बांकीपुर उपचुनाव पर मुखियाजी का बतकुच्चन : काउंटिंग का काउंटडाउन शुरू, किनकी रात भारी; नितिन नवीन, सम्राट चौधरी, प्रशांत किशोर या तेजस्वी की

Mukhiyajee Reporter | Rajesh Thakur

देखिए भइया, हम न चुनाव लड़ रहे हैं, न किसी के एजेंट हैं। हम त बस वही बतिया रहे हैं, जो चाय की दुकान से लेकर पटना के पॉलिटिकल गलियारे तक उड़ रहा है। अब इसमें किसको मिर्ची लगे और किसको मिठास मिले, ई जनता जाने! और हाँ, ईवीएम खुलेगी, तब पता चलेगा किसका गणित सही था। फिलहाल तो बिहार में हर आदमी खुद को चुनाव विश्लेषक समझ रहा है। लोकतंत्र की यही खूबसूरती है; वोट जनता देती है, लेकिन सरकार पहले चाय की दुकान पर बन जाती है और 3 अगस्त तक यानी ईवीएम खुलने के पहले तक सब जीतते रहेंगे। बांकीपुर उपचुनाव का मतदान गुरुवार को हुआ था। उसी दिन ईवीएम भी सील हो गयी, लेकिन आज 2 अगस्त को भी यदि कुछ सील नहीं है तो इस उपचुनाव को लेकर नेताओं और समर्थकों की बोली। कुछ की बोली को आप ‘कठबोली’ भी कह सकते हैं। दरअसल, वोटिंग के बाद आज तीसरा दिन है। मतलब काउंटिंग शुरू होने में बस रात भर का फासला है। इसे कहा भी जाता है- यही रात अंतिम, यही रात भारी। बेशक इसमें सच्चाई भी है। बाकी लोगों के लिए तो नहीं कह सकता, लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और जनसुराज के संस्थापक सह प्रत्याशी प्रशांत किशोर के लिए यह रात ‘अंतिम’ न सही, लेकिन ‘भारी’ तो जरूर है। हालांकि, राजद के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव के लिए भी है, लेकिन उनकी रणनीति से ‘उतना’ नहीं। ऐसे में अब नेता बहसों के बीच कैलकुलेटर ज्यादा बन गए हैं। चाय की दुकान से लेकर पार्टी कार्यालय तक हर जगह वही पुराना खेल तीन दिनों से चल रहा है और आज रविवार को भी दिनभर जारी रहा। बहस का दौर अब मोबाइल फोन से व्हाट्सअप कॉल तक पर जारी है। सोशल मीडिया पर तो ‘बांकीपुर उपचुनाव का बाहुबली कौन’ पर एक अलग प्रकार का ट्रेंड चल रहा है।

आप पढ़ रहे हैं मुखियाजी का बतकुच्चन 👇

बहसों में खूब चल रहा है- ‘हमारा वोट इधर से आया, उनका वोट उधर चला गया… मंदिरी मुहल्ले के यादव वोटर्स ‘किधर’ गये… सब्जीबाग के मुस्लिम ‘उधर’ गये। चिरैयाटांड़ से लेकर बोरिंग रोड, गोलघर, एक्जीबिशन रोड, सिपारा, फुलवारी… सब मुहल्ले में वोट के ठेकेदार अलग ही गणित समझा रहे हैं। कोई कुर्मी वोटरों को जबरदस्ती इधर से उधर कर रहा है तो कोई भूमिहार-ब्राह्मण को कहीं और शिफ्ट कर रहा है। कायस्थ-कोइरी को तो भाई-भाई बताने वालों की भी कमी नहीं है। हर कोई अपने हिसाब से अपनी-अपनी जीत का ‘हिसाब’ निकाल रहा है, लेकिन ‘सियासी गणित’ सबका बिगड़ा हुआ है। बांकीपुर उपचुनाव में इस बार चर्चा केवल जीत-हार की नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक सवाल की भी है। सवाल यह कि क्या बिना मजबूत संगठन और कैडर के, केवल दूसरे दलों के वोटों में सेंधमारी करके चुनाव जीता जा सकता है? इस प्रश्न की गंभीरता की चिंता किसी को नहीं है। और यही सवाल जनसुराज के संस्थापक सह प्रत्याशी प्रशांत किशोर को लेकर सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है। बिहार की राजनीति में उन्होंने एक नया विमर्श खड़ा किया है। सभाओं में भीड़ जुटी, मुद्दों पर चर्चा हुई और राजनीति की पारंपरिक शैली को चुनौती देने की कोशिश भी हुई। लेकिन चुनाव आखिरकार बूथ पर लड़ा जाता है। वहां भाषण नहीं, मतदाता की अंतिम पसंद काम करती है। इसलिए इस चुनाव ने संगठन और सामाजिक समीकरण, दोनों की असली परीक्षा ले ली है।

