शालिग्राम और आकाशगंगा में गजब की समानता, विज्ञान भी हैरान; बता रहे हैं आचार्य ब्रजेश मिश्र

Mukhiyajee Reporter | Patna

हाथ में समा जाने वाला काला, गोल शालिग्राम और अरबों किलोमीटर में फैली आकाशगंगा, दोनों में भला क्या नाता हो सकता है? पहली नजर में कुछ भी नहीं, पर गहराई से देखें तो दोनों की बनावट में एक ही घुमावदार चक्र की छाप मिलती है। सनातन परंपरा जिसे भगवान विष्णु का साक्षात स्वरूप और सुदर्शन चक्र का प्रतीक मानती है, विज्ञान उसी आकृति को गोल्डन रेशियो और फाइबोनैचि पैटर्न के रूप में पहचानता है। वेदाचार्य शोधार्थी आचार्य ब्रजेश मिश्र के इस आलेख में जानिए कि आस्था और विज्ञान, दोनों की नजर में शालिग्राम और ब्रह्मांड एक-दूसरे का आईना क्यों नजर आते हैं। साथ ही इस आलेख में लेखक के निजी विचार हैं।

शालिग्राम (Shaligram Shila) और आकाशगंगा (Galaxy/Universe) के बीच समानता का सबसे बड़ा कारण उनकी भौतिक बनावट (आकार), ज्यामिति (Geometry) और आध्यात्मिक दर्शन है। भले ही एक हाथ में आ जाने वाला पत्थर है और दूसरा अरबों किलोमीटर में फैला ब्रह्मांड, लेकिन दोनों में एक अद्भुत समानता देखने को मिलती है। वैज्ञानिक और गणितीय रूप से इन दोनों में सबसे बड़ी समानता ‘लॉगरिद्मिक स्पिरल’ (Logarithmic Spiral) यानी घुमावदार चक्र है। शालिग्राम वास्तव में करोड़ों साल पुराने समुद्री जीव ‘एमोनाइट’ (Ammonite) के जीवाश्म (Fossils) हैं। इन पत्थरों को जब खोला या देखा जाता है, तो इनके अंदर प्राकृतिक रूप से बनी घुमावदार रेखाएं या चक्र दिखाई देते हैं, जिन्हें हिंदू धर्म में सुदर्शन चक्र माना जाता है। दूसरी ओर, हमारी आकाशगंगा (Milky Way) या ब्रह्मांड की अन्य बड़ी स्पिरल गैलेक्सीज़ को जब अंतरिक्ष से देखा जाता है, तो वे भी ठीक इसी तरह एक केंद्र से शुरू होकर बाहर की तरफ घूमती हुई चक्राकार भुजाएं (Spiral Arms) बनाती हैं। यह दोनों आकृतियां गणित के गोल्डन रेशियो (1.618) और फाइबोनैचि सिद्धांत का पालन करती मानी जाती हैं, जो प्रकृति में हर जगह, जैसे शंख, चक्रवात और गैलेक्सी में पाया जाता है।

अब बात ब्रह्मांडीय दर्शन की। सनातन परंपरा और हिंदू शास्त्रों में शालिग्राम को साक्षात भगवान विष्णु का स्वरूप माना गया है। शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु ही ‘अनंत’ हैं और संपूर्ण ब्रह्मांड उन्हीं के भीतर समाया हुआ है। शालिग्राम का काला गोल आकार और उसके अंदर का अंतहीन चक्र इस बात का प्रतीक माना जाता है कि जो ब्रह्मांड में है, वही इस छोटे से पिंड में भी समाहित है। आध्यात्मिक भाषा में इसे ‘यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे’ कहा जाता है, यानी जो सूक्ष्म में है, वही विशाल में है। दोनों की तुलना करें तो शालिग्राम में चक्राकार जीवाश्म रेखाएं (सुदर्शन चक्र) दिखती हैं, जबकि आकाशगंगा में चक्राकार भुजाएं (स्पिरल आर्म्स)। वैज्ञानिक आधार पर शालिग्राम करोड़ों वर्ष पुराना प्राकृतिक एमोनाइट जीवाश्म है और आकाशगंगा गुरुत्वाकर्षण से बंधा तारों और गैसों का समूह। प्रतीक के रूप में शालिग्राम ईश्वर (विष्णु) का लघु रूप है, तो आकाशगंगा ईश्वर की अनंत रचना का विस्तार।

आचार्य ब्रजेश मिश्र।

बहरहाल, हमारा सौरमंडल जिस विशाल तारा-समूह का हिस्सा है, उसे आकाशगंगा या मिल्की वे कहा जाता है। यह एक सर्पिल आकाशगंगा है, जिसकी चपटी तश्तरीनुमा संरचना करीब एक लाख प्रकाश-वर्ष से भी ज्यादा क्षेत्र में फैली है। पृथ्वी से रात के आसमान में यह दूध जैसी सफेद पट्टी की तरह दिखाई देती है, इसी कारण इसका नाम मिल्की वे पड़ा। अरबों तारों के साथ इसमें गैस, धूल, मृत तारों के अवशेष और रहस्यमय डार्क मैटर भी मौजूद हैं, और ये सब गुरुत्वाकर्षण की डोर से एक-दूसरे से बंधे हुए हैं। कुल मिलाकर, शालिग्राम और आकाशगंगा का यह साम्य हमें याद दिलाता है कि प्रकृति के नियम छोटे-बड़े का भेद नहीं करते। जो घुमावदार चक्र करोड़ों वर्ष पुराने एमोनाइट जीवाश्म में उभरता है, वही अंतरिक्ष में तारों की विशाल भुजाओं के रूप में दिखता है। विज्ञान इसे प्रकृति का सार्वभौमिक गणितीय नियम कहता है, तो अध्यात्म इसे उसी परमसत्ता की छोटी और बड़ी अभिव्यक्ति मानता है। शायद इसीलिए ऋषियों ने कहा, ‘यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे’, यानी जो सूक्ष्म में है, वही विराट में भी है। एक छोटे से पत्थर में पूरे ब्रह्मांड के दर्शन की यही दृष्टि भारतीय चिंतन की सबसे बड़ी विशेषता है।
आलेख : आचार्य ब्रजेश मिश्र, वेदाचार्य शोधार्थी, ज्योतिष शास्त्र एवं कर्मकांड, तारापुर (मुंगेर)