PATNA (SMR) : धर्म को धंधा बनाने का परिणाम है अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि की संदिग्ध मौत। साधु -संतों की ऐसी मौत मन को कचोटती है और धर्म के नाम पर चल रहे ढोंग का पर्दाफाश भी करती है। महाराज की मौत न पहली मौत है न आखिरी। मठों / मंदिरों / अखाड़ों में जमा अकूत संपत्ति पर कब्जे की होड़ में साधु, संतों-महंतों के बीच संघर्ष की ख़बरें बराबर आती रहती हैं। 

ईश्वर को पाने की चाह में, आत्मा को परमात्मा में विलीन करने के लिए घर-परिवार त्याग कर लोग साधु तो बन जाते  हैं लेकिन धन-संपदा और अधिकार का मोह-लिप्सा छूट नहीं पाता। यही मोह सारी समस्या की जड़ है। साधु समाज से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि जो मोह और लिप्सा का त्याग न कर सके वह कैसा साधु ? साधु तो वह  होता है जिसके मन में ईश्वर मिलन के सिवा कोई साध न बची हो।

इसी देश में एक से एक संत-महात्मा हुए जिनका तप और त्याग आज भी लोगों के मन में श्रद्धा पैदा करता है। वे  सभी सुख-सुविधाओं का त्याग कर संन्यासी का कष्टप्रद जीवन अपनाते थे। नागा साधु आज भी उस परंपरा का पालन करते हैं। इस परंपरा में देवराहा बाबा आते हैं। न उन्होंने कोई आश्रम बनवाया, न सुख-सुविधाएं जुटाईं। हमेशा नंग-धड़ंग ही रहे। आज के साधु-संतों में फाइव स्टार सुख-सुविधाओं से युक्त आश्रम बनवाने, संपत्ति जमा करने की होड़ मची रहती है। किस-किस का नाम गिनाया जाए। ऐसे ही कुछ संत जिन्होंने बहुत प्रतिष्ठा अर्जित की थी, श्रद्धालु तो उन्हें भगवान का अवतार ही मानते थे, वे आज जेलों में बंद हैं।

आदि जगदगुरु शंकराचार्य ने धर्म की रक्षा के लिए जिस अखाड़ा परम्परा की शुरुआत की थी, वहां आज बहुत कुछ ऐसा हो रहा है, जो नहीं होना चाहिए। मेरी नजर में यह संन्यास परंपरा के प्रतिकूल बात है। जब धन-संपदा ही जमा करना था तो फिर संन्यासी बनने का कोई अर्थ नहीं रह जाता। संपत्ति हड़पने की होड़ का एक ताजा उदाहरण है पटना जंक्शन के प्रसिद्ध हनुमान मंदिर पर अयोध्या के हनुमानगढ़ी के महंत द्वारा दावा ठोकना। इसकी वजह हनुमान मंदिर में आने वाला करोड़ो रुपये का चढ़ावा है। यह मंदिर पूर्व आईपीएस आचार्य किशोर कुणाल की देखरेख में एक ट्रस्ट द्वारा संचालित होता है। इस चढ़ावे की राशि से 4-5 अस्पताल चलते हैं। अयोध्या में लंगर चलाया जा रहा है। तिरुपति मंदिर भी इसी तर्ज पर चलता है। वहां चढ़ावे में आये पैसे से अनेक संस्थान चल रहे हैं।

काश! सभी मठ-मंदिर, आश्रम और अन्य धर्म स्थल इसका अनुकरण करते तो संपत्ति विवाद ही न होता, न किसी साधु-संत को जान गंवानी पड़ती और मानव सेवा भी होती। इस विवाद का एक पहलू धर्म गुरुओं और राजनीति के गुरुओं (नेता) का गठबंधन भी है। दोनों एक-दूसरे के हितों की रक्षा करते हैं। कई बार उनके हित जनहित के खिलाफ भी होते हैं। मठों-मंदिरों और वक्फ बोर्ड के अधीन भूमि की अवैध ढंग से जिस बड़े पैमाने पर पूरे देश में खरीद-बिक्री हो रही है, वह हैरान करनेवाला है। कबीर मठ की महंती को लेकर भी अक्सर खून-खराबे की खबर आती रहती है। इन मामलों में शासन और सरकार की चुप्पी चुभती है। ये घटनाएं हिंसा को भी आमंत्रित करती हैं। भारत भूमि के साधु-संतों के त्याग और तपस्या की बड़ी उज्ज्वल और गौरवशाली  परम्परा रही है, जिसके आगे सम्पूर्ण विश्व सर झुकाता रहा है, फिर यह विकृत धन लिप्सा कहां से आ गई?  यह तो हमारी परंपरा न थी ? साधु-संतों-सन्यासियों से प्रार्थना है कि वे अपने धर्म का पालन करें। अन्यथा, वह दिन दूर नहीं जब मठ-मंदिर और आश्रम  गिरोह में बदल जाएंगे। हे प्रभु! महंत नरेंद्र गिरि की आत्मा को शांति देना और संत समाज को धर्म के मार्ग पर चलने की ताकत देना।

(नोट : प्रवीण बागी बिहार के ख्यातिलब्ध परकारों में शुमार हैं। वे ETV Bharat, हिंदुस्तान समाचार पत्र समेत कई संस्थानों को सेवा दे चुके हैं। वे सोशल मीडिया फ्रेंडली भी हैं। यह आलेख उनके फेसबुक वाल से लिया गया है। इस आलेख में लेखक के निजी विचार हैं।)

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