- नेत्रहीन बच्चों संग खेला क्रिकेट, पिंजरे से तोता कराया आजाद
- गया शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के विधान पार्षद जीवन कुमार ने जीते दिल
- बजट सत्र में शिक्षकों के हित में खड़ा रहे, जनहित मुद्दों पर अपनी ही सरकार को घेरा
Rajesh Thakur | Patna
गया शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के भाजपा विधान पार्षद जीवन कुमार इन दिनों काफी सुर्खियों में हैं। अबकी होली उन्होंने सियासत से परे जाकर एक अलग रंग ही बिखेरा। यह रंग सियासत से भी कहीं अधिक चटक रंग है। यह रंग है भावुकता का, यह रंग है संवेदना का और यह रंग है अपनापन का। उनका नेत्रहीन बच्चों के साथ स्कूल कैंपस में उतरकर क्रिकेट खेलने का वाकया हो या फिर सड़क किनारे पिंजरे में कैद बेजुबान पक्षियों को आजाद कराने का मामला हो, जीवन कुमार के हालिया कदमों ने उनकी सार्वजनिक छवि को एक अलग भावनात्मक आयाम दिया है। पिछले दिनों पटना के कंकड़बाग स्थित नेत्रहीन विद्यालय में बच्चों के साथ क्रिकेट खेलते हुए वे केवल जनप्रतिनिधि नहीं, बल्कि उनके साथी खिलाड़ी, उनके अभिभावक बनकर सामने आए। वहीं, होली की पूर्व संध्या पर पटना के ही मेरीन ड्राइव पर कई तोतों को पिंजरे से मुक्त कराकर उन्होंने संवेदना और करुणा का संदेश दिया। इन दो प्रसंगों ने यह संकेत दिया है कि राजनीति के साथ मानवीय स्पर्श जुड़ जाए तो वह सीधे दिलों तक पहुंचती है।

दरअसल, सत्ता के गलियारों में अक्सर आवाजें राजनीति से लेकर दलगत सीमाओं में सिमट जाती हैं। वे इससे इतर कदम उठाते नहीं हैं। लेकिन गया शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से विधान पार्षद जीवन कुमार ने हाल के दिनों में यह साबित करने की कोशिश की है कि जनप्रतिनिधि की पहली निष्ठा जनता से होती है, न कि केवल सत्ता से। बजट सत्र 2026 में अपनी ही सरकार से तीखे सवाल पूछकर शिक्षक मुद्दों पर उसे कटघरे में खड़ा करना हो, या फिर सदन से बाहर निकलकर समाज के संवेदनशील क्षणों में सहज भागीदारी निभानी हो, उनकी सक्रियता ने जीवन कुमार को एक अलग पंक्ति में ला खड़ा किया है। सत्ता पक्ष में रहते हुए भी विपक्ष से अधिक मुखर दिखना और साथ ही जमीन पर मानवीय पहल से जुड़ना, उनकी राजनीति को विशिष्ट बनाता है।

लेकिन, पिछले दो वाकयों ने तो विधान पार्षद जीवन कुमार को इंसानियत के एक नये रूप में सामने ला दिया है। पिछले सप्ताह पटना के कंकड़बाग स्थित नेत्रहीन बच्चों के विद्यालय में पहुंचकर जीवन कुमार ने औपचारिक भाषणों से परे जाकर एक अलग ही दृश्य रचा। उन्होंने वहां पढ़ रहे नेत्रहीन बच्चों के साथ क्रिकेट खेला। बहुत भावुक करने वाला दृश्य था। वही क्रिकेट, जो दृष्टि से नहीं, एहसास और विश्वास से खेला जाता है। जब बल्ले से टकराती गेंद की आवाज पर बच्चे मुस्कुराए और तालियां बजीं, तो वहां मौजूद लोग भावुक हो उठे। जीवन कुमार खुद बच्चों का हौसला बढ़ाते नजर आए। कभी गेंद फेंकते, कभी बैट थमाते, तो कभी उनके कंधे पर हाथ रखकर उत्साह बढ़ाते। उन्होंने बातचीत में मुखियाजी डॉट कॉम को बताया कि बच्चों के लिए यह केवल एक खेल नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का उत्सव है। सोशल मीडिया पर साझा तस्वीरों में उनकी सहज मुस्कान और बच्चों की खिलखिलाहट ने यह संदेश दिया कि जनप्रतिनिधित्व का असली अर्थ सहभागिता है।
नेत्रहीन बच्चों के साथ क्रिकेट खेलने का मामला अभी ताजा ही था कि एक नया भावुक करने वाला उनका मामला सामने आया है, जो लोगों को गहराई से छुआ है। दरअसल, रविवार 1 मार्च को पटना मेरीन ड्राइव के पास हुए एक और वाकये ने लोगों का दिल जीत लिया है। कहा जाता है कि जीवन कुमार रविवार को अपने व्यक्तिगत कार्य से गया जा रहे थे। इस दौरान उनकी नजर पिंजरों में कैद कई तोतों पर नजर पड़ी। कुछ पल ठिठककर उन्होंने उन पक्षियों को देखा- फड़फड़ाते पंख, सीमित आकाश और बेचैन आंखें। उन्होंने पिंजरे वाले से बातचीत की, आग्रह किया और अंततः उस तोतों को अपने हाथों से मुक्त कराया। जैसे ही पिंजरे का दरवाजा खुला और हरे पंखों वाला वह पक्षी खुले आसमान की ओर उड़ चला, वहां मौजूद लोगों ने तालियां बजायीं। जीवन कुमार ने कहा, ‘स्वतंत्रता केवल इंसान का अधिकार नहीं, हर जीव की प्रकृति है। इन बेजुबान पक्षियों को आजाद कर, उन्हें उनके असली घर यानी इस खुले आसमान में वापस भेजते हुए मन को असीम शांति मिली। आजादी पर हर जीव का अधिकार है, चाहे वह इंसान हो या परिंदा। आइए, हम सब मिलकर प्रकृति और इन मासूम जीवों के प्रति करुणा का भाव रखें। यह दृश्य केवल एक पक्षी की रिहाई नहीं, बल्कि संवेदना की अभिव्यक्ति है। बहरहाल, जीवन कुमार की बातों में कोई राजनीतिक बयान नहीं था, केवल करुणा की सच्ची अनुभूति थी। आसपास खड़े लोगों के लिए यह महज तोतओं की रिहाई नहीं, बल्कि संवेदना का जीवंत पाठ बन गया। आज रविवार को मेरीन ड्राइव पर केवल एक पिंजरा नहीं खुला था, मानो इंसान और प्रकृति के बीच का एक रिश्ता फिर से जीवित हो उठा।



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