DELHI (SMR) : बीजेपी को बिहार में भी ‘एक नाथ’ की तलाश है ? बिहार में भी ‘महाराष्ट्र’ जैसा कोई ‘खेला’ होगा ? नीतीश के सामने बीजेपी की नहीं चलती है क्या ? आरसीपी सिंह को लेकर बीजेपी में इतनी बेचैनी क्यों है ? क्या आरसीपी सिंह 7 जुलाई को बड़ा निर्णय लेंगे ? केंद्रीय कैबिनेट से इस्तीफा देंगे या बीजेपी में जाएंगे ? बीजेपी-जेडीयू की लड़ाई का तेजस्वी को लाभ मिलेगा क्या ? कुछ ऐसे ही सवालों से पॉलिटिकल एक्सपर्ट से लेकर आम-अवाम तक दो-चार हो रहे हैं। दरअसल, पिछले छह माह से जेडीयू और बीजेपी के बीच जमकर तनातनी चल रही है। बयानों की जंग सहयोगी दल की सीमाओं के पार हो गई है। पहले तो इशारों ही इशारों में कमेंट होते थे, लेकिन पिछले एक माह से नाम लेकर ताने मारे जा रहे हैं। कभी-कभी तो संबंध ‘आउट आफ कंट्रोल’ जैसा हो जाता है। हालांकि, पॉलिटिकल एक्सपर्ट भी मानते हैं कि बिहार की सत्ता अभी यथावत स्थिति में रहेगी… लेकिन अंदर ही अंदर कुछ तो खिचड़ी पक रही है, लेकिन नीतीश कुमार की ‘चाणक्य नीति’ के कारण बीजेपी चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रही है। यही वजह है कि महाराष्ट्र प्रकरण पर जब मीडिया सवाल पूछती है तो बीजेपी के नेता बचते नजर आते हैं, जबकि जेडीयू वाले खुलकर बोलते हैं। 

RCP Singh

यह तो आप जानते ही हैं कि महाराष्ट्र में ‘राजनीतिक खेला’ ने पूरे देश में एक नयी बहस दे दी है। खासकर उन प्रदेशों में जहां गैरबीजेपी की सरकार है। हालांकि, बिहार में एनडीए ही सत्ता में है, लेकिन बीजेपी का अपना मुख्यमंत्री नहीं है। एनडीए में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होते हुए भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उसके नेता नहीं है। और यह बात बीजेपी नेताओं को अंदर ही अंदर कचोटती रहती है। लेकिन, न ऐसा समीकरण बैठ रहा है और न ही किसी तरह की गोटी ही सेट हो रही है। पॉलिटिकल एक्सपर्ट भी मानते हैं कि आरसीपी सिंह को लेकर जेडीयू से ज्यादा बीजेपी में बेचैनी है। बीजेपी ने उन्हें ‘टूल’ बनाने की कोशिश की, लेकिन नीतीश कुमार की पॉलिटिक्स के आगे एक नहीं चली। आज आरसीपी सिंह सही से न ‘इधर’ के हैं और न ही ‘उधर’ के हैं। 

यही वजह रही कि जब पटना की धरती से लगभग 3000 किलोमीटर दूर तेलगांना में बीजेपी ने एक कार्यक्रम में आरसीपी सिंह का स्वागत किया तो बिहार में इसकी हलचल मच गई। इसमें भी सबसे बड़ी बात यह थी कि बिहार में इस हलचल को मचने में लगभग दो दिन लग गए। तेलगांना बीजेपी ने 2 जुलाई को आरसीपी सिंह के स्वागत का ट्वीट किया था। लेकिन, बिहार में 4 जुलाई को इसकी हलचल मची। इसका साइड अफेक्ट यह हुआ कि जेडीयू से ज्यादा बीजेपी की बेचैनी बढ़ गयी। दरअसल, कुछ लोगों ने अफवाह उड़ा दिया कि आरसीपी सिंह बीजेपी में शामिल हो गए। सोशल मीडिया पर यह अफवाह उड़ते ही जेडीयू की ओर से तो कुछ नहीं कहा गया, लेकिन बीजेपी सफाई देने में जुट गया। पार्टी की ओर से खंडन पर खंडन आने लगा। यहां तक कि बीजेपी के कद्दावर नेता पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने भी ट्वीट कर बताया, ‘यह समाचार पूरी तरह से भ्रामक है कि RCP सिंह भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल हुए थे, सरकारी कार्यक्रम के सिलसिले में हैदराबाद आए होंगे और Airport पर मौजूद भाजपा कार्यकर्ताओं ने स्वागत कर दिया।’ दूसरी ओर, बिहार में बीजेपी कोटे के मंत्री नितिन नवीन ने भी कहा, ‘आरसीपी सिंह हैदराबाद में बीजेपी की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में शामिल नहीं हुए थे। इस बैठक में केवल राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य ही भाग ले सकते हैं। आरसीपी सिंह का हवाई अड्डा पर सिर्फ अन्य नेताओं की तरह स्वागत किया गया। आरसीपी सिंह सरकारी कार्यक्रम में शामिल होने हैदराबाद गए थे।’ 