बांकीपुर का सामाजिक गणित भी कम दिलचस्प नहीं है। कुल मतदाताओं में कायस्थ लगभग 15 प्रतिशत बताए जाते हैं। भूमिहार, ब्राह्मण और राजपूत मिलाकर करीब 22 प्रतिशत। वैश्य, यादव और कोईरी-कुर्मी लगभग 12-12 प्रतिशत के आसपास माने जाते हैं। मुस्लिम मतदाता लगभग 8 प्रतिशत हैं, जबकि शेष हिस्से में दलित, महादलित, अत्यंत पिछड़ा वर्ग और अन्य समुदाय आते हैं। यही सामाजिक ताना-बाना हर चुनाव में अलग-अलग राजनीतिक कहानी लिखता है। सियासी पंडितों के अनुसार इस बार जनसुराज की सबसे बड़ी उम्मीद सवर्ण वोटों में, खासकर कायस्थ को छोड़कर भूमिहार, ब्राह्मण और राजपूत समाज में अधिकतम सेंध लगाने की रही। दूसरी बड़ी उम्मीद मुस्लिम मतदाताओं के बड़े हिस्से से जुड़ी है। इसके अलावा यादव, कुर्मी और दलित मतदाताओं में भी आंशिक समर्थन मिलने की बात कही जा रही है। लेकिन इसी मुद्दे पर सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है। यदि हर समाज से थोड़ा-थोड़ा वोट मिले, तो क्या वह जीत के लिए पर्याप्त होता है? या फिर चुनाव जीतने के लिए किसी एक बड़े सामाजिक समूह और मजबूत बूथ संगठन का साथ अनिवार्य होता है?

भाजपा का दावा बिल्कुल अलग किस्म का माना जा रहा है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि कायस्थ मतदाताओं का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ मजबूती से खड़ा रहा। कोईरी-कुर्मी समाज में भी उसे अच्छी बढ़त मिलने की बात कही जा रही है। वैश्य वर्ग को भाजपा का पारंपरिक आधार माना ही जाता है। दलित और अन्य वर्गों में भी उसे उल्लेखनीय समर्थन मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है। वहीं प्रशांत किशोर की तरफ भूमिहार और राजपूत समाज की हवा रहने के बाद भी सर्वे रिपोर्ट कह रही है कि भूमिहार वर्ग में 35 परसेंट वोटिंग बीजेपी के पक्ष में हुई है, जबकि राजपूत समाज से तो 50-50 की बात कही जा रही है। सियासी पंडितों का भी इससे इनकार नहीं है। भाजपा का भरोसा केवल सामाजिक समीकरण पर नहीं, बल्कि वर्षों से खड़े किए गए बूथ नेटवर्क, पन्ना प्रमुख और कार्यकर्ताओं की उस मशीनरी पर भी है, जो मतदान के दिन मतदाता को घर से बूथ तक पहुंचाने का काम करती है। राजद का गणित भी अपनी जगह मजबूत माना जा रहा है। सियासी विश्लेषकों का कहना है कि यादव मतदाता आज भी उसके सबसे भरोसेमंद आधार हैं। हां, मुस्लिम मतदाताओं के बिखराव में इस बार तेजस्वी का जादू नहीं के बराबर चला। हालांकि, जिस प्रकार तेजस्वी यादव ने जीत का दावा किया है, उससे दो बातें ही लगती हैं; पहला, वह अपनी डूबती नैया से वाकिफ हैं अथवा माय समीकरण के अलावा उम्मीदवार रेखा गुप्ता की वजह से वैश्य समाज में सेंधमारी पर भरोसा है। हालांकि इसकी उम्मीद कम ही है। सच में यदि माय समीकरण नहीं टूटा होगा तो बेशक राजद का प्रदर्शन जनसुराज से बेहतर हो सकता है। इसके अलावा गरीब-गुरबों और पारंपरिक कैडर वोट की ताकत भी राजद की सबसे बड़ी पूंजी मानी जाती है। यही वजह है कि कई बार हवा चाहे जिस दिशा में बहती दिखे, मतगणना के दिन राजद अपेक्षा से अधिक मजबूत दिखाई देता है।

बहरहाल, मैदान में केवल तीन प्रमुख उम्मीदवार ही नहीं हैं। इनके अलावा 22 अन्य प्रत्याशी भी हैं और एक अघोषित प्रत्याशी नोटा भी हैं। राजनीतिक जानकारों का अनुमान है कि 10-12 हजार वोट छोटे उम्मीदवारों और नोटा में चले जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं। पहली नजर में यह संख्या छोटी लग सकती है, लेकिन उपचुनावों में कई बार जीत का अंतर इससे भी कम रहा है। ऐसे में हर बिखरा हुआ वोट किसी न किसी उम्मीदवार का समीकरण बिगाड़ भी सकता है और बना भी सकता है। यह तो जगजाहिर है कि मतदान लगभग 35 प्रतिशत हुआ है। यानी करीब एक लाख 30 हजार मत ही ईवीएम में कैद हुए हैं। कम मतदान हमेशा राजनीतिक विश्लेषकों को सोचने पर मजबूर करता है। क्या कम मतदान संगठित दलों को फायदा पहुंचाता है? या फिर बदलाव की चाह रखने वाला मतदाता ज्यादा अनुशासित होकर घर से निकलता है? इस सवाल का जवाब हर चुनाव में अलग होता है। इसलिए इस बार भी कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन बांकीपुर के मