RSK @ 100 : हवेली खड़गपुर का राजेंद्र श्रीकृष्ण उच्च विद्यालय ने लगाया शतक, जानिए 1934 के भूकंप में क्या हुआ; हेडमास्टर में सर्वाधिक कार्यकाल किनका रहा

Rajesh Thakur | Special Story

हवेली खड़गपुर (Haveli Kharagpur) सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र भर नहीं, बल्कि इतिहास और प्रकृति की जीती-जागती किताब है। कभी 14 राजाओं की राजधानी रहे इस इलाके में पहाड़, जंगल, झील और गरम जलस्रोत एक साथ मौजूद हैं। 1875 में दरभंगा महाराज ने यहाँ जो खड़गपुर झील (Kharagpur Lake) बनवायी, वह आज पर्यटकों की पहली पसंद है, तो भीमबांध (Bhimbandh) का गरम पानी दूर-दूर से लोगों को खींच लाता है। इन्हीं पहाड़ियों और लोककथाओं की गोद में बसा है एक ऐसा विद्यालय, जिसकी दीवारें सौ साल के इतिहास की गवाह हैं। नगर परिषद क्षेत्र में अवस्थित आज इसे राजेंद्र श्रीकृष्ण उच्च विद्यालय (Rajendra Shree Krishna High School) के नाम से जाना जाता है और सुविधानुसार इसे लोग अब RSK कहने लगे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आजादी से पहले स्थापित इस स्कूल का क्या नाम था? इसके पहले हेडमास्टर कौन थे? यहां के हेडमास्टर कब प्रधानाचार्य बन गए? सबसे अधिक वर्षों तक प्रधानाचार्य के पद पर कौन रहे? और 1934 के ऐतिहासिक व बुकमार्क बन चुके भूकंप के समय कौन थे हेडमास्टर…!

हेडमास्टर और प्राचार्यों की सूची। हालांकि इसमें केवल वर्तमान का नाम छूटा हुआ है। (फोटो : शुभम केशरी)

आजादी के पहले का स्कूल : दरअसल, खड़गपुर की ऐतिहासिक धरती पर आजादी के पहले 1926 में ‘ली हाई इंग्लिश स्कूल’ (Lee High English School) की स्थापना हुई थी। आज के जेन-जी ही नहीं, बहुत से अधेड़ लोगों को भी पता नहीं होगा कि यह ली हाईस्कूल क्या है। यह नाम सुनते ही अंदाजा लग जाता है कि यह कोई विदेश का स्कूल होगा और इसे किसी बड़े अंग्रेज अफसर ने बनवाया होगा, और ऐसा अंदाजा लगाना स्वाभाविक भी है। कहा जाता है कि जब इस भवन का निर्माण हुआ, तो इसकी बनावट अंग्रेजी अक्षर L और E की तरह रखी गयी थी, और उस दौर की परंपरा के मुताबिक इसे लाल रंग से रंगा गया, क्योंकि अंग्रेजी हुकूमत में बड़े सरकारी भवन अमूमन लाल रंग के ही बनते थे। 100 साल के बाद भी इस स्कूल के कुछ पार्ट का रंग लाल ही है।
खास बात कि स्कूल स्थापना के समय यहां के प्रधान को हेडमास्टर (Head Master) कहा जाता था। आजादी के बाद हिंदी का जोर पकड़ा तो इस स्कूल के नाम बदल गए। हेडमास्टर साहेब आजादी के बाद ‘प्रधानाचार्य’ बन गए। इस स्कूल के पहले हेडमास्टर बने श्री रामाकांत मिश्रा, जिन्होंने 3 जनवरी 1926 से 15 अप्रैल 1929 तक इसकी कमान संभाली। इसके बाद यमुना प्रसाद, पूरन चंद्र कर्मकार, विंदेश्वर मिश्रा और चतुर्भुज लाल दास जैसी शख्सियतों ने हेडमास्टर के रूप में बारी-बारी से इस विद्यालय को संवारा। सबसे लंबे कार्यकाल तक रहे शिवदुर्गा प्रसाद ने आजादी के पहले भी विद्यालय को संवारा और आजादी के बाद भी। वे 1 मार्च 1935 से 16 अगस्त 1961 तक कार्यरत रहे। आजादी के पहले हेडमास्टर रहे तो आजादी के बाद प्रधानाचार्य बन गए। इसके पहले वे 1933 में इंचार्ज भी बने थे।

