Rajesh Thakur | Patna
बिहार से राज्यसभा की सीटों के लिए हुए चुनाव में NDA ने एक बार फिर अपनी राजनीतिक एकजुटता और रणनीतिक क्षमता का शानदार प्रदर्शन किया है। गठबंधन के सभी उम्मीदवारों ने सहज तरीके से जीत हासिल की। किंतु सर्वाधिक चर्चा NDA के पांचवें उम्मीदवार यानी भाजपा के शिवेश कुमार (राम) की जीत को लेकर हो रही है। बेशक इस सीट की जीत से भाजपा के वरीय नेता और उपमुख्यमंत्री (गृह) सम्राट चौधरी का कद काफी बढ़ गया है। इसे बिहार का सियासी गलियारा भी मानने लगा है। दरअसल, पांचवें सीट को लेकर यहां के सियासी महकमे में लंबे समय से कयास लगाए जा रहे थे और इसे NDA के लिए सबसे कठिन चुनौती माना जा रहा था। सभी पांचों सीटों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, वरिष्ठ नेता व सीटिंग एमपी रामनाथ ठाकुर और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने प्रथम वरीयता के मतों से ही आराम से जीत दर्ज कर ली। लेकिन NDA की वास्तविक परीक्षा पांचवें उम्मीदवार के रूप में उतरे भाजपा नेता शिवेश राम की सीट पर थी, जहां विपक्ष ने पूरी ताकत झोंक दी थी। विपक्ष ने महागठबंधन की ओर से राजद के सीटिंग एमपी एडी सिंह को मैदान में उतारा था।



राजनीतिक सूत्रों की मानें तो इस चुनौतीपूर्ण मुकाबले को जीतने की जिम्मेदारी बिहार के उपमुख्यमंत्री सह गृहमंत्री सम्राट चौधरी को सौंपी गयी थी। बताया जाता है कि उन्होंने बेहद सुनियोजित रणनीति के साथ इस चुनावी गणित को साधा। 12 मार्च को पटना स्थित अपने सरकारी आवास पर सम्राट चौधरी ने NDA के सभी विधायकों की एक अहम बैठक बुलायी। इस बैठक में वोटों की रणनीति, विधायकों की एकजुटता और चुनावी गणित पर विस्तार से मंथन किया गया। सूत्रों के मुताबिक इसी बैठक में पूरी रणनीति को ‘फाइनल टच’दिया गया। इसके बाद NDA ने अपने वोटों का सटीक प्रबंधन किया। सियासी पंडितों के अनुसार, सम्राट चौधरी की रणनीति ने विपक्ष की संभावनाओं को काफी हद तक कमजोर कर दिया। विपक्ष की ओर से मैदान में उतारे गए उम्मीदवार एडी सिंह को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका और उन्हें हार का सामना करना पड़ा। दरअसल, 16 मार्च को वोटिंग के दौरान एक और दिलचस्प राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया। कांग्रेस के तीन और राष्ट्रीय जनता दल के एक विधायक मतदान के समय गायब रहे। कांग्रेस विधायकों के अनुपस्थित रहने की संभावना को लेकर पहले से चर्चा थी, लेकिन राजद के एक विधायक के वोटिंग में शामिल नहीं होने ने सियासी हलकों में हैरानी पैदा कर दी। खास बात यह रही कि यह विधायक अल्पसंख्यक समुदाय के हैं, जिससे विपक्ष के भीतर भी कई तरह की चर्चाएं तेज हो गयी हैं।
सियासी पंडितों के अनुसार, यह चुनाव केवल संख्या बल की लड़ाई नहीं था, बल्कि रणनीति और प्रबंधन की भी परीक्षा थी। इस लिहाज से देखा जाए तो सम्राट चौधरी ने विपक्ष को प्रभावी ढंग से मात दी है। दिलचस्प बात यह भी है कि वर्तमान में राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव हैं। तेजस्वी को हाल ही में यह दायित्व मिला है। इन दोनों के पद पर रहते हुए इस तरह का राजनीतिक झटका विपक्ष के लिए असहज करने वाला माना जा रहा है। कहें तो सम्राट चौधरी की रणनीति लालू-तेजस्वी पर भारी पड़ी। इस तरह राज्यसभा चुनाव के इस परिणाम ने बिहार की सत्ता राजनीति में सम्राट चौधरी की भूमिका को और मजबूत किया है। बहरहाल, पांचवें उम्मीदवार की चुनौतीपूर्ण सीट को जीत में बदलने के बाद यह संदेश गया है कि भाजपा के साथ ही NDA के भीतर उनकी रणनीतिक क्षमता और संगठनात्मक पकड़ लगातार मजबूत हो रही है। ऐसे में यह चुनाव केवल सीटों की जीत नहीं, बल्कि बिहार की सियासत में सम्राट चौधरी के बढ़ते कद का संकेत भी है।







