Durga Puja 2027 : कन्या-पूजन के साथ कन्या-सम्मान भी जरूरी, उपवास का मतलब सिर्फ भूखा रहना नहीं; बोले आचार्य ब्रजेश मिश्र

Mukhiyajee Reporter | Patna

नवरात्र में उपवास, जप, ध्यान, पाठ, हवन, कन्या-पूजन और दान की परंपरा सदियों से चली आ रही है। आचार्य ब्रजेश मिश्र ने कहा कि इन सभी साधनाओं का असली उद्देश्य आत्मशुद्धि, करुणा और समाज का कल्याण है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पूजा-पद्धतियाँ परिवार, क्षेत्र, संप्रदाय और गुरु-परंपरा के अनुसार अलग हो सकती हैं। इसलिए किसी एक विधि को सबके लिए एकमात्र अनिवार्य नियम नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने सामान्य साधकों के लिए पांच सरल संकल्प बताए। पहला है शरीर की शुचिता, यानी अपनी सेहत और सामर्थ्य के अनुसार सात्त्विक आहार और नियमित दिनचर्या अपनाना। दूसरा है वाणी का संयम, यानी कटु वचन, निंदा और अनावश्यक विवाद से बचना। तीसरा है मन का अनुशासन, जिसके लिए रोज कुछ समय देवी-स्तुति, जप या मौन ध्यान को देना चाहिए। चौथा है कर्म की पवित्रता, यानी किसी कमजोर, असहाय या पीड़ित की मदद करना। पांचवां है आत्मनिरीक्षण, जिसमें हर दिन अपना एक दोष पहचानकर उसे सुधारने का संकल्प लिया जाए।

आचार्य ब्रजेश मिश्र

उन्होंने कहा कि उपवास का अर्थ केवल भोजन छोड़ना नहीं है, बल्कि उन प्रवृत्तियों पर संयम भी है जो मनुष्य को विवेकहीन बनाती हैं। पूजा का मतलब सिर्फ फूल चढ़ाना नहीं, बल्कि आचरण में पवित्रता लाना भी है। जप भी मंत्रों की पुनरावृत्ति भर नहीं, मन को एकाग्र करने का प्रयास है। इसी भाव को व्यक्त करते हुए उन्होंने स्वरचित श्लोक सुनाया, ‘दुर्गे दुर्गतिनाशिनि त्वं धैर्यं देहि निरन्तरम्। धर्ममार्गे स्थितिं देहि मोहं नाशय मे शिवे॥’ इसका भावार्थ है कि हे दुर्गे, दुर्गतियों का नाश करने वाली माता, मुझे निरंतर धैर्य दीजिए, धर्ममार्ग पर स्थिर रखिए और मेरे मोह का नाश कीजिए। आचार्य ने स्पष्ट किया कि यह श्लोक किसी प्राचीन शास्त्र का उद्धरण नहीं, उनकी अपनी भक्ति की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है।

स्त्री-सम्मान पर जोर देते हुए आचार्य मिश्र ने कहा कि जिस समाज में देवी को जगज्जननी और महिषासुरमर्दिनी माना जाता है, वहाँ महिलाओं की गरिमा, स्वतंत्रता और सुरक्षा की उपेक्षा गंभीर आत्मविरोध है। उन्होंने कहा कि कन्या-पूजन श्रद्धा का प्रतीक है, लेकिन उसकी सच्ची अभिव्यक्ति तब है जब हर बालिका को भयमुक्त वातावरण, शिक्षा, अवसर और सम्मान मिले। बालिकाओं की शिक्षा, महिलाओं की सुरक्षा और उनके निर्णयों के सम्मान में भी वही संवेदनशीलता दिखनी चाहिए। आचार्य ने कहा कि नवरात्र का परम संदेश यही है कि शक्ति की उपासना केवल याचना न रहे, वह आत्मपरिवर्तन का संकल्प भी बने। दीपक मंदिर में जले तो उसका प्रकाश व्यवहार तक पहुंचे, और देवी के चरणों में शीश झुके तो अन्याय के सामने मनुष्य का आत्मसम्मान न झुके।