Aatma Babu RIP : आत्मा बाबू के कर्मकांड का अद्भुत गणित, पाप मोचिनी एकादशी से चैत्र नवरात्र तक का दुर्लभ संयोग

Rajesh Thakur | Patna

जीवन और मृत्यु के बीच आस्था की जो महीन रेखा भारतीय परंपरा को विशिष्ट बनाती है, आत्मानंद सिंह उर्फ ‘आत्मा बाबू’ की अंतिम यात्रा ने उसे एक बार फिर रेखांकित कर दिया है। उनके कर्मकांड का अद्भुत गणित और पाप मोचिनी एकादशी से चैत्र नवरात्र तक का दुर्लभ संयोग शायद ही कभी दिखे। उनके निधन से लेकर अंतिम कर्मकांड तक की पूरी अवधि न केवल हिंदू धार्मिक तिथियों से जुड़ी रही, बल्कि इसी दौरान अन्य धर्मों के प्रमुख पर्व भी साथ-साथ चलते रहे, जिसने इस प्रसंग को एक व्यापक सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य दे दिया है।

बनारस में घाट पर कर्मकांड की रस्म निभाते पुत्र संजीव सिंह व पौत्र मन्नू सिंह… फोटो मुखियाजी।

मणिकर्णिका घाट पर हुआ अंतिम संस्कार : हवेली खड़गपुर के घोषपुर निवासी उनके छोटे भाई सदानंद सिंह बताते हैं कि बड़े भाई आत्मा बाबू का निधन पापमोचिनी एकादशी के दिन हुआ। यह भारतीय पंचांग में ऐसी तिथि है, जिसे हिंदू धर्म में पापों के शुद्धिकरण और आत्मिक मुक्ति से जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन उपवास और भक्ति से व्यक्ति को आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है। यही नहीं, संयोगवश उसी तिथि में काशी के मणिकर्णिका घाट पर उनका अंतिम संस्कार भी संपन्न हुआ। इसके गवाह खुद उसी पल उदित होते चंद्रदेव और सूर्यदेव दोनों रहे। इसे परिवार के लोग दैवीय संकेत के रूप में देख रहे हैं। घाट पर मौजूद दाह-संस्कार कराने वाले पंडित ने मुखियाजी डॉट कॉम को बताया कि धार्मिक दृष्टि से काशी को मोक्ष की नगरी कहा जाता है। मान्यता है कि यहां मृत्यु होने या अंतिम संस्कार होने से आत्मा को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है। मणिकर्णिका घाट, जहां उनका दाह संस्कार हुआ, सदियों से ‘अनंत अग्नि’ का प्रतीक माना जाता है। यहां वर्षों से अग्नि लगातार प्रज्वलित हो रही है। यह चितास्थल जीवंत है। यहां दाह-संस्कार के पहले महादेव पार्थिव शरीर के दायें कान में तारक मंत्र देते हैं।

मन चंगा कठौति में गंगा : मुखाग्नि देने वाले पुत्र संजीव सिंह कहते हैं कि पिता के असमय चले जाने का उन्हें अत्यंत दुख है, लेकिन होनी को टाला भी नहीं जा सकता है। भगवान की मर्जी के आगे इंसान का कुछ चलने वाला भी तो नहीं है। उनके लेखा-जोखा को हमें हर हाल में स्वीकार करना ही होगा। लेकिन उन्हें यह आश्चर्य लगा कि उन्हें दुनिया से विदा होने का अहसास हो गया था। दरअसल, जिस तेजी से उन्होंने सांसारिक कार्यों को निबटाया और खुद को परमात्मा से जोड़ा, यह अद्भुत है। निधन के पहले उनका लिखे आध्यात्मिक वाक्य पढ़कर आंखें डबडबा जाती हैं। वहीं गांव के लोगों का कहना है कि आत्मा बाबू अपने जीवन के अंतिम समय में ईश्वर और मुक्ति की चर्चा अधिक करते थे, जो अब इन घटनाओं के साथ एक विशेष अर्थ ग्रहण कर चुकी है। वे मंगलवार और शनिवार को गंगा स्नान करना नहीं भूलते थे। यदि किसी कारण गंगा घाट नहीं जा पाते थे तो ‘मन चंगा कठौति में गंगा’ कहावत को चरितार्थ करते हुए घर में ही गंगाजल मिलाकर स्नान कर लेते थे। यह उनकी आस्था का नियमित हिस्सा था।

