TELANGANA (APP) : बिहार के दबंग नेता आनंद मोहन सहरसा जेल से लगभग 16 साल बाद रिहा हुए। बिहार सरकार कह रह ही है आनंद मोहन ने सजा और परिहार समेत लगभग 22 साल जेल में काटे। आनंद मोहन की सजा माफी और रिहाई को राजपूत समाज सही बता रहा है, जबकि दलित समाज इस रिहाई से नाराज है। इसे लेकर बिहार ही नहीं दिल्ली, हैदराबाद से लेकर तेलगांना में भी हलचल मची हुई है। बिहार में तो इसे लेकर जबर्दस्त सियासत चल रही है। बीजेपी तो गजब की उधेड़बुन में फंसी हुई है। उसे न तो शिकायत करते हुए बन रही है और न ही छोड़ते बन रही है… लेकिन, इससे यदि कोई सबसे अधिक दुखी हैं तो वह हैं जी कृष्णैया की पत्नी और दो बेटियां। जब गोपालगंज में जी कृष्णैया डीएम थे, तब उनकी भीड़ ने हत्या कर दी थी। इसका आरोप सीधा आनंद मोहन पर लगा था। दोष सिद्ध होने के बाद उन्हें फांसी की सजा सुनायी गयी थी। बाद में यह सजा उम्रकैद में बदल गयी। इसी सजा के 14 साल पूरा होने के बाद से ही आनंद मोहन की रिहाई की मांग उठ रही थी। कानूनी अड़चन के की वजह से वे रिहा नहीं हो पा रहे थे। बिहार सरकार ने इस अड़चन को दूर किया। इसके बाद उन्हें रिहा किया गया। ऐसे में आज यहां बिहार में मारे गए आइएएस जी कृष्णैया की Offbeat Stories बताएंगे।

ड़ा कष्ट में बीता बचपन : जी. कृष्णैया आंध्र प्रदेश के रहनेवाले थे। दलित परिवार में उनका जन्म हुआ था। अब उनका पैतृक जिला महबूब नगर तेलंगाना में पड़ता है। कहा जाता है कि जी कृष्णैया काफी गरीब परिवार से। उनका बचपन काफी अभाव और गरीबी में गुजरा था… उनका परिवार आर्थिक रूप से काफी कमजोर था। खाने से लेकर पढ़ाई तक पर संकट था। लेकिन, वे बचपन से ही पढ़ने में काफी तेज थे। उन्होंने गांव में अपनी प्रारंभिक पढ़ाई की और अपनी मेहनत से आगे बढ़ते गए। पढ़ने की ललक और अपने आसपास रह रहे निरीह लोगों को मदद करने के लिए उन्होंने डीएम बनने की सोची। इसके बाद वे और अधिक मेहनत करने लगे। उन्होंने यूपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण की। इस तरह जी कृष्णैया आइएएस बन गए।

पिता कुली का काम करते थे : जी कृष्णैया के पिता कुली का काम करते थे। जमीन-जायदादा नहीं रहने की वजह से घर की हर जरूरत पिता की कमाई पर ही निर्भर थी। उनके बीमार पड़ने पर घर चलाना मुश्किल हो जाता था। ऐसे में जी कृष्णैया भी अपने पिता के साथ कुली का काम करने लगे थे, ताकि दो-चार पैसे घर में आए। लेकिन, जब कृष्णैया ने यूपीएससी की परीक्षा को क्रैक किया तो घर में उम्मीद की किरण जगमगायी। गांव-मुहल्ले के लोग इस परिवार को जानने लगे। इसके बाद आर्थिक तंगी दूर हुई। लेकिन, बाद में ये अनहोनी के शिकार हो गए। जिस समय इनकी हत्या हुई थी, उस वक्त कृष्णैया महज 35 साल के थे।

