Rajesh Thakur | Patna
बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर जारी मंथन के बीच एक बात तेजी से उभरकर सामने आ रही है, अगर लव-कुश समीकरण को साधना है, तो नीतीश कुमार के बाद उस सामाजिक संतुलन को सबसे प्रभावी तरीके से सम्राट चौधरी ही संभाल सकते हैं। इस हकीकत को कुर्मी-कुशवाहा समाज भी मानने लगा है और बीजेपी भी मान रही है। यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी के अंदर खाने में उनका नाम सबसे ऊपर है। हालांकि, मीडिया ट्रायल में कई और नाम जुट गये हैं, यह अलग बात है। लेकिन ‘होइए वही जो राम रची राखा…।’ फिर सम्राट चौधरी के बनने से बीजेपी को न केवल बिहार में फायदा होगा, बल्कि यूपी विधानसभा चुनाव 2027 में भी सीधा लाभ होगा। यूपी में केशव प्रसाद मौर्या और सम्राट चौधरी की युगलबंदी से कुर्मी-कुशवाहा वोट सीधे बीजेपी को मिलेंगे। ओबीसी पॉलिटिक्स में भी पैठ बनेगी।



दरअसल, बिहार की राजनीति में लव-कुश समीकरण लंबे समय से सत्ता का निर्णायक आधार रहा है। नीतीश कुमार ने इस सामाजिक गठजोड़ को न सिर्फ गढ़ा, बल्कि उसे राजनीतिक रूप से स्थिर भी किया। अब जब सत्ता परिवर्तन का वक्त आ गया है तो बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसी सामाजिक संतुलन को बनाए रखने की है। ऐसे में अगर बिहार में लव-कुश समीकरण को ध्यान में रखते हुए सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाया जाता है, तो यह सिर्फ राज्य तक सीमित फैसला नहीं होगा, बल्कि इसका संदेश राष्ट्रीय स्तर पर जाएगा। खासतौर पर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े पॉलिटिकल स्टेट में, जहां 2027 में विधानसभा का चुनाव होना है। सियासी पंडितों की मानें तो बीजेपी के लिए यह फैसला तीन स्तरों पर अहम होगा। पहला, बिहार में सत्ता का संतुलन, दूसरा ओबीसी राजनीति में अपनी पकड़ को और मजबूत करना तथा तीसरा, यूपी चुनाव में वोटों के बिखराव को रोकना। सम्राट चौधरी का नाम इस लिहाज से फिट बैठता है कि वे न सिर्फ संगठन में सक्रिय रहे हैं, बल्कि सामाजिक समीकरणों को साधने की क्षमता भी रखते हैं।

सियासी पंडितों की मानें तो बीजेपी का आकलन सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है। पार्टी यह भी समझ रही है कि अगर सम्राट चौधरी जैसे ओबीसी चेहरे को आगे बढ़ाया जाता है, तो उसका सकारात्मक संदेश उत्तर प्रदेश तक जाएगा, जहां कुशवाहा-मौर्य वोटर्स का प्रभाव कई सीटों पर निर्णायक है। उत्तर प्रदेश में केशव प्रसाद मौर्य के साथ जो राजनीतिक घटनाक्रम 2017 के चुनाव में हुआ था, उसकी स्मृति आज भी उस वर्ग के मतदाताओं में बनी हुई है। 2017 विधानसभा चुनाव में पार्टी ने केशव प्रसाद मौर्य के नेतृत्व में चुनाव लड़ा, लेकिन बाद में मुख्यमंत्री की कुर्सी योगी आदित्यनाथ को सौंप दी गयी। इस फैसले को लेकर तब से यह वर्ग भाजपा से व्यथित है। इसका साइड इफेक्ट लोकसभा चुनाव 2025 में देखने को मिला भी। भाजपा के पास सम्राट चौधरी के जरिये केशव प्रसाद मौर्या वाली भरपाई का बढ़िया मौका है। बहरहाल, बिहार में नए सीएम पर मुहर लगना बाकी है। लेकिन जिस तरह से लव-कुश समीकरण को लेकर चर्चा तेज है, उससे साफ है कि बीजेपी कोई भी कदम बिना व्यापक राजनीतिक संदेश के नहीं उठाना चाहती। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि पार्टी सिर्फ सरकार बदलती है या इसके जरिए एक बड़ा सामाजिक-राजनीतिक संकेत भी देती है। वह इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं देख रही है। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव और 2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव के बीच ओबीसी राजनीति की एक सीधी कड़ी बनती नजर आ रही है।





