‘बापू टावर में सवर्ण वर्चस्व का नंगा नाच, मंडल-कमंडल को मल से मल धोने वाला बयान जातीय घृणा की इन्तिहां’

Mukhiyajee | Patna

बिहार के लेखक, साहित्यकार और शिक्षाविद अरुण नारायण ने पटना के बापू टावर में आयोजित एक पुस्तक लोकार्पण समारोह को आधार बनाकर हिंदी साहित्यिक जगत में सामाजिक प्रतिनिधित्व, सांस्कृतिक वर्चस्व, जाति आधारित प्रभुत्व और प्रगतिशील राजनीति के अंतर्विरोधों पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया मंच पर इस विषय पर विस्तृत लेख लिखा है, जिसमें कई व्यक्तियों, संस्थानों और वैचारिक धाराओं पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। मुखियाजी अपने पाठकों के लिए यह लेख अरुण नारायण के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से अक्षरशः प्रकाशित कर रहा है। इस लेख में व्यक्त सभी विचार, आरोप, निष्कर्ष और टिप्पणियां पूरी तरह लेखक के निजी विचार हैं। इनसे मुखियाजी का सहमत होना आवश्यक नहीं है।

पिछले दिनों पटना के बापू टावर सभागार में बिहार के पूर्व मुख्य सचिव एवं वर्तमान सूचना आयुक्त त्रिपुरारि शरण की पुस्तक के लोकार्पण के कार्यक्रम में जिस तरह से एक खास सामाजिक समूह के लेखक, बुद्धिजीवी और संस्कृतिककर्मी उपस्थित थे, उसने इस बात को पुनः स्पष्ट कर दिया कि हिंदी प्रगतिशीलों की दुनिया सामाजिक प्रतिनिधित्व की है ही नहीं। वह अब भी जाति, जेंडर के वायसनेस से मुक्त नहीं हुई है और परंपरागत जड़ता में ही जीने की आदि है। कार्यक्रम में एक अहम वक्ता थे प्रो. तरुण कुमार, जिनकी एक गंभीर अध्यापक, लेखक की छवि रही है। वह पटना कालेज के प्रिंसिपल भी रह चुके हैं और पटना में आयोजित गोष्ठियों में बतौर वक्ता उनकी अक्सर उपस्थिति रहती है। उक्त समारोह में उन्होंने कहा कि “जब मंडल की राजनीति शुरू हुई तो उससे त्राण पाने के लिए कमंडल लाया गया। पिछले 12 वर्षों से कमंडल का राज है, लेकिन स्थिति और बदतर हुई है। लोगों को यह समझना चाहिए था कि मल से मल नहीं धोया जाता।”

प्रो. तरुण कुमार जी की इस टिप्पणी में जातीय घृणा की इन्तिहां है। साथ ही मंडल और कमंडल को एक ही पलड़े पर तौलने की फुहड़ मंशा भी। प्रो. साहब को मालूम होना चाहिए कि मंडल आंदोलन सामाजिक न्याय, वंचित जातियों की हिस्सेदारी और सत्ता-संरचनाओं में ऐतिहासिक रूप से उन समुदायों की भागीदारी का काल था। दूसरी ओर, कमंडल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और धार्मिक पहचान की राजनीति का प्रतीक। दोनों की ऐतिहासिक प्रकृति, उद्देश्य और सामाजिक परिणाम एक-दूसरे से बिलकुल भिन्न रहे हैं। उन्हें समान ठहराना वस्तुतः सामाजिक न्याय की राजनीति को विकृत करना है। प्रो. तरुण कुमार जब समकालीन इतिहास के साथ इस कुत्सित मानसिकता के साथ यहां खड़े हैं, तो संस्थान में, जहां वह वर्षों कार्यरत रहे, कितने एकलव्यों का कतल किया होगा, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। तरुण कुमार की इस दृष्टि को उनके बौद्धिक संस्कारों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। प्रो. नंदकिशोर नवल ने अपनी संस्मरण पुस्तक ‘मूरतें माटी और सोने की’ (पृष्ठ 201-202, राजकमल प्रकाशन) में जेएनयू की एक घटना का उल्लेख किया है, जिसमें उन्होंने बताया है कि एक छात्र द्वारा फेलोशिप आवेदन में आय संबंधी गलत जानकारी देने के बावजूद नामवर सिंह के हस्तक्षेप से उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। नवल ने उस छात्र का नाम नहीं लिखा है, किंतु यह प्रसंग प्रो. तरुण कुमार का ही है, यह बात उन्होंने इस लेखक को बतायी थी। यह प्रसंग हिंदी जगत में जड़ जमाये बैठे द्विज बौद्धिकों के संरक्षण और नेटवर्क नेक्सस को उदभेदित करता है । इन प्रगतिशीलों की ऐसी अनेक कार्रगुजारियां भरी पड़ी हैं, जिसका पर्दाफाश होना ही चाहिए। गौरतलब है कि उस गोष्ठी में उपस्थित बौद्धिक में त्रिपुरारि शरण, प्रणव कुमार, रामाज्ञा राय शशिधर, अनीश अंकुर, कुमार वरुण, विनय कुमार और कई अन्य स्वनामधन्य प्रोफेसर, नौकरशाह उपस्थित थे, लेकिन इसमें से किसी “प्रगतिशील” बुद्धिजीवी ने इस तुलना पर आपत्ति दर्ज नहीं की। इनका यह मौन क्या इंगित करता है? मौन स्वीकृति के प्रमाण माने गये हैं।

