Mukhiyajee Reporter | Patna
साहित्याचार्य पंडित महेंद्र मिश्र ‘मग’ बांका के शंभूगंज प्रखंड के छतहार गाँव के रहने वाले थे। उनकी साहित्यिक विरासत काफी समृद्ध रही थी। वेदाचार्य ब्रजेश मिश्र के अनुसार साहित्याचार्य पंडित महेंद्र मिश्र ‘मग’ भागलपुर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ‘गंगा’ और ‘हलधर’ के संपादन से जुड़े रहे थे और अपने समय में बिहार के प्रमुख गद्य-लेखकों में गिने जाते थे। उन्होंने बताया कि इसके प्रमाण 1942 में प्रकाशित जयंती स्मारक ग्रंथ सहित अन्य प्रकाशित दस्तावेजों में दर्ज हैं। उन्होंने बताया कि जयंती स्मारक ग्रंथ में भागलपुर की पत्रकारिता के इतिहास के क्रम में ‘गंगा’ का उल्लेख है, जिसके संपादन मंडल में साहित्याचार्य ‘मग’ भी शामिल हुए थे। ‘गंगा’ के बंद होने के बाद उसकी जगह साप्ताहिक ‘हलधर’ ने ली, जो पंडित गौरीनाथ झा के संपादन में 1936 से प्रकाशित हो रहा था।


ग्रंथ के अनुसार ‘मग’ जी उसके संपादन-विभाग में थे। उसी ग्रंथ में बिहार के गद्य-लेखकों की सूची में ‘साहित्याचार्य मग’ का नाम दर्ज है। ग्रंथ के अंत में संपादकों ने यह भी लिखा है कि साहित्याचार्य पंडित महेंद्र मिश्र ‘मग’ ने ग्रंथ का प्रूफ देखने में बहुत परिश्रम किया। उनकी तस्वीर के साथ उन्हें भागलपुर जिला निवासी लिखा गया है। उस समय बांका भागलपुर जिले का ही हिस्सा था। वैदिक साहित्य से भी उनका जुड़ाव दर्ज है। ‘ऋग्वेद-संहिता (सरल हिन्दी टीका सहित)’ के चतुर्थ अष्टक के शीर्षक पृष्ठ पर टीकाकार वाले खंड में पंडित रामगोविंद त्रिवेदी वेदांत शास्त्री और पंडित गौरीनाथ झा व्याकरणतीर्थ के साथ उनका नाम भी दिया गया है। उनके नाम के नीचे गंगा संपादक लिखा हुआ है। पुस्तक का प्रकाशन सुलतानगंज की वैदिक पुस्तकमाला से हुआ था और प्रथम संस्करण में 3000 प्रतियों का उल्लेख मिलता है।

‘गंगा’ के पुरातत्त्वांक की विषय-सूची में उनके दो लेख दर्ज हैं। ‘भारतीयों का लिपि ज्ञान’ पृष्ठ 186 पर और ‘भारत के सिक्के’ पृष्ठ 194 पर प्रकाशित है। दोनों लेखों के नीचे पत्रिका के मूल पृष्ठों पर ‘साहित्याचार्य मग’ नाम छपा हुआ है। इसी पत्रिका में ‘संसार की भाषाएँ’ शीर्षक का एक और लेख भी उनके नाम से मिलता है। इन रचनाओं के विषय भारतीय भाषा, लिपि, इतिहास और प्राचीन मुद्राओं के प्रति उनकी गहरी अध्ययनशील रुचि दर्शाते हैं। किसी भी गांव का इतिहास लिखते समय केवल भौगोलिक, सामाजिक और धार्मिक परंपराओं का वर्णन पर्याप्त नहीं होता। गांव से जुड़े साहित्यकारों, विद्वानों और ज्ञान-साधकों में उनके योगदान की अनदेखी नहीं की जा सकती है।







