Rajesh Thakur | Patna
बिहार सरकार की ओर से जुब्बा साहनी वास्तुकला एवं असैनिक अभियंत्रण विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए विधेयक पारित किए जाने पर निषाद सेना ने खुशी जतायी है। संगठन ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे स्वतंत्रता सेनानी जुब्बा साहनी के योगदान और बलिदान को सम्मान देने वाला महत्वपूर्ण कदम बताया है। रविवार को विधान परिषद के अतिथिशाला में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में निषाद सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुकेश निषाद ने कहा कि जुब्बा साहनी के नाम पर विश्वविद्यालय की स्थापना का निर्णय निषाद समाज के लिए गौरव का विषय है।
उन्होंने कहा कि इस पहल से आने वाली पीढ़ियों को जुब्बा साहनी के संघर्ष, बलिदान और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान के बारे में जानने और उनसे प्रेरणा लेने का अवसर मिलेगा। हालांकि, विश्वविद्यालय के गठन के बाद निषाद सेना ने सरकार के सामने जुब्बा साहनी से जुड़ी दो और बड़ी मांगें रखी हैं। मुकेश निषाद ने मुजफ्फरपुर जिले के मीनापुर में चार एकड़ सरकारी भूमि पर जुब्बा साहनी स्मृति उद्यान तथा पटना में जुब्बा साहनी स्मृति भवन एवं शोध संस्थान की स्थापना की मांग की। उनका कहना है कि स्मृति उद्यान और शोध संस्थान की स्थापना से जुब्बा साहनी के जीवन, संघर्ष और सामाजिक योगदान पर शोध को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, उनके जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान से जुड़ी स्मृतियों को संरक्षित करने में भी मदद मिलेगी। संगठन ने उम्मीद जताई कि सरकार इन दोनों मांगों पर भी जल्द सकारात्मक निर्णय लेगी। संवाददाता सम्मेलन में अधिवक्ता विजय चौधरी, राष्ट्रीय अति पिछड़ा संघ के प्रतिनिधि, भाजपा नेता सुनील निषाद समेत कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।
बता दें कि जुब्बा साहनी बिहार के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल थे, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना जीवन कुर्बान कर दिया। मुजफ्फरपुर जिले के मीनापुर क्षेत्र से जुड़े जुब्बा साहनी भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सक्रिय रूप से संघर्ष करने वाले सेनानियों में थे। स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका और बलिदान ने उन्हें बिहार के जननायकों की पंक्ति में स्थान दिलाया। देश की आजादी के लिए जुब्बा साहनी को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी। बहरहाल, जुब्बा सहनी के संघर्ष और बलिदान को याद करते हुए उनके नाम पर विश्वविद्यालय, स्मृति उद्यान और शोध संस्थान की मांग को उनके योगदान को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।






