…न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए के शायर बशीर बद्र चिरनिद्रा में सो गये, 91 वर्ष की उम्र में निधन

Mukhiyajee Reporter | Rajesh (Patna)

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए… अपने अशआर से मोहब्बत, तन्हाई और रिश्तों की टूटन को नयी आवाज देने वाले मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र अब इस दुनिया में नहीं रहे। 91 वर्ष की उम्र में गुरुवार को भोपाल स्थित उनके आवास पर उनका निधन हो गया। उनके जाने के साथ ही उर्दू शायरी का एक सुनहरा दौर मानो थम सा गया। लंबे समय से बीमार चल रहे बशीर बद्र की याददाश्त भी काफी कमजोर हो चुकी थी। उनके निधन से बिहार के शायरों से लेकर बुद्धिजीवियों तक में शोक की लहर है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, परिवार के लोगों का कहना है कि बशीर साहब बीमारी की वजह से कई वर्षों से लोगों को ठीक से पहचान नहीं पाते थे, लेकिन जैसे ही मुशायरे या शायरी की बात छिड़ती, उनके चेहरे पर चमक आ जाती थी। वे धीमे स्वर में इरशाद… इरशाद… कहने लगते थे। दरअसल, बशीर बद्र उन चुनिंदा शायरों में रहे, जिन्होंने उर्दू गजलों को महफिलों से निकालकर आम लोगों के दिलों तक पहुंचाया। उनके शेर सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि लोगों की जिंदगी और बातचीत का हिस्सा बन गए। उनका हर शेर लोगों के दिल तक दस्तक देता था।

कोई यूँ ही बेवफा नहीं होता,
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी…


लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में…

बशीर साहब की शायरी में दर्द था, लेकिन वह दर्द इंसान को टूटने नहीं देता था। मोहब्बत की नर्मी, रिश्तों की कशमकश और जिंदगी की सच्चाइयों को उन्होंने बेहद सादगी से शब्द दिए। यही वजह रही कि उनकी गजलें नयी पीढ़ी तक भी उतनी ही लोकप्रिय रहीं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने वाले बशीर बद्र ने उर्दू साहित्य में पीएचडी की थी। वे अध्यापन से भी जुड़े रहे और बाद में मेरठ कॉलेज में उर्दू विभाग के अध्यक्ष बने। साहित्य और शायरी में योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री सम्मान से भी नवाजा गया था।

उनके निधन की खबर के बाद साहित्य और फिल्म जगत में शोक की लहर है। सोशल मीडिया पर हजारों लोग उनके मशहूर शेर साझा कर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं। बहरहाल, बशीर बद्र भले ही इस दुनिया से चले गए हों, लेकिन उनके लिखे अल्फाज आने वाली पीढ़ियों के दिलों में लंबे समय तक जिंदा रहेंगे। वे सिर्फ शायर नहीं थे, एहसासों की आवाज थे।