Mukhiyajee Reporter | Patna (Rajesh)
खुद को सबसे पढ़ा-लिखा, सबसे जागरूक और सबसे समझदार बताने वाली राजधानी पटना ने एमएलसी चुनाव में अपनी ‘असलियत’ दिखा दी है। शुक्रवार को विधान परिषद की आठ सीटों के लिए हुए मतदान में पटना के शिक्षक और स्नातक मतदाता वोट डालने में पूरे राज्य में सबसे पीछे रहे। डिग्री लेकर और क्लास में लोकतंत्र का पाठ पढ़ाकर भी जब घर से निकलकर एक वोट डालने की जहमत नहीं उठायी जा सके, तो ऐसी पढ़ाई और ऐसी जागरूकता पर सवाल उठना लाजिमी है। जिस शहर को बिहार की बौद्धिक राजधानी कहा जाता है, उसने वोटिंग में अपनी साख ‘मिट्टी’ में मिला दी है। निर्वाचन आयोग के अनुसार शाम 4 बजे तक शिक्षक सीट पर सबसे ज्यादा 87.16 प्रतिशत वोटिंग सारण में हुई, जबकि पटना में यह आंकड़ा सिर्फ 56.89 प्रतिशत रहा। स्नातक सीट पर कोसी 52.51 प्रतिशत के साथ सबसे आगे रहा, वहीं पटना महज 36.19 प्रतिशत पर अटक गया। हालांकि, यह रिपोर्ट मतदान समाप्ति के समय तक की है और अंतिम आंकड़े कुछ बढ़ सकते हैं।

आंकड़ों को करीब से देखें तो पटना की हालत और शर्मनाक नजर आती है। शिक्षक क्षेत्रों में सारण के बाद दरभंगा 79.00 और तिरहुत 78.10 प्रतिशत के साथ काफी आगे रहे। चारों शिक्षक सीटों का कुल मतदान प्रतिशत 74.55 रहा, यानी पटना अपने ही राज्य के औसत से करीब 17.66 अंक पीछे रह गया। सारण से उसका फासला 30 अंक से भी ज्यादा का है। स्नातक सीटों पर भी यही हाल रहा। तिरहुत में 42.15 और दरभंगा में 42.00 प्रतिशत वोट पड़े और चारों सीटों का औसत 43.87 रहा। पटना इस औसत से भी लगभग 7.7 अंक नीचे रहा और कोसी से उसका अंतर 16 अंक से अधिक का है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस राजधानी में सबसे ज्यादा शिक्षित और सुविधा संपन्न मतदाता रहते हैं, वही लोकतंत्र के इस पर्व में सबसे ज्यादा उदासीन क्यों दिखा। विधानसभा या लोकसभा चुनाव में कम मतदान के लिए अक्सर अशिक्षा और जागरूकता की कमी को दोष दिया जाता है। लेकिन विधान परिषद के इन चुनावों में तो वोटर वही हैं, जिन्होंने डिग्री हासिल की है या जो खुद बच्चों को पढ़ाते हैं। यहां न अनपढ़ता का बहाना है, न जानकारी के अभाव का। ऐसे में वोट डालने नहीं निकलना जागरूकता की कमी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना है।

बहरहाल, जो वर्ग समाज को नसीहत देता है कि वोट देना हर नागरिक का कर्तव्य है, उसी के बड़े हिस्से का घर बैठे रह जाना बेहद चिंताजनक है। विधान परिषद में शिक्षकों और स्नातकों की आवाज उठाने वाले प्रतिनिधि चुने जाते हैं। जब पटना जैसे केंद्र के मतदाता ही इसे गंभीरता से नहीं लेंगे, तो अपने मुद्दों पर प्रतिनिधियों से जवाब मांगने का नैतिक हक भी कमजोर होता है। सारण, कोसी, तिरहुत और दरभंगा के मतदाताओं ने जिस उत्साह से मतदान किया, उससे राजधानी के पढ़े-लिखे वर्ग को सबक लेने की जरूरत है। फिलहाल तो आंकड़े यही कहते हैं कि सबसे ज्यादा पढ़े-लिखों के शहर ने लोकतंत्र की परीक्षा में सबसे कम अंक पाए हैं।







