Mukhiyajee Reporter | Patna
अरुंधति रॉय की बहुचर्चित किताब ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ के हिंदी संस्करण ‘मेरी माँ मेरी गैंगस्टर’ का लोकार्पण शनिवार शाम अर्थशिला में एक विशेष समारोह में हुआ। राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस किताब का हिंदी अनुवाद प्रभात सिंह ने किया है। लोकार्पण समारोह में लेखक अरुंधति रॉय और अनुवादक प्रभात सिंह समेत साहित्यिक-सांस्कृतिक क्षेत्र की कई प्रतिष्ठित हस्तियाँ उपस्थित रहीं। बातचीत की शुरुआत में प्रत्यक्षा ने कहा कि यह किताब आपको अंतरंग दुनिया में ले जाती है और साथ बाहरी दुनिया के लिए दरवाजा खोलती है। अरुंधति की दुनिया आपकी अपनी दुनिया है।

किताब पर बातचीत के दौरान अरुंधति रॉय ने कहा, मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं यह किताब लिखूँगी। मेरी माँ के निधन के बाद अपने जीवन और हमारे रिश्ते को नए सिरे से देखने का अवसर मिला और वही इस किताब की शुरुआत बना। जब मेरी माँ का निधन हुआ तो मैंने महसूस किया कि मैं एक बेटी के रूप में अपनी माँ को खोने से कहीं बढ़कर, एक लेखक के रूप में ज्यादा दुखी थी। उन्होंने बताया कि इस किताब का अधिकांश हिस्सा उन्होंने रातों को जागकर लिखा और अगली सुबह उसे फिर से देखा, क्योंकि इसे लिखते समय उन्हें अपने सबसे गहरे डरों और भावनाओं से जूझना पड़ा था। आगे उन्होंने कहा कि मेरी माँ एक अद्भुत और बेमिसाल स्त्री रहीं हैं। मैंने अपनी माँ को कभी किसी और की शर्त पर जीते हुए नहीं देखा, वो हमेशा अपनी शर्तों पर जीती रहीं। मैं और मेरी माँ कभी घरेलू दुनिया का हिस्सा नहीं रहे। शायद इसी वजह से दुनिया को देखने का हमारा नजरिया अलग था। इस किताब में 16 साल की उम्र में मेरे दिल्ली पहुँचने और 18 की उम्र में पूरी तरह घर छोड़ने से लेकर माँ के अंतिम क्षणों तक उनके उलझे हुए आपसी रिश्ते की कहानी है।
अपनी माँ से अलग होने को लेकर अरुंधति रॉय कहती हैं, मैं अपनी माँ से इसलिए दूर गयी ताकि मैं उनसे प्यार करना जारी रख सकूँ। वहाँ रुकना मेरे लिए उनसे प्यार करना असंभव बना देता। यह किताब जितनी व्यक्तिगत है, उतनी ही सामाजिक और राजनीतिक भी है। किसी व्यक्ति को उसकी अच्छाइयों और कमजोरियों दोनों के साथ ईमानदारी से देखना ही प्रेम का सबसे सच्चा रूप है। उन्होंने कहा कि यह किताब इस बारे में है कि कैसे माँ ने मुझे एक लेखक बनाया, लेकिन साथ ही बाद में उन्होंने उनके इस लेखक रूप से ईर्ष्या भी जतायी। उन्होंने मुझे सोचना सिखाया, फिर मेरे विचारों पर गुस्सा किया। उन्होंने मुझे स्वतंत्र होना सिखाया और मेरी आजादी से नाराज हुईं। उन्होंने मुझे लिखना सिखाया और मेरे लेखक बनने पर असंतोष जताया। माँ के साथ अपने इस जटिल रिश्ते के बारे में वो कहती हैं कि अब वो मेरा एक हिस्सा हैं। मुझे लगता है कि मैं अपनी माँ जैसी ही गैंगस्टर हूँ। किताब के शीर्षक को लेकर अरुंधति रॉय ने कहा कि वो बीटल्स की बहुत बड़ी प्रशंसक रहीं हैं जिनके गानों का उन पर खासा असर रहा और किताब लिखते हुए ये शीर्षक उनके हाथों पर एक तितली की तरह आकर बैठ गया।
