Mukhiyajee Reporter | Tarapur
आश्विन कृष्ण नवमी के साथ आज रविवार से मां दुर्गा की आराधना का महापर्व शुरू हो रहा है। आज उग्रचंडा कल्पारंभ और घट (कलश) स्थापना की जा रही है। इस अवसर पर आचार्य ब्रजेश मिश्र ने शारदीय दुर्गोत्सव की पौराणिक परंपरा, तीन कल्पों के क्रम, बिल्व वृक्ष में देवी के बोधन और उग्रचंडा देवी के स्वरूप पर विस्तार से प्रकाश डाला है। पाठकों के लिए उनका पूरा आलेख बोधन मंत्र और ध्यान मंत्र के संस्कृत पाठ तथा उनके भावार्थ सहित यहां प्रस्तुत है। इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।

मां दुर्गा की आराधना का महापर्व आज से आरंभ हो गया है। आश्विन कृष्ण नवमी की पावन तिथि पर आर्द्रा नक्षत्र के योग में उग्रचंडा कल्पारंभ और घट (कलश) स्थापना के साथ अठारह दिनों के शारदीय दुर्गोत्सव का शुभारंभ हो रहा है। आज बिल्व वृक्ष में देवी का बोधन कर उग्रचंडा रूप में मां महामाया की पूजा-अर्चना की जा रही है। यह महोत्सव आश्विन शुक्ल विजयादशमी तक चलता है। शारदीय दुर्गोत्सव का वर्णन अनेक पुराणों और शास्त्रों में है, लेकिन बृहन्नंदिकेश्वर पुराण, कालिका पुराण, महाभागवत पुराण और महाकाल संहिता में इसका पूरा विवरण मिलता है। कालिका पुराण के अनुसार शारदीय दुर्गापूजा तीन कल्पों में होती है। पहला रंभ कल्प आश्विन कृष्ण नवमी को पड़ता है, जिसमें अष्टादशभुजा उग्रचंडा देवी के हाथों महिष वध हुआ। दूसरा नील लोहित कल्प आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को है, जिसमें षोडशभुजा भद्रकाली ने महिष वध किया। तीसरा श्वेत वराह कल्प आश्विन शुक्ल षष्ठी को है, जिसमें दशभुजा कात्यायनी देवी के हाथों महिष वध हुआ। इन्हीं तीन कल्पों में बांटकर पूजा की जाती है। मान्यता है कि हर कल्प और महायुग में देवी के हाथों कई बार महिषासुर का वध हुआ है। अब तक 45 बार ऐसा हो चुका है और ये सभी महिषासुर अलग-अलग वंश परंपरा के थे। रंभ कल्प में आदि पराशक्ति ने उग्रचंडा रूप में महिषासुर का वध किया था, इसलिए प्रथम कल्प की पूजा में इसी रूप में महामाया की आराधना होती है।


महाभागवत पुराण के अनुसार त्रेता युग में रावण की पराजय और श्रीराम की विजय के उद्देश्य से ब्रह्मा समेत सभी देवताओं ने इसी नवमी तिथि को भगवती का बोधन कर उन्हें निद्रा से जगाया था। देवगणों की प्रार्थना पर देवी पहले कुमारी और फिर चंडिका रूप में प्रकट हुईं और अकाल बोधन का आदेश दिया। इसी परंपरा में कृष्ण नवमी के दिन प्रथम कल्प की पूजा में बिल्व वृक्ष में देवी का बोधन कर यह प्रार्थना की जाती है:
ॐ इषे मास्यसिते पक्षे नवम्यामार्द्रा योगतः
श्रीवृक्षे बोधयामि त्वां यावत् पूजां करोम्यहम्
ॐ ऐं रावणस्य वधार्थाय रामस्यानुग्रहाय च
अकाले ब्रह्मणा बोधो देव्यास्त्वयि कृतः पुरा
तस्मादहं त्वां प्रतिबोधयामि
विभूतिराज्यप्रतिपत्तिहेतोः
यथैव रामेण हतो दशास्यस्तथैव शत्रून् विनिपातयामि।
भावार्थ : हे मां, आज आश्विन माह के कृष्ण पक्ष में आर्द्रा नक्षत्र युक्त नवमी तिथि को श्रीवृक्ष (बिल्व वृक्ष) में बोधन कर हम आपकी पूजा करते हैं। पूर्व काल में त्रेता युग में रावण की पराजय और श्रीराम की विजय के उद्देश्य से ब्रह्मा आदि सभी देवताओं ने अकाल (देवी पूजा के लिए अनुपयुक्त काल) में आपका बोधन अर्थात निद्रा से जागरण किया था। जैसे आपके आशीर्वाद से श्रीराम ने रावण का वध किया था, उसी प्रकार आपकी कृपा से हमारे शत्रुओं का विनाश हो और हमारे राज्य-संपत्ति की वृद्धि हो।
कालिका पुराण के अनुसार अष्टादशभुजा महिषासुरमर्दिनी पराशक्ति उग्रचंडा देवी का ध्यान इस प्रकार किया जाता है:
ॐ उग्रचण्डा तु या मूर्तिरष्टादशभुजा भवेत्।
प्रादुर्भूता महाभागा योगिनी कोटिभिः सह।।
जटाजूट सखण्डेन्दुमुकुटत्रय भूषिता।
शूलं खड्गं च शंखं च चक्रबाणं तथैव च।।
शक्तिं वज्रं च दंडं च नित्यं दक्षिण बाहुभिः।
खेटकं चर्मचापं च पाशं चांकुशमेव च।।
घण्टा पर्शुं च मूषलं बिभ्रति वाम पाणिभिः।
दक्षिणार्द्धे गदां वाम पाणिना पान पात्रकम्।।
सुरा पूर्णं च शिरसां मुण्डनानि विलेशयान्।
भिन्नाञ्जनचयप्रख्या प्रचण्डा सिंहवाहिनी।।
रक्तनेत्रा महाकाया युक्ताष्टादश बाहुभिः।
भावार्थ : जो भगवती उग्रचंडा अष्टादशभुजा (18 भुजाओं वाली) हैं, जो करोड़ों योगिनियों के साथ प्रकट होती हैं, जिनके सिर पर जटाजूट, आधा चंद्रमा तथा तीन नेत्र सुशोभित हैं, वे अपने दाहिने नौ हाथों में शूल (त्रिशूल), खड्ग (तलवार), शंख, चक्र, बाण, शक्ति, वज्र, दंड और गदा धारण करती हैं। बाएं नौ हाथों में खेटक (ढाल), चर्म-चाप (धनुष), पाश, अंकुश, घंटा, परशु (कुल्हाड़ी), मूसल तथा मदिरा से भरा हुआ पान-पात्र धारण करती हैं। मुंडमाला से अलंकृत, कज्जल के पर्वत के समान काले वर्ण वाली, लाल नेत्रों तथा विशाल शरीर वाली वे प्रचंड देवी सिंह पर सवार होकर विराजती हैं।








