रेल यात्रा में मिला अनोखा दंपति: 75 के नारायण और 70 की उषा हिमालय की 15 हजार फुट चढ़ाई कर लौटे, 50 साल से घूम रहे गुमनाम भारत

Mukhiyajee Reporter | Patna

‘यात्रा करो, मगर किसी को बताओ नहीं।’ वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र ने अपने फेसबुक पोस्ट में इस सूक्ति वाक्य के साथ एक ऐसे दंपति का जिक्र किया है, जो उन्हें हाल की एक रेल यात्रा में मिला। महाराष्ट्र के कल्याण के नारायण (75 साल) और उषा (70 साल) हिमालय की 15 हजार फुट ऊंची चढ़ाई करके लौट रहे थे। पिछले लगभग 50 साल से यात्रा कर रहा यह दंपति नौकरी और घर-परिवार के दिनों में साल में दो-तीन यात्राएं करता था, जबकि अब हर दो महीने में एक ट्रिप करता है। मोबाइल और सेल्फी के इस दौर में दोनों न यात्रा वृत्तांत लिखते हैं, न सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं। बस घूमते हैं और अपनी आंखों से नजारों का आनंद लेते हैं। पढ़िए उनकी अक्षरशः पूरी रिपोर्ट…

यात्रा करो, मगर किसी को बताओ नहीं… आपने यह स्लोगन इन दिनों खूब सुना होगा। मोबाइल और सेल्फी के युग में इंसान आज अपने हर अनुभव को तस्वीरों और वीडियो के जरिए सोशल मीडिया पर डाल देता है। हर टूरिस्ट प्लेस पर लोग मोबाइल उठाए वीडियो बनाते नजर आते हैं, देखते कम हैं, दिखाते अधिक। ऐसे में यह सूक्ति वाक्य अब कहा जाता है कि यात्रा कुछ इस तरह कीजिए कि उसका ढिंढोरा पीटने की जरूरत न हो। दरअसल, आज एक रेल यात्रा में ऐसे ही एक दंपति मिले। महाराष्ट्र के कल्याण के नारायण (75 साल) और उषा (70 साल) जो हिमालय की 15 हजार फुट ऊंची चढ़ाई करके लौट रहे थे। यह दंपति लगभग पिछले पचास साल से यात्रा कर रहा है। जब नौकरी चाकरी और घर परिवार के चक्कर थे तो साल में दो या तीन यात्राएँ करता था, अब हर दो महीने में एक ट्रिप।

इन्होंने लगभग पूरा देश घूम लिया है। इनके किस्सों में एलेप्पी से लेकर हिमालय तक के किस्से हैं। महाराष्ट्र के आदिवासी गांवों की कहानियां हैं। मगर कोई बड़ा टूरिस्ट स्पॉट नहीं। ज्यादातर अल्पज्ञात टूरिस्ट स्टेशन। जिनके बारे में कम लोगों को पता है। जहां भीड़ कम होती है। जहां पहुंचना मुश्किल है। जहां सड़क नहीं जाती। जहां ठहरने के लिए होटल कम हैं। अपने बैग पैक के पोर्टेबल स्टोव, चावल, डाल और टेंट लेकर चलने वाला यह दंपति बाहर का खाना पंसद नहीं करता। चाय से लेकर खिचड़ी तक खुद पकाता है। गांवों में किसी के घर ठहर जाता है और उन्हें इसका किराया देता है। ऊषा बताती हैं कि आदिवासी बस्तियों में आज भी लोग 150 रुपए में खाना खिला देते हैं। रहने की जगह मिल जाती है। नारायण बताते हैं कि उन्होंने कई बार स्टेशन पर रात गुजारी है। ज्यादातर यात्राएं ट्रेन से की हैं, पहले स्लीपर क्लास में जाते थे और अब थर्ड एसी या इकॉनमी क्लास। घूमते हैं, मगर पैसे नहीं उड़ाते। कम खर्च में घूमने की कला विकसित की है।

इस उम्र में जहां ज्यादातर बुजुर्गों की रुचि तीर्थाटन की तरफ हो गयी है, इसकी प्राथमिकता अभी भी प्रकृति और गुमनाम इलाकों की तलाश है। भारत में ही घूमते हैं, विदेश भ्रमण की ललक नहीं है। आजकल हिमालय उनकी प्राथमिकता में है। बहुत सहज लोग हैं। मुश्किल से खुलते हैं, मगर एक बार आदमी जम जाए तो सारे अनुभव बताते हैं। मैंने पूछा, आप अपने अनुभव लिखते नहीं। तो कहा 2000 से पहले डायरी में लिखता था, अब बंद कर दिया। न यात्रा वृत्तांत लिखते, न सोशल मीडिया पोस्ट करते। बस घूमते हैं और खुश होते हैं। सफर का और नजारों का अपनी आंखों से आनंद लेते हैं। मैंने बहुत झिझकते हुए कहा कि आप दोनों की तस्वीर ले लूं। नारायण ने तो मना कर दिया, मगर उषा तैयार हो गयीं। फिर बात बन गयी।