Rajesh Thakur / Patna : बिहार विधानसभा चुनाव के बाद अब पंचायत चुनाव की बारी है। इसी साल चुनाव होना है। अगस्त के बाद इसकी अधिसूचना किसी भी समय आ सकती है। दिसंबर के पहले अनिवार्य रूप से चुनाव करा लेना है। लेकिन, इससे पहले इसे लेकर जनगणना, परिसीमन से लेकर पेंशन तक के मामले सामने आने लगे हैं। दरअसल, जिस चुनाव को स्थानीय विकास और जनभागीदारी का उत्सव माना जाता रहा है, वह इस बार जनगणना, परिसीमन और पेंशन जैसे बुनियादी मुद्दों में उलझता दिखायी दे रहा है। एक ओर पंचायत प्रतिनिधि अपनी सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा को लेकर आवाज बुलंद कर रहे हैं, तो दूसरी ओर पंचायतों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व को लेकर असंतोष गहराता जा रहा है। गांव से लेकर राजधानी पटना तक उठती इन मांगों ने संकेत दे दिया है कि आने वाला बिहार पंचायत चुनाव सिर्फ प्रत्याशियों की नहीं, बल्कि व्यवस्था की परीक्षा बनने जा रहा है। पंचायती संगठनों की मांगों की अनदेखी से नाराज जनप्रतिनिधि हों या आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व की मांग- इन सवालों के बीच यह आशंका भी जतायी जा रही है कि यदि समय रहते समाधान नहीं निकला, तो पंचायत चुनाव का एजेंडा विकास से हटकर संघर्ष और असंतोष की ओर खिसक सकता है।

लंबे समय से मांग कर रहे हैं पंचायत प्रतिनिधि : इस बार के पंचायत चुनाव की चर्चा जातीय समीकरणों या स्थानीय जोड़-तोड़ से आगे निकलकर व्यवस्था के सवालों तक पहुंच चुकी है। पंचायत प्रतिनिधियों के संगठन खुलकर कह रहे हैं कि यदि चुनाव से पहले उनकी बुनियादी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं हुआ, तो चुनावी माहौल सहज नहीं रहेगा। खासकर, प्रदेश मुखिया संघ और प्रदेश पंच-सरपंच संघ सहित अन्य संगठनों ने तो यहां तक कह दिया है कि पंचायतों के नए परिसीमन तो हो ही, लेकिन उससे पहले पंचायतस्तर पर जनगणना करायी जाए। वर्तमान में बिहार में पंचायत राज व्यवस्था के अंतर्गत 8053 मुखिया, 8053 पंचायत समिति सदस्य और 1161 जिला पार्षद के पद हैं। बाकी पंच, सरपंच और वार्ड सदस्यों को जोड़ दिया जाए तो चुनावी पदों की संख्या सवा दो लाख से अधिक हो जाती है। इसमें सबसे ज्यादा पद पंच और वार्ड सदस्य की है। ये ऐसे प्रतिनिधि हैं, जो सरकार की योजनाओं को जमीन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाते हैं। इसके बावजूद, इन प्रतिनिधियों की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा आज भी एक बड़ा सवाल बनी हुई है। अधिसंख्य जनप्रतिनिधियों को कार्यकाल समाप्त होने के बाद न तो कोई पेंशन मिलती है और न ही भविष्य की कोई सुनिश्चित व्यवस्था। यही कारण है कि पंचायत प्रतिनिधियों की ओर से लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि उन्हें न्यूनतम पेंशन, बीमा और सामाजिक सुरक्षा दी जाए।