अनुवादक प्रभात सिंह ने कहा कि किताब का शीर्षक काल्पनिक नहीं है बल्कि उनकी माँ के व्यक्तित्व को लेकर फिट बैठता है। इस किताब का शीर्षक अनुवाद की प्रक्रिया के दौरान सामने आया और धीरे-धीरे यही सबसे सटीक लगा। अनुवाद के अपने अनुभवों पर बात करते हुए प्रभात सिंह ने कहा कि अरुंधति रॉय की लेखन शैली अपने आप में अनूठी है। अनुवाद में उसी लय और रवानी बरकरार रखना अपने आप में एक चुनौती रही। एक अनुवादक के तौर पर तटस्थ हो जाना और लेखक की भावनाओं को प्राथमिकता देना बड़ी जिम्मेदारी होती है। कई बार ऐसा हुआ कि अंग्रेज़ी में लिखे गए अंशों के हिंदी अनुवाद पर लेखक राजी नहीं हुईं, क्योंकि जिस तरह से वो अपनी बात रखना चाहती थीं वैसी भावना हिंदी में सामने नहीं आ पा रही थी। इसको लेकर काफी विमर्श करना पड़ा। वहीं अनुवाद को लेकर अरुंधति ने कहा कि इसे पूरी तरह निखारने के लिए प्रभात जी, मैं और राजकमल के संपादक एक साथ बैठे। हमने लगातार 10 दिनों तक रोज करीब 10-10 घंटे लगाकर इसे अंतिम रूप दिया है। मैं बेहद खुश हूँ कि यह किताब हिंदी में एक बेहतरीन अनुवाद के साथ आयी है। यह मेरी अब तक की सभी किताबों में श्रेष्ठ अनुवाद है। इससे पहले, कार्यक्रम की प्रस्तावना रखते हुए अर्थशिला, पटना की निदेशक चेतना झा ने कहा, यह कार्यक्रम राजकमल प्रकाशन समूह और अर्थशिला की साझा पहल ‘परस्पर: संवाद की सबरंगी दुनिया’ शृंखला का पहला आयोजन है। ‘परस्पर’ केवल एक कार्यक्रम शृंखला नहीं, बल्कि साहित्य, कला और विचार के बीच संवाद की एक साझा सांस्कृतिक पहल है। हमें प्रसन्नता है कि अरुंधति रॉय की इस महत्त्वपूर्ण कृति का हिंदी अनुवाद राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हो रहा है और इसका लोकार्पण ‘परस्पर’ की पहली कड़ी का हिस्सा बना है। आने वाले दिनों में इस शृंखला में और भी कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए राजकमल प्रकाशन के संपादक सत्यानंद निरुपम ने कहा, यह किताब और उसका हिंदी अनुवाद इस बात का प्रमाण हैं कि साहित्य भाषाओं की सीमाएँ नहीं, बल्कि उनके बीच पुल बनाता है। उन्होंने कहा, हम सभी वक्ताओं, पाठकों और उपस्थित श्रोताओं का आभार व्यक्त करते हैं, जिनकी सहभागिता ने ‘परस्पर’ की पहली संध्या को सार्थक बनाया।
किताब के बारे में : ‘मेरी माँ मेरी गैंगस्टर’ अरुंधति रॉय का एक बेहद आत्मीय संस्मरण है, जिसमें वे अपनी माँ मैरी रॉय के साथ अपने जटिल, प्रेम और टकराव से भरे रिश्ते के बहाने स्मृति, परिवार, स्त्री-अस्मिता, सत्ता, मातृत्व और आत्म-पहचान जैसे गहरे मानवीय प्रश्नों की पड़ताल करती हैं। यह केवल एक माँ-बेटी की कहानी नहीं, बल्कि उस भावनात्मक और सामाजिक भूगोल का दस्तावेज़ है, जहाँ निजी जीवन और इतिहास एक-दूसरे में घुलते-मिलते हैं। अपनी विशिष्ट काव्यात्मक भाषा, निर्भीक आत्मस्वीकृति और गहरी मानवीय दृष्टि के साथ अरुंधति रॉय इस संस्मरण में उन संबंधों को समझने का प्रयास करती हैं, जिनसे मुक्ति संभव नहीं होती, लेकिन जिन्हें समझना और स्वीकार करना शायद संभव है। यही कारण है कि इस किताब को दुनिया भर के प्रमुख आलोचकों और साहित्यकारों ने वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण किताबों में शामिल किया है। यह किताब पाठकों को अरुंधति रॉय के लेखन के एक ऐसे अनदेखे पक्ष से परिचित कराती है, जहाँ उनका निजी जीवन, साहित्यिक संवेदना और सामाजिक दृष्टि एक साथ उपस्थित हैं।








