PATNA (RAJESH THAKUR) : बिहार में आठ हजार से अधिक मुखिया इन दिनों अपनी विभिन्न मांगों को लेकर हड़ताल पर चल रहे हैं। उन्होंने अपने अधिकारों में कटौती किये जाने से नाराज हैं और गुस्से में हैं। इसे लेकर मुखिया संघ ने लंबी हड़ताल कर दी है। 16 अगस्त से शुरू हुई यह हड़ताल 31 अगस्त तक चलेगी। इस बीच, प्रखंड स्तर पर उनका आंदोलन भी चल रहा है।

मुखिया संघ के प्रदेश अध्यक्ष मिथिलेश कुमार राय ने ऐलान कर दिया है कि उनकी लड़ाई केंद्र और राज्य, दोनों सरकारों से है। यदि मांगें पूरी नहीं होती है तो आंदोलन और अधिक तेज होगा। बात नहीं बनने पर पूरे बिहार के मुखिया एक साथ सामूहिक इस्तीफा भी दे सकते हैं। दूसरी ओर, पंच-सरपंच भी अलग तेवर में हैं। पंचायती राज विभाग के ताजा आश्वासन के बाद से पंच-सरपंच अंदर ही अंदर काफी गदगद हैं। वे अब मुखिया की ओर से कराए जा रहे हैं कार्यों की समीक्षा भी कर सकते हैं। सूत्रों की मानें तो मुखिया की हड़ताल की अघोषित वजह यही है। पंच-सरपंच के प्रदेश अध्यक्ष अमोद कुमार निराला कहते हैं कि यदि मुखिया को हड़ताल पर जाना था तो वे अपना चार्ज उपमुखिया को देकर जाते। अब देखना दिलचस्प होगा कि मुखिया संघ की हड़ताल का सरकारों पर क्या असर होता है और पंच-सरपंच संघ के तेवर और कितने कड़े होते हैं ?  

क्या कहता है बिहार मुखिया संघ : बिहार मुखिया संघ के प्रदेश अध्यक्ष मिथिलेश राय का कहना है कि बिहार में मुखियाओं की लगातार हत्याएं हो रही हैं। हमारा संघ राज्य की सरकार से सुरक्षा के लिए आर्म्स लाइसेंस की मांग कर रहा है, लेकिन इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। इसके अलावा मुखियाओं के अधिकारों में कटौती की जा रही है। उन्होंने कहा कि मुखियाओं की वेतन बढ़ोतरी सुरक्षा के साथ-साथ ग्राम पंचायत को पुनः जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र बनाने का अधिकार दिया जाए। मनरेगा में ग्राम पंचायत को प्रशासनिक अधिकार पंचायती राज विभाग की तरह 20 लाख तक किया जाए। ग्राम पंचायत को भुगतान का अधिकार दिया जाए। मनरेगा में मजदूरी दर बढ़ायी जाए तथा बाजार दर के अनुसार समय पर भुगतान सुनिश्चित कराया जाए। ग्राम पंचायतों को 73वां संविधान संशोधन के तहत प्रदत्त 29 अधिकारों को पूर्णरूपेण सौंपा जाए। ग्राम पंचायतों को राजस्व कर वसूली का हिस्सा सभी मदों से उपलब्ध कराया जाए। इसी तरह की अन्य मांगें हैं। 

क्या कहता है पंच-सरपंच संघ : पंच-सरपंच संघ के प्रदेश अध्यक्ष अमोद कुमार निराला कहते हैं कि पंचायती राज व्यवस्था का आधार स्तंभ पंच परमेश्वर है। इनका विरोध-अपमान किसी भी राजनेता को काफी महंगा पड़ेगा। पंच-सरपंच व उपसरपंच किसी दल, जाति अथवा नेता के गुलाम नहीं हैं और न ही वे किसी दल के टिकट पर चुनाव जीतते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पंचायत स्तरीय विकासात्मक कार्यों की समीक्षा, जांच, प्रहरी की नियुक्ति, मानदेय भत्ता की बढ़ोतरी, रक्षा-सुरक्षा में पुलिस-प्रशासन का सहयोग, वंशावली आदि मांगों की पूर्ति होता देख मुखिया संघ के कुछ एक नेता तिलमिला गए हैं। वे हड़ताल पर चले गए हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि हड़ताल करना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन हड़ताल पर जाने से पहले उपमुखिया को चार्ज तो दे देते। हमारी भी 11 सूत्री मांग लंबित है। मांग पूरी नहीं होने पर गांधी जयंती पर हमलोग न्याय यात्रा शुरू करेंगे। बाद में सामूहिक इस्तीफा भी दे सकते हैं। 

क्या यह है असली पेच : दरअसल, सरपंच को पंचायती राज विभाग ने बड़ा अधिकार ​दे दिया है। कहा जा रहा है कि अब वे मुखिया की ओर से कराए गए कार्यों की समीक्षा करेंगे। पंचायतों में कराए गए विकास कार्यों की गुणवत्ता भी परखेंगे और इसकी जानकारी पंचायती राज विभाग को भी दी जाएगी। इसे लेकर इसी माह के पहले सप्ताह में पटना में बड़ी बैठक हुई थी। इसी बैठक में ये सारी बातें निकलकर सामने आयी थीं। सूत्रों की मानें तो मुखिया के विकास कार्यों की सरपंच की ओर से होने वाली समीक्षा को लेकर ही तनातनी का मामला बढ़ गया है। मुखिया की हड़ताल के पीछे बड़ी वजह यही बताई जा रही है। हालांकि, मुखिया संघ की ओर से कहा जा रहा है कि वे सब अधिकारों की कटौती हो लेकर हड़ताल पर गए हैं, लेकिन एक्सपर्ट की मानें तो सरपंच संघ के तंज से समझा जा सकता है कि असली माजरा क्या है ?

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