सुरक्षा क्यों जरूरी : पंचायत प्रतिनिधियों का तर्क है कि पंचायत स्तर पर काम करने वाला जनप्रतिनिधि सबसे ज्यादा जनता के संपर्क में रहता है, लेकिन सबसे ज्यादा असुरक्षित भी वही होता है। कई प्रतिनिधियों के लिए पंचायत चुनाव जीतना सेवा से ज्यादा जोखिम बन गया है। नीतीश सरकार में भत्ते तो जरूर बढ़े, लेकिन उनका भविष्य अब भी अनिश्चित है। दरअसल, राज्य सरकार की ओर से पिछले वर्षों में पंचायत प्रतिनिधियों के भत्तों में कुछ इजाफा किया गया है। जिला परिषद अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मुखिया समेत सभी प्रतिनिधियों के मानदेय में कुछ न कुछ बढ़ोतरी हुई है। लेकिन प्रतिनिधियों का कहना है कि यह व्यवस्था केवल कार्यकाल के दौरान तक सीमित है। पेंशन और बीमा की मांग इसलिए तेज हुई है क्योंकि बड़ी संख्या में पंचायत प्रतिनिधि चुनाव के बाद दोबारा किसी रोजगार या आय के स्रोत से नहीं जुड़ पाते हैं। यह स्थिति खासकर ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले प्रतिनिधियों के लिए अधिक गंभीर बतायी जा रही है। बता दें कि आए दिन कभी मुखिया तो कभी पंच-सरपंच की हत्याएं हो रही हैं। चुनावी दुश्मनी की वजह से भी हिंसात्मक घटनाएं हो रही हैं। विभिन्न पंचायती संगठनों की मानें तो पंचायत स्तर पर बढ़ते विवाद, भूमि-संबंधी झगड़े, योजनाओं के चयन और क्रियान्वयन को लेकर होने वाले टकराव ने पंचायत प्रतिनिधियों की सुरक्षा को भी बड़ा मुद्दा बना दिया है। कई जिलों से यह शिकायत सामने आती रही है कि योजनाओं में लाभार्थियों के चयन को लेकर प्रतिनिधियों पर सामाजिक और राजनीतिक दबाव रहता है। संगठनों का यह भी कहना है कि प्रशासनिक संरक्षण और स्पष्ट कानूनी समर्थन के बिना पंचायत व्यवस्था को प्रभावी बनाना कठिन होता जा रहा है। यह सवाल अब केवल व्यक्तिगत सुरक्षा का नहीं, बल्कि पूरे स्थानीय शासन की विश्वसनीयता से जुड़ गया है। लेकिन सुरक्षा से हटकर पंचायत चुनाव से पहले सबसे जटिल और संवेदनशील मुद्दा जनगणना, परिसीमन और पेंशन बन गया है।
बहुत बढ़ गयी है जनसंख्या : प्रदेश मुखिया संघ के अध्यक्ष मिथिलेश कुमार राय का कहना है कि देश और बिहार में अंतिम जनगणना 2011 में हुई है। 2021 में जनगणना नहीं करायी गयी थी। 25 दिसंबर को प्रदेश मुखिया संघ की बैठक हुई थी। इसमें अन्य संगठन के लोग भी शामिल हुए थे। इस बैठक में सर्वसम्मति से पंचायतों के परिसीमन का प्रस्ताव पारित किया गया और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से सार्थक पहल की अपेक्षा जतायी गयी है। बैठक की अध्यक्षता करते हुए मुखिया संघ के प्रदेश अध्यक्ष मिथिलेश कुमार राय ने कहा कि 1991 की जनगणना के आधार पर बिहार में वर्ष 2001 में पंचायतों का परिसीमन हुआ था। उसके बाद पंचायतों की जनसंख्या लगभग ढाई गुना बढ़ चुकी है। फिर माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत में भी कहा गया है कि 25 वर्ष के बाद किसी भी देश की आबादी दुगुनी हो जाती है और यह शहर तथा पंचायत पर भी लागू होता है। यहां तो 35 साल होने को है। ऐसे में परिसीमन अतिआवश्यक है। कई जिलों और प्रखंडों में कुछ पंचायतों का क्षेत्रफल 10 वर्ग किलोमीटर से भी अधिक है। इससे वहां विकास कार्य बाधित हो रहे हैं और प्रशासनिक उपेक्षा बढ़ी है। वहीं, नगर निकायों के गठन और उनके क्षेत्र विस्तार के कारण कई पंचायतों का विखंडन एवं पुनर्गठन अव्यवस्थित ढंग से किया गया। इससे गंभीर विसंगतियां उत्पन्न हुई हैं। पुनर्गठन के दौरान कुछ ऐसे पंचायत वार्ड बनाए गए हैं, जिनकी जनसंख्या मात्र 100 के आसपास है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें वार्ड का दर्जा दिया जाना 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के प्रविधानों का स्पष्ट उल्लंघन है। संविधान के अनुसार, प्रत्येक 10 वर्ष में जनगणना के बाद परिसीमन एवं उसी आधार पर आरक्षण लागू किया जाना अनिवार्य है। दूसरी ओर, पंच-सरपंच संघ के अध्यक्ष अमोद निराला ने कहा कि पंचायत प्रतिनिधि भी चुन कर आते हैं। लेकिन इन्हें सांसद, विधायक और विधान पार्षद की तरह पेंशन नहीं दी जाती है। उन्होंने कहा कि या तो पंचायत प्रतिनिधियों को भी पेंशन दी जाए अथवा माननीय प्रतिनिधियों की पेंशन बंद कर उस पैसे को राज्य के विकास में लगाया जाए।

तो पंचायतों की संख्या हो जाएगी लगभग 20 हजार : संगठनों की मानें तो नयी जनगणना के आधार पर परिसीमन होगा तो 8 हजार की जगह पंचायतों की संख्या 20 हजार के आसपास हो जाएगी। वहीं सभी कैटेगरी के पदों की संख्या 10 लाख के आसपास हो जाएगी। उनका साफ कहना है कि जब पंचायतों की आबादी पिछले 30-35 साल में लगभग दुगुनी हो गयी है, तो प्रतिनिधित्व अब भी पुराने परिसीमन के आधार पर क्यों हो? कई पंचायतों में आज एक मुखिया या सरपंच पर अत्यधिक जनसंख्या का भार है, जिससे न केवल प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होता है, बल्कि जनप्रतिनिधियों और जनता के बीच दूरी भी बढ़ती है। हालांकि प्रशासनिक स्तर पर यह स्पष्ट किया गया है कि आगामी पंचायत चुनाव पुराने परिसीमन के आधार पर ही कराए जाएंगे और नया परिसीमन जनगणना के बाद ही संभव है। लेकिन यही स्थिति अब असंतोष का कारण बनती जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंचायत प्रतिनिधियों की ये मांगें केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक दबाव का भी संकेत हैं। चुनाव से पहले उठने वाली ये आवाजें यह दिखाती हैं कि ग्राम स्तर पर भी अब प्रतिनिधि अपने अधिकारों को लेकर संगठित हो रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इन मुद्दों को नजरअंदाज किया गया, तो पंचायत चुनाव का एजेंडा विकास से हटकर संघर्ष और असंतोष की ओर मुड़ सकता है।


क्या सरकार लेगी गंभीरता से : बहरहाल, बिहार में पंचायत चुनाव से पहले उठते जनगणना, परिसीमन, पेंशन और सुरक्षा के सवाल यह साफ कर रहे हैं कि गांव की सरकार अब केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं रह गयी है। यह चुनाव इस बात की भी परीक्षा होगी कि राज्य व्यवस्था ‘ग्राउंड लोकतंत्र’ कितनी गंभीरता से लेती है। यदि समाधान समय रहते नहीं निकला, तो पंचायत चुनाव विकास के बजाय व्यवस्था पर सवालों का मंच बन सकता है। पंचायत चुनाव से पहले उठती ये मांगें यह साफ करती हैं कि बिहार का गांव अब सिर्फ वोट डालने की इकाई नहीं, बल्कि नीति और अधिकार की मांग करने वाला सक्रिय लोकतांत्रिक मंच बन चुका है। पेंशन से लेकर परिसीमन तक की बहस आने वाले दिनों में और तेज होगी और यही बहस तय करेगी कि पंचायत चुनाव सिर्फ प्रक्रिया बनकर रहेंगे या व्यवस्था में बदलाव का माध्यम बनेंगे।