तत्कालीन प्रधानाचार्य स्व सुरेंद्र बाबू, ये लगभग 25 वर्ष तक इस पद पर बने रहे।

अब आती है असली दिलचस्प कहानी : 1934 में मुंगेर और आसपास के इलाके में वह भूकंप आया, जिसे आज भी बिहार के इतिहास का सबसे भयावह भूकंप कहा जाता है। उस भूकंप की याद में आज भी 15 जनवरी को मुंगेर शहर बंद रहता है। यह भूकंप 15 जनवरी 1934 को आया था। इस स्कूल का मैं (राजेश ठाकुर, संपादक, mukhiyajee.com) पूर्ववर्ती छात्र रहा हूँ। यहां हमने 1978 में पांचवीं में नामांकन कराया था। उस समय पांचवीं कक्षा को ‘पंचम (नवीन)’ कहा जाता था। नामांकन के समय यहां के प्रधानाचार्य सुरेंद्र बाबू थे। उन्होंने नामांकन के समय हमसे ‘संयुक्ता’ शब्द की स्पेलिंग पूछी थी। हमने भी झट से बता दिया था। तब सुरेंद्र बाबू ने हमारी पीठ ठोकी थी। हमने वहां से 1984 में मैट्रिक परीक्षा फर्स्ट डिवीजन से पास की थी।
बेशक सुरेंद्र बाबू कड़क हेडमास्टर के साथ ही जितने विद्वान थे, उससे कहीं अधिक अनुशासन प्रिय थे। वे कभी-कभी क्लास लेने आते थे। हालांकि वे इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन क्लास लेने के दौरान ज्ञानवर्धक स्टोरी सुनाते रहते थे। वे बताते थे कि 1934 के भूकंप में पूरा इलाका मलबे में तब्दील हो गया था, लेकिन तब के ‘ली हाई इंग्लिश स्कूल’ की दीवारों पर खरोंच तक नहीं आयी थी, वह भी उस स्थिति में जब उन दीवारों में लिंटर या बिंब नहीं था। यह देखकर तत्कालीन कलेक्टर ली साहब अपने सरकारी वाहन से उतरकर खुशी से स्कूल के मैदान में नाच उठे थे। उस वक्त विद्यालय की कमान सती रमण प्रसाद के हाथों में थी, जो 28 जनवरी 1933 से 28 फरवरी 1935 तक हेडमास्टर रहे यानी इस ऐतिहासिक भूकंप के गवाह वही बने।

आखिर कौन थे Lee Saheb : इतिहास बताता है कि ब्रिटिश काल में मुंगेर के कलेक्टर बने मिस्टर ली साहेब। वे स्थानीय कारीगरों की बंदूक-निर्माण कला के कायल थे। उन्होंने देखा कि कठिन हालात में भी यहाँ के कारीगर महज चंद पैसों में बेहतरीन बंदूकें बना लेते थे। हालांकि, उस समय चंद पैसों का होना भी बड़ी बात होती थी। ऐसे में ली साहब ने उन कारीगरों को प्रोत्साहित किया। उन्होंने बंदूक फैक्टरी के निर्माण में अहम भूमिका निभायी। एक समय था, जब मुंगेर की बंदूक फैक्टरी देश के नक्शे पर आयुध निर्माण के लिए मशहूर हुआ। आज भी मुंगेर बंदूक फैक्टरी के लिए जाना जाता है। हालांकि अब पहले की तरह इसकी स्थिति नहीं रही। देश आजाद होने के बाद जनवरी 1949 में इस विद्यालय का नाम बदलकर देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद और बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ श्रीकृष्ण सिंह के नाम पर ‘राजेंद्र श्रीकृष्ण उच्च विद्यालय’ रखा गया। खास बात यह कि श्रीबाबू खुद हवेली खड़गपुर विधान सभा क्षेत्र से ही चुनाव जीते थे। स्कूल का नाम बदलने के बाद भी हेडमास्टर की कुर्सी नहीं बदली। शिव दुर्गा बाबू प्रधानाचार्य के रूप में कंटिन्यू कर गए।

शिक्षकों से लेकर आदेशपाल तक ने इसे संवारा : कहा जाता है कि सुरेंद्र बाबू के कार्यकाल तक यह स्कूल अपने स्वर्णिम आभा की चादर ओढ़े रहा। सुरेंद्र बाबू 17 अगस्त 1961 से 31 मई 1986 यानी लगभग 24 साल साढ़े 6 माह रहे। ये शिव दुर्गा बाबू के बाद सबसे अधिक दिन रहे। शिव दुर्गा बाबू लगभग 26 साल साढ़े 4 माह और इंचार्ज के रूप में साढ़े 3 माह रहे। आंकड़े बताते हैं कि 100 साल के इतिहास में लगभग 51 साल तो सिर्फ शिव दुर्गा बाबू और सुरेंद्र बाबू प्रधानाचार्य के पद पर बने रहे। बाकी के 49 साल में 20 लोग बने। वर्तमान में प्रधानाचार्य के पद पर शम्मी कपूर कार्यरत हैं। सुरेंद्र बाबू के बाद प्रधानाचार्य पद की जिम्मेदारी रघुनंदन झा, श्याम सुंदर सिंह, महावीर प्रसाद यादव, मो. महमूद अंसारी, सुरेंद्र प्र. सिंह, सीताराम तांती, जय प्रकाश मोदी, विजय कुमार सिंह, निर्मला कुमारी, मनोज कुमार सिंह, ब्रजेश कुमार, रीता कुमारी जैसे शिक्षाविदों ने अलग-अलग दौर में इस विद्यालय की बागडोर संभाली। वर्तमान में लखनऊ में कार्यरत वरीय पत्रकार व पूर्ववर्ती छात्र डॉ भारतीय बसंत कुमार ने बताया कि इस स्कूल को संवारने में छाती बाबू, ललाट बाबू, महावीर बाबू, सीतराम बाबू, सुभाष चंद्र साहा, हक साहब, लाल सर आदि ने अहम रोल निभाया। इनके पहले मेहता जी, सुरेश बाबू, लखन बाबू, कृष्णनंदन बाबू, जयकरण ठाकुर आदि ने भी इसे अपनी विद्वता से सींचा। आदेशपाल में मुकुंद जी, विमल जी स्टूडेंट्स के बीच काफी लोकप्रिय रहे। उन्होंने यह भी बताया कि उस समय फीस भी खुदरा पैसा में जमा होता था। उजली रसीद पर रिसिविंग मिलती थी। उस समय आना – दो आना का दौर था।

बहरहाल, अनगिनत ऐतिहासिक तथ्यों और स्वर्णिम यादों को अपने आगोश में समेटे राजेंद्र श्रीकृष्ण विद्यालय तत्कालीन प्रधानाचार्य रघुनंदन झा के कार्यकाल तक तो अपनी गरिमा को संजोये रहा। लेकिन यह भी हकीकत है कि 1990 के बाद से यह स्कूल अपने स्वर्णिम काल से गिरता चला जा रहा है। खासकर कोरोना काल के बाद और मोबाइल के इस दौर का इस स्कूल पर भी प्रतिकूल असर पड़ा है। हालांकि, 100 साल का यह सफर सिर्फ ईंट-गारे की इमारत का नहीं, बल्कि एक पूरे क्षेत्र की शिक्षा, पहचान और गौरव की कहानी है। ‘ली हाई इंग्लिश स्कूल’ से ‘राजेंद्र श्रीकृष्ण उच्च विद्यालय’ तक का यह बदलाव बताता है कि कैसे एक अंग्रेज अफसर की इमारत आजादी के बाद देश के दो महान सपूतों के नाम से जुड़कर अमर हो गयी। हवेली खड़गपुर के लिए यह विद्यालय आज भी वह जड़ है, जिससे पूरा इलाका अपनी पहचान पाता है। बस इसकी गरिमा को बरकरार रखने की जरूरत है। इसके लिए स्थानीय प्रबुद्ध लोगों के साथ पूर्ववर्ती छात्रों को भी संकल्प लेने की जरूरत है।
(नोट : अभी इस स्कूल का 100वां साल चल रहा है। इस स्कूल से यदि किन्हीं की यादें और फोटो हों और वे भी अपना स्नेह प्रगट करना चाह रहे हों तो 9507777555 पर व्हाट्सअप कर सकते हैं। इस मंच पर उनकी यादों और विचारों को प्रकाशित किया जाएगा।)