डा. आंबेडकर ने अपनी चर्चित पुस्तक “जाति का विनाश” में यह बात बहुत स्पष्टता के साथ कही है कि भारतीय समाज की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यहां असमानता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक वैधता से लैस है। इसलिए यदि ज्ञान-संस्थानों, साहित्यिक मंचों और सांस्कृतिक आयोजनों में वही पुराने सामाजिक समूह निर्णायक बने रहें, तो केवल प्रगतिशील भाषा बोलने से सामाजिक परिवर्तन नहीं आएगा। जिस बापू टावर में यह आयोजन हुआ, उसके सक्षम पदाधिकारी विनय कुमार अति पिछड़े समाज से आते हैं। किंतु वहां अब तक हुए अधिकांश साहित्यिक आयोजनों में वही परंपरागत सामाजिक प्रभुत्व बार-बार दिखाई देता है। कला की बात हो या किसी पुस्तक के लोकार्पण की- सौ प्रतिशत द्विज लेखकों को ही इस संस्था के द्वारा संरक्षित किया जाता रहा है। एक अन्य अति पिछड़े समुदाय से आने वाले पुलिस अधिकारी सुशील कुमार भी इन दिनों साहित्यिक गतिविधियों में कुछ ज्यादा ही सक्रिय दिखलाई पड़ रहे हैं, किंतु उनके मंचों पर भी विविधता और प्रतिनिधित्व की जगह प्रायः वही स्थापित द्विजधारी सामाजिक समूह निर्णायक भूमिका में दिखाई देते हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि संस्थान का नेतृत्व बदल जाने से क्या सांस्कृतिक सत्ता का चरित्र भी परिवर्तित हो सकता है? या फिर सांस्कृतिक वर्चस्व इतना गहरा होता है कि नये सामाजिक समूह भी उसकी स्वीकृति में ही अपनी वैधता खोजने लगते हैं?

ग्राम्शी इसे ही “सहमति द्वारा प्रभुत्व” कहते हैं। वर्चस्व की सबसे बड़ी सफलता तब होती है जब उसके बाहर से आने वाले लोग भी उसी व्यवस्था को स्वाभाविक मानने लगते हैं। आंबेडकर ने चेताया था कि सत्ता के ढांचे बदले बिना केवल व्यक्तियों का बदल जाना सामाजिक लोकतंत्र की गारंटी नहीं हो सकती है। इसलिए हिंदी जगत में बराबरी का सामाजिक आधार निर्मित करना अब भी असुविधाजनक है। विविधता की चर्चा मंचों पर होती है, पर संस्थानों में प्रतिनिधित्व की बात उठते ही “मेरिट” का शोर शुरू हो जाता है। असल प्रश्न यह है कि क्या हिंदी का प्रगतिशील संसार, जो द्विज जातियों के वर्चस्व से भरा पड़ा है, क्या अपने भीतर मौजूद सांस्कृतिक वर्चस्व को पहचानने और उसकी आलोचना करने का नैतिक साहस जुटा पाएगा? इसका सीधा उत्तर है नहीं, क्योंकि साहित्य जबतक स्वयं सामाजिक लोकतंत्र का अभ्यास नहीं करेगा, तो वह समाज को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने का नैतिक अधिकार भी धीरे-धीरे खोता जाएगा। जब तक ज्ञान, संस्कृति और साहित्य के संस्थान सामाजिक विविधता को अपने स्वभाव का स्वाभाविक हिस्सा नहीं बनाएंगे, तब तक प्रगतिशीलता का दावा खोखला ही रहेगा।

तरुण कुमार और विनय कुमार का मूलभूत अंतर व्यक्ति का नहीं, सामाजिक चेतना का अंतर है। तरुण कुमार उस सामाजिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने सदियों से ज्ञान, संस्कृति और संस्थानों पर अपना वर्चस्व बनाये रखा है। इसलिए वैचारिक मतभेदों के बावजूद द्विज समाज अपने सामाजिक हितों की रक्षा के प्रश्न पर सहज रूप से एकजुट हो जाता है। यही वह सांस्कृतिक वर्चस्व है जिसकी ओर ग्राम्शी संकेत करते हैं, जहां प्रभुत्व केवल सत्ता से नहीं, बल्कि संस्कृति और बौद्धिक जगत में निर्मित सहमति से चलता है। इसके विपरीत, विनय कुमार और सुशील जैसे बहुजन पृष्ठभूमि से आये लोग अक्सर संस्थागत पदों तक पहुंच तो जाते हैं, लेकिन बहुजन सांस्कृतिक चेतना और वैचारिक परियोजना का निर्माण नहीं कर पाते। परिणामतः वे भी उसी सांस्कृतिक ढांचे को आगे बढ़ाने लगते हैं, जिसने ऐतिहासिक रूप से बहुजन समाज को हाशिये पर रखा। पेरियार ने ठीक ही कहा था कि ब्राह्मणवाद एक जाति नहीं, बल्कि दूसरों के मन पर शासन करने वाली विचार-पद्धति है। यही बहुजन विचारहीनता और द्विज एकसूत्रता का अंतर है, जिसे समझने की जरूरत है। एक पक्ष अपने सामाजिक वर्चस्व को बचाने के लिए स्वाभाविक रूप से संगठित हो जाता है, जबकि दूसरा पक्ष अपने ही प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर बिखरा रहता है। इसलिए संघर्ष केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना के निर्माण का है। जब तक बहुजन समाज अपनी स्वतंत्र बौद्धिक और सामूहिक सांस्कृतिक चेतना विकसित नहीं करेगा, तब तक उसके संस्थानों में भी दूसरों की विचारधारा का ही वर्चस्व बना रहेगा।