रामनवमी तक चलेगा कर्मकांड : परिजनों के अनुसार, यह भी अद्भुत संयोग है कि हिंदू परंपरा के अनुसार मृत्यु के बाद होने वाले कर्मकांडों की एक निश्चित प्रक्रिया होती है। आत्मा बाबू के मामले में यह प्रक्रिया रामनवमी के दिन पूर्ण होगी। वह दिन, जिसे भगवान राम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है और जो धर्म, मर्यादा और आदर्श जीवन का प्रतीक है। परिवार के लोग इसे एक ‘शुभ समापन’ के रूप में देख रहे हैं। कितना शुभ है कि जीवन की अंतिम यात्रा भगवान राम के जन्मोत्सव के दिन पूर्ण हो रही है। इतना ही नहीं, परंपरा के अनुसार अंतिम कर्मकांड से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण रस्म पीपल में जल अर्पित करने की है और यह परंपरा चैत्र नवरात्र की दशमी तिथि को संपन्न होगी। यह रस्म आत्मा की शांति और पितरों के प्रति सम्मान का प्रतीक मानी जाती है। इस प्रकार, पूरी प्रक्रिया एक धार्मिक कालखंड के भीतर क्रमबद्ध रूप से पूरी हो रही है, जो हिंदू पंचांग के अनुसार अत्यंत पवित्र माना जाता है।

एक साथ चले कई धर्मों के पर्व : इस पूरी अवधि की एक और विशेषता यह रही कि जहां एक ओर हिंदू धार्मिक तिथियों के अनुसार कर्मकांड संपन्न हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय के पवित्र महीने रमजान के दौरान रोजे रखे गये। इसी बीच ईद का पर्व भी मनाया गया। इस संयोग ने इस पूरे प्रसंग को केवल एक धार्मिक उद्धरण तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे भारतीय समाज की साझा सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक बना दिया, जहां अलग-अलग आस्थाएं एक ही समय में, एक ही समाज के भीतर जीवित रहती हैं। आत्मा बाबू की अंतिम यात्रा में जुड़ी ये तिथियां और परंपराएं अब चर्चा का विषय बन गयी हैं। कुछ लोग इसे आस्था का प्रभाव मानते हैं, तो कुछ इसे संयोग की श्रृंखला के रूप में देखते हैं। बहरहाल, इस पूरे प्रकरण ने एक बात स्पष्ट कर दी है कि भारतीय समाज में मृत्यु केवल एक व्यक्तिगत घटना नहीं होती, बल्कि वह परंपरा, विश्वास और सांस्कृतिक निरंतरता का हिस्सा बन जाती है। आत्मा बाबू का जीवन भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन उनकी अंतिम यात्रा ने एक ऐसी कथा को जन्म दिया है, जिसमें धर्म, समय और संयोग एक साथ दिखाई देते हैं।
पापमोचिनी एकादशी से शुरू हुई यह यात्रा रामनवमी तक पहुंचेगी और चैत्र नवरात्र की दशमी पर अपनी अंतिम कड़ी पूरी करेगी, मानो एक जीवन, पूरी तरह परंपरा में समाहित होकर विदा ले रहा हो। उल्लेखनीय है कि आत्मा बाबू ने अपने निधन से ठीक पांच दिन पहले अपने पौत्र मन्नू सिंह को एक संक्षिप्त, लेकिन अत्यंत भावपूर्ण संदेश लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा था- ‘परमात्मा मुझे अपने में लीन कर लें।’ उस समय इसे सामान्य आध्यात्मिक अभिव्यक्ति माना गया, लेकिन अब जब उनके निधन से लेकर अंतिम संस्कार तक की पूरी प्रक्रिया पापमोचिनी एकादशी से लेकर रामनवमी और चैत्र नवरात्र की तिथियों में क्रमबद्ध रूप से घटित होती दिख रही है, तो यह संदेश एक गहरे संकेत के रूप में देखा जाने लगा है।