लेकिन, इसके साथ ही यह भी बिहार के सियासी गलियारे में सवाल उठने लगे कि आखिर बीजेपी में यह बेचैनी क्यों ? आरसीपी सिंह के किसी पार्टी में जाने या न जाने से यह बेचैनी जेडीयू में होनी चाहिए थी। लेकिन, जेडीयू से ज्यादा बेचैनी बीजेपी नेताओं को क्यों होने लगी। उसमें भी बिहार बीजेपी में यह बेचैनी ज्यादा दिख रही थी। खंडन करने वालों में केवल सुशील मोदी या नितिन नवीन ही नहीं थे, ​बल्कि कई अन्य वरीय नेता भी शामिल थे। दरअसल, यह तो अब जगजाहिर हो गया है कि आरसीपी सिंह का झुकाव और लगाव अपनी पार्टी की तुलना में बीजेपी से ज्यादा है। उनकी पॉलिटिकल और सोशल मीडिया की एक्टिविटीज से भी पता चलता है। सोशल मीडिया पर वे भले ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ट्वीट को रिट्वीट करने से बचते रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ट्वीट को दिल खोलकर रिट्वीट करते हैं। इसके अलावा राममंदिर प्रकरण हो या फिर बीजेपी के अन्य एजेंडे, उनका भी आरसीपी सिंह खुलकर समर्थन करते हैं, जबकि संसद में जातीय जनगणना पर जब भी ललन सिंह अपनी बात रखते थे। तो जेडीयू में रहने के बाद भी आरसीपी सिंह उनका खुलकर समर्थन करने में बचते रहते थे। यूपी चुनाव में भी ऐसा ही देखने को मिला। अंत-अंत तक जेडीयू सीट बंटवारे को लेकर डालिमा में ही रह गया। यही सब देखते हुए जेडीयू ने कड़ा फैसला लेते हुए आरसीपी सिंह को तीसरी बार राज्यसभा का टिकट नहीं दिया। यह जानते हुए कि टिकट नहीं देने से आरसीपी की कुर्सी चली जाएगी। वे केंद्रीय कैबिनेट से हट जाएंगे। पॉलिटिकल एक्सपर्ट भी मानते हैं कि आज हो या कल, आरसीपी सिंह का जेडीयू से मोहभंग होगा ही होगा और संभव है कि वे बीजेपी में ही जाएं। बीजेपी में जाने से और उन्हें राज्यसभा भेजने से ही उनकी कुर्सी बच सकती है। 7 जुलाई को उनका कार्यकाल खत्म हो रहा है।  

पॉलिटिकल एक्सपर्ट यह भी मानते हैं कि बीजेपी आरसीपी सिंह के बहाने जो चाह रही थी, उन पर जेडीयू ने पानी फेर दिया। इसी वजह से नीतीश कुमार से भी आरसीपी की नाराजगी बढ़ती ही चली गई। आज दोनों नेताओं में बात तक नहीं होती है। ऐसे में महाराष्ट्र का मुद्दा बार-बार उठता है। मीडिया को लगने लगता है कि बिहार में भी बीजेपी को किसी ‘एक नाथ’ की तलाश है! लेकिन, आरसीपी का सिक्का नहीं चला। इसी सवाल पर उपेंद्र कुशवाहा ने मीडिया के सामने बीजेपी और आरसीपी सिंह, दोनों को तगड़े से सुना दिया। उपेंद्र कुशवाहा ने साफ कह दिया- ‘आरसीपी सिंह की बुद्धिमता पर उन्‍हें भरोसा है। ऐसी नौबत नहीं आएगी कि जेडीयू को उन्‍हें हटाने के लिए कोई पत्र लिखना पड़े।’ जब महाराष्ट्र के ‘खेला’ पर कुशवाहा से बात की गई तो उन्होंने कहा, ‘बीजेपी की अलग आडियोलॉजी है और जेडीयू की अलग। दोनों की आडियोलॉजी एक नहीं हो सकती है, इसलिए महाराष्ट्र वाली घटना बिहार में नहीं होगी।’ लेकिन, उपेंद्र कुशवाहा ने यह बोलकर बीजेपी की धुकधुकी बढ़ा दी कि आरजेडी और जेडीयू की विचारधारा एक जैसी है। दोनों की विचारधारा में नजदीकी है।’ 

बहरहाल, पूरे मामले पर नीतीश कुमार पर सबकी नजर टिकी हुई है। लकिन, वे चुप हैं तो चुप हैं। जबकि अब रिमोट एक बार फिर उन्हीं के हाथ में आ गया है। दरअसल, ओवैसी की पार्टी के चार विधायकों के आरजेडी में शामिल होने के बाद बिहार में आरजेडी फिर से सबसे बड़ी पार्टी हो गयी है। ऐसे में अब बीजेपी को कोई सियासी खेल बिहार में फिलहाल नहीं कर सकती है। पॉलिटिकल एक्सपर्ट भी मानते हैं कि फिलहाल बिहार में ‘एक नाथ’ वाली स्थिति नहीं हो सकती है। और कम से कम नीतीश कुमार के रहते जेडीयू को कोई तोड़ नहीं सकता है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि 7 जुलाई के बाद बिहार का सियासी सिनेरियो कैया होता है ? सियासी हवा कौन सा रूख पकड़ती है। लेकिन, इन सारे प्रकरणों पर नीतीश कुमार की ही तरह आरसीपी सिंह भी चुप हैं। और वे चुप रहने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं। दिल्ली में जब मीडिया के लोगों ने आरसीपी सिंह से सवाल दागे, उनसे पूछा कि तेलगांना में बीजेपी नेताओं के साथ की तस्वीर की सच्चाई क्या है ? 7 जुलाई को राज्यसभा का कार्यकाल खत्म हो रहा, क्या आप कैबिनेट से इस्तीफा देंगे ? क्या सच में बीजेपी ज्वाइन करने वाले हैं और जेडीयू छोड़ने वाले हैं ? लेकिन, किसी भी सवाल पर आरसीपी सिंह ने कोई कमेंट नहीं दिया। बस उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान दिखी। और इस मुस्कान का राज 7 जुलाई के बाद ही पता चलेगा। तब तक हमारे साथ आप भी बिहार के सियासी हालात पर नजर बनाए रखिए। 

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