क्लर्क से लेकर पत्रकार तक की नौकरी : जी कृष्णैया आइएएस बनने के पहले छोटी-छोटी नौकरी भी की। प्राइवेट संस्थानों में क्लर्क बने। इसके पहले पत्रकारिता से भी जुड़ गए थे। दरअसल, ये पढ़ने में तेज थे, सो इन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में आ गए। बस कहीं से भी ईमानदारी के पैसे आए, ताकि घर चलाने में वे अपना योगदान दे सकें। चूंकि आगे बढ़ने की ललक के साथ ही घर चलाने की भी ज्यादा चिंता थी, सो ये पत्रकारिता के बाद एकेडमिक्स में आ गए। यहां भी कुछ दिनों के लिए इन्होंने नौकरी की। इस दौरान उन्होंने लेक्चर के तौर पर काम किया। इसके बाद क्लर्क की नौकरी में आ गए, लेकिन इन्होंने आईएएस बनने के अपने सपने को हमेशा जिंदा रखा और इन्होंने अपने सपने को पूरा करने के लिए पढ़ाई में रात-दिन एक कर दी। परिवार चलाने के लिए इन्हें नौकरी करते रहना भी जरूरी था, इसलिए क्लर्क की भी नौकरी ईमानदारी से कर रहे थे। 1985 में इनके अच्छे दिन आ गए, जब आईएएस के रूप में सफलता इनके घर चलकर आयी।

बिहार कैडर मिला तो खुशी से झूम गए : जी कृष्णैया यूपीएसएसी परीक्षा पास करने के बाद से ही काफी खुश थे। जब इन्हें बिहार कैडर मिला तो ये खुशी से झूम उठे। इनके पंख को मानो परवाज लग गया था। इस खुशखबरी से पूरा राज्य खुशी से झूम उठा था कि एक कुली का बेटा कलक्टर बन गया। कुली का बेटा ही नहीं, बल्कि इन्होंने खुद कुली का काम किया था। बिहार में भी इनकी सादगी देखने को मिली। इन्होंने बिहार के लोगों को अपने राज्य की तरह सेवा की। ये इतने सीधे और सादगी से रहते थे कि इनसे कभी भी और कोई भी मिल सकता था। ये बिहार में जहां भी रहे, ईमानदारी से काम किया। जब वारदात हुई थी तो उस वक्त ये गोपालगंज के डीएम थे। गोपालगंज के लोग आज भी तत्कालीन डीएम जी कृष्णैया को याद कर भावुक हो उठते हैं। लोग कहते भी हैं कि वे बहुत ही सादगी पसंद अधिकारी थे और उनका दरवाजा लोगों के लिए कभी बंद नहीं होता था।

टना को याद कर कांप उठता है ड्राइवर : घटना को याद कर चश्मदीद ड्राइवर दीपक कांप उठते हैं। वे कहते भी हैं कि 5 दिसंबर 1995, यही वह मनहूस तारीख थी, जब जी कृष्णैया के लिए भीड़ काल बनकर आयी। इनकी जान भी इनकी सादगी की वजह से ही चली गयी। वे बताते भी हैं कि किस तरह भीड़ ने इनकी सादगी की वजह से जान ले ली। ये चाहते तो गाड़ी घुमाकर भाग सकते थे, लेकिन इनका बॉडीगार्ड भीड़ में फंस गया था और उसे छोड़ कर जाना नहीं चाहते थे। फिर ये इस बात को नहीं समझ सके कि भीड़ इतनी अधिक हिंसक हो गयी है। इन्हें लगा कि लोगों को समझाएंगे तो वे सब मान जाएंगे, लेकिन होनी तो कुछ और ही थी। इनकी बात किसी ने नहीं सुनी और भीड़ में शामिल लोग इन पर टूट पड़े। फिर जो कुछ हुआ उसे पूरा बिहार और पूरा देश ने देखा। एक ईमानदार आईएएस अफसर को देश ने खो दिया। बाद में इनकी पत्नी उमा कृष्णैया को आंध्र प्रदेश सरकार ने अनुकंपा पर शिक्षक की नौकरी दी। तब उनकी पत्नी ने बच्चों की पर​वरिश की।

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