बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव : PK के निशाने पर सिर्फ सम्राट चौधरी ही क्यों, नितिन नवीन या तेजस्वी यादव क्यों नहीं; जानिए 5 कारण

Mukhiyajee Reporter | Patna

बिहार की राजनीति में कुछ चुनाव ऐसे होते हैं, जिनका महत्व केवल एक विधानसभा सीट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे आने वाले राजनीतिक समीकरणों की दिशा भी तय करते हैं। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव भी उसी श्रेणी में शामिल हो गया है। यहां चुनाव प्रचार थम गया है और वोटिंग का काउंट डाउन शुरू हो गया है। पहली नजर में यह मुकाबला भाजपा के लिए अपनी पारंपरिक सीट बचाने और जनसुराज के लिए राजधानी पटना में राजनीतिक आधार मजबूत करने की चुनौती है। लेकिन चुनावी सभाओं, नेताओं के बयानों और बदलते राजनीतिक संकेतों को गौर से देखें तो तस्वीर कहीं अधिक व्यापक नजर आती है। करीब तीन दशक से भाजपा का गढ़ रही इस सीट पर इस बार हो रहे उपचुनाव में मुख्य रूप से भाजपा से नीरज कुमार सिन्हा, राजद से रेखा गुप्ता और जनसुराज से प्रशांत किशोर किस्मत आजमा रहे हैं। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा भाजपा और जनसुराज प्रत्याशियों की हो रही हैं। किंतु सियासी गलियारे में उससे भी अधिक चर्चा इस बात की हो रही है कि जब स्वाभाविक रूप से चुनावी बहस वर्तमान भाजपा प्रत्याशी नीरज सिन्हा, पूर्व विधायक नितिन नवीन और तेजस्वी यादव के इर्द-गिर्द होनी चाहिए थी, तो प्रशांत किशोर के निशाने पर सिर्फ मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ही क्यों, आइए जानते हैं इसके 5 प्रमुख कारण…

  1. ताकि प्रशांत किशोर की चर्चा मुख्यमंत्री उम्मीदवार के पैरलल हो : लोकतांत्रिक राजनीति में किसी भी नए दल या नए नेता के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी राजनीतिक हैसियत स्थापित करने की होती है। यदि लड़ाई केवल स्थानीय उम्मीदवार तक सीमित रह जाए, तो उसका प्रभाव भी उसी दायरे तक सीमित रहता है। लेकिन जब चुनावी बहस मुख्यमंत्री के स्तर तक पहुंच जाती है, तो उसका राजनीतिक महत्व स्वतः बढ़ जाता है। सियासी पंडितों का मानना है कि बांकीपुर उपचुनाव में जनसुराज की रणनीति भी कुछ इसी दिशा में है। भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार सिन्हा पर नहीं के बराबर राजनीतिक हमले हो रहे हैं और न ही यहां के पूर्व विधायक नितिन नवीन पर हो रहे हैं, जबकि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी लगातार जनसुराज के निशाने पर हैं। इससे यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि यह मुकाबला केवल एक विधानसभा सीट का नहीं, बल्कि बिहार के नेतृत्व, सरकार की कार्यशैली और भविष्य की राजनीतिक दिशा का भी है। यदि यह नैरेटिव स्थापित होता है, तो चुनाव परिणाम चाहे जो हो, जनसुराज को राज्यव्यापी राजनीतिक विमर्श में अधिक जगह मिल सकती है। नए राजनीतिक दलों के लिए कई बार चुनाव जीतने से अधिक महत्वपूर्ण यह होता है कि वे अपनी लड़ाई किस राजनीतिक चेहरे के खिलाफ खड़ी करते हैं। इसी वजह से मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को सीधे चुनौती देना जनसुराज की व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, ताकि उनकी चर्चा मुख्यमंत्री उम्मीदवारी के रूप में हो और वे तेजस्वी यादव का स्थान ले सकें।
  2. अगड़ों-पिछड़ों के जातीय ध्रुवीकरण करने की रणनीति : बांकीपुर उपचुनाव में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी लगातार जनसुराज के राजनीतिक हमलों के केंद्र में हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे केवल सरकार की आलोचना नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक और राजनीतिक संदेश देने की रणनीति है। सम्राट चौधरी आज सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि भाजपा के प्रमुख पिछड़ा वर्ग के नेताओं में गिने जाते हैं। न केवल कुशवाहा समाज के बीच उनकी मजबूत पकड़ हुई है, बल्कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका कद एनडीए के व्यापक पिछड़ा नेतृत्व के रूप में भी मजबूत हुआ है। वे ओबीसी के भी बड़े नेता के रूप में लोकप्रिय होते जा रहे हैं। ऐसे में प्रशांत किशोर का सम्राट चौधरी पर सीधा हमला चुनावी बहस को स्थानीय मुद्दों से आगे ले जाकर नेतृत्व और सामाजिक प्रतिनिधित्व की दिशा में मोड़ने की कोशिश के रूप में है। सियासी पंडितों का मानना है कि इस रणनीति के जरिए अगड़ों-पिछड़ों के जातीय ध्रुवीकरण का फायदा वोटिंग में उठाया जा सके। यही वजह है कि प्रशांत किशोर सवर्ण समाज को अपने पक्ष में करने के लिए भरत तिवारी प्रकरण को भी मजबूती से हवा दे रहे हैं। हालांकि, जनसुराज ने इसे कभी जातीय मुकाबला नहीं बताया है, लेकिन नितिन नवीन के बदले सम्राट चौधरी को निशाने पर लेने की वजह से प्रशांत किशोर की ‘हिडेन रणनीति’ को समझा जा सकता है।
  3. कायस्थ वोटरों में सेंधमारी की बड़ी रणनीति : बांकीपुर विधानसभा सीट पिछले तीन दशक से भाजपा का मजबूत गढ़ रही है। पहले स्वर्गीय नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा और बाद में उनके पुत्र नितिन नवीन ने इस सीट पर पार्टी की राजनीतिक पकड़ को मजबूत बनाए रखा। नितिन नवीन के भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष, फिर राज्यसभा सदस्य बनने के बाद उपचुनाव की स्थिति बनी। ऐसे में स्वाभाविक रूप से माना जा रहा था कि प्रशांत किशोर अपने चुनावी अभियान का सबसे बड़ा निशाना भाजपा की इसी राजनीतिक विरासत को बनाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नितिन नवीन ने स्वयं भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार सिन्हा के समर्थन में प्रचार किया, रोड शो निकाला और उन्हें अपना छोटा भाई बताते हुए वीडियो जारी कर मतदाताओं से उनके पक्ष में मतदान की अपील की। इसके बावजूद जनसुराज के प्रत्याशी प्रशांत किशोर न तो नितिन नवीन पर किसी तरह के राजनीतिक हमले किये और न ही उन्हें चुनावी बहस का केंद्र बनाया। उन्होंने सिर्फ मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को लगातार निशाने पर लिया। सियासी पंडितों का मानना है कि प्रशांत किशोर की रणनीति सवर्ण मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की है। ऐसे में वे कायस्थ समाज से आने वाले नितिन नवीन और नीरज कुमार सिन्हा पर हमला कर उस समाज को नाराज करना नहीं चाहते हैं। उनकी यह भी कोशिश है कि सवर्ण के नाम पर कायस्थ वोटरों में सेंधमारी की जाए। ऐसे में वे इस वर्ग को सीधे नाराज करने से बचते हुए सम्राट चौधरी पर ज्यादा हमले कर रहे हैं।
  4. राजद के कैडर वोटरों में सेंधमारी की भी रणनीति : बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में राजद भी प्रमुखता से लड़ रहा है। पार्टी ने इस बार भी रेखा देवी को ही अपना उम्मीदवार बनाया है। 2025 के मुख्य चुनाव में बांकीपुर से राजद उम्मीदवार रेखा देवी को 46 हजार से अधिक वोट मिले थे, जबकि भाजपा को 98 हजार से अधिक वोट आए थे। वहीं उस चुनाव में जनसुराज के प्रत्याशी को महज 7000 वोटों से संतोष करना पड़ा था। इसमें कोई शक नहीं कि आज बिहार में एनडीए सरकार का सबसे प्रमुख चेहरा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी हैं, जबकि विपक्ष का चेहरा तेजस्वी यादव हैं। चूंकि तेजस्वी यादव इस दौरान विदेश यात्रा पर थे और इसका फायदा उठाकर जनसुराज ने यह नैरेटिव बनाने लगा कि तेजस्वी यादव इस उपचुनाव में इंट्रेस्ट नहीं ले रहे हैं। कांग्रेस और वामदलों की शिथिलता ने इस नैरेटिव को और अधिक हवा दे दी। इसके पीछे सियासी पंडितों का मानना है कि विपक्षी राजनीति में अपने लिए मजबूत जगह बनाने का इससे अच्छा अवसर जनसुराज के लिए कुछ नहीं हो सकता था। यही वजह है कि प्रशांत किशोर के निशाने पर नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव एक बार भी नहीं आए। वे तेजस्वी यादव को इसलिए भी इग्नोर कर रहे हैं कि उनके कैडर वोटरों को यह भी बताना चाहते हैं कि राजद नहीं भाजपा को जनसुराज ही हरा सकती है। इस नैरेटिव से जनसुराज की रणनीति है कि राजद के कैडर वोटरों में सेंधमारी की जा सके। हालांकि, अंतिम दो दिन तेजस्वी यादव ने राजद प्रत्याशी के साथ रोड शो करके इन सारे नैरेटिव पर पानी फेर दिया है।
  5. सरकार से असंतुष्ट वोटों को एक मंच पर लाने की कोशिश : अब पांचवें और अंतिम कारण पर बात करते हैं। बिहार की राजनीति में सत्ता का सबसे बड़ा चेहरा हमेशा मुख्यमंत्री होते हैं। ऐसे में सरकार की उपलब्धियों से लेकर कमियों तक, हर मुद्दे की राजनीतिक जवाबदेही भी अंततः उन्हीं पर आकर टिकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांकीपुर उपचुनाव में जनसुराज भी इसी रणनीति पर काम कर रही है। भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार सिन्हा स्थानीय उम्मीदवार हैं, जबकि सम्राट चौधरी पूरे राज्य की सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में यदि चुनाव को सरकार के कामकाज पर जनमत के रूप में पेश करना हो, तो मुख्यमंत्री को केंद्र में रखना स्वाभाविक राजनीतिक रणनीति मानी जाती है। इसी संदर्भ में भोजपुर के चर्चित भरत तिवारी प्रकरण समेत कुछ अन्य मुद्दों को भी विपक्ष लगातार उठा रहा है। सियासी पंडितों के अनुसार इन घटनाओं के जरिए सरकार से असंतुष्ट विभिन्न वर्गों को एक साझा राजनीतिक संदेश के तहत जोड़ने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, चुनावी रणनीति और चुनावी परिणाम हमेशा एक जैसे नहीं होते। मतदाता स्थानीय उम्मीदवार, संगठन, विकास और क्षेत्रीय मुद्दों को भी समान महत्व देते हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार विरोधी भावना को एकजुट करने की जनसुराज की यह संभावित रणनीति मतदान में कितना असर छोड़ पाती है।