौके पर श्रीराम कथा कहने हवेली खड़गपुर के घोषपुर गांव पहुंचे थे। इस दौरान मुखियाजी डॉट कॉम ने उनसे खास बातचीत की। पढ़िए Mukhiyajee की Exclusive Report…

वेदांत जी महाराज से घोषपुर गांव में बातचीत करते मुखियाजी के संपादक राजेश ठाकुर।
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सब प्रभु श्रीसीतारामजी की कृपा है : बातचीत की शुरुआत में ही वेदांत जी बेहद सहजता से कहते हैं कि जो कुछ भी है, वह प्रभु श्रीसीतारामजी की कृपा है। मन में जो भी प्रेरणा आती है, वही मैं करता हूं। मैं तो बस माध्यम हूं। उनकी यह विनम्रता ही उनके व्यक्तित्व की पहली पहचान है। अभी उनकी उम्र महज 12 साल की है। वे कहते हैं कि 6 साल की उम्र में श्री रामचरित मानस से जुड़ाव हो गया। दरअसल, उनके घर का धार्मिक वातावरण ही उनकी पहली पाठशाला रहा। घर में रोज कथा-चर्चा होती थी। मंदिर जाना, भजन सुनना; ये सब बचपन से ही अच्छा लगता था। ऐसे में 6 साल की उम्र में श्रीरामचरितमानस पढ़ने की इच्छा अपने-आप हो गयी। वहीं 7 साल की उम्र में सुंदरकांड कंठस्थ हो गया था। इतनी छोटी उम्र में सुंदरकांड कंठस्थ करना कोई चमत्कार के सवाल पर वे कहते हैं कि यह सब श्रीहनुमानजी की कृपा है। जब आप प्रेम से किसी किताब या कथा को पढ़ते हैं, तो वह खुद याद हो जाता है।

नौ साल की उम्र में पहली कथा : पहली कथा और आगे के सफर पर वेदांत जी महाराज कहते हैं कि नौ साल की उम्र में झारखंड के टंडवा में पहली बार कथा वाचन का अनुभव आज भी उन्हें याद है। वे कहते हैं कि पहली कथा में थोड़ा संकोच था, लेकिन जैसे ही मंच पर गया, सब अपने-आप सहज हो गया। आज वे तब से लगातार श्रीसीताराम कथा और श्रीहनुमंत कथा का वाचन कर रहे हैं। बता दें कि वेदांत जी महाराज केवल कथावाचक ही नहीं, बल्कि एक सृजनशील लेखक भी हैं। लेखन, संगीत और बहुभाषी प्रतिभा के धनी वेदांत जी बताते हैं कि मानस से प्रेरणा लेकर कविता लिखना शुरू किया। अब तक 500 से अधिक कविताएं लिख चुका हूं। उनकी पुस्तक ‘वेदांत पुष्प’ प्रकाशित हो चुकी है। इसके अलावा उनकी एक पुस्तक ‘आदर्श जीवन ज्ञान’ भी काफी चर्चित है। उस पुस्तक के माध्यम से वे बच्चों को संस्कार और अनुशासन का संदेश दे रहे हैं।

मां भजन गायिकी की पहली पाठशाला : वे बताते हैं कि भजन गायिकी की प्रेरणा उन्हें अपनी माताश्री ऋतु ठाकुर जी से मिली है। मां से ही भजन सीखना शुरू किया, वही मेरी पहली गुरु हैं। संस्कृत और सनातन के प्रति विशेष लगाव है। संस्कृत भाषा के प्रति उनका झुकाव भी कम उम्र में ही हो गया था। वे आगे बताते हैं कि संस्कृत हमारी देवभाषा है। इसे सीखना और सिखाना दोनों जरूरी है। उन्होंने शुरुआती विद्यार्थियों के लिए ‘देवभाषा संस्कृत सीखें’ नामक सरल पुस्तिका भी लिखी है। उन्होंने बच्चों के लिए बड़ा संकल्प लिया है। वे बताते हैं कि उन्होंने वर्तमान में एक बड़े मिशन पर काम कर रहे हैं। मेरा प्रयास है कि छोटे बच्चों में संस्कार, संस्कृति, संस्कृत और भारतीय संगीत के प्रति रुचि बढ़े। इसके लिए वे संतों और विद्वानों के साक्षात्कार करते रहते हैं और उनसे सीखकर अपनी कथाओं में जोड़ते हैं।

यह साधारण बात नहीं है : इतनी कम उम्र में यह साधना और समर्पण, इस पर भी समाज में कई तरह की चर्चाएं हैं। कोई उन्हें पूर्वजन्म का सिद्ध संत बताता है, तो कोई दिव्य आत्मा का पुनर्जन्म। हालांकि, वे खुद इन बातों से दूर रहते हुए बताते हैं कि मुझे बस इतना पता है कि प्रभु ने जो मार्ग दिया है, उसी पर चलना है। वेदांत जी फिलहाल नयी दिल्ली में छठी कक्षा के छात्र हैं और पढ़ाई के साथ-साथ कथा वाचन भी काफी गहराई से करते हैं। वे स्पष्ट कहते हैं कि पढ़ाई भी जरूरी है और साधना भी। दोनों साथ-साथ चलनी चाहिए। बातचीत के अंत में वेदांत जी देश के बच्चों और युवाओं के लिए संदेश देते हैं। वे कहते हैं- ‘अपने धर्म, संस्कृति और भाषा से जुड़ें। यही हमारी असली पहचान है। बहरहाल, कम उम्र, लेकिन बड़ा दृष्टिकोण… वैदेहीनंदन वेदांत जी महाराज की यह यात्रा केवल एक बालक की कहानी नहीं, बल्कि उस संस्कार की झलक है, जो आने वाली पीढ़ियों का मार्ग तय कर सकता है। बता दें कि 14 मार्च को पापमोचिनी एकादशी के दिन आत्मानंद सिंह का निधन हुआ था। वाराणसी के मणिकर्निका घाट पर दाह-संस्कार हुआ था और कल रामनवमी के मौके पर श्राद्ध संपन्न हुआ। मुखाग्नि उनके इकलौते पुत्र संजीव सिंह (मुन्ना सिंह) ने दी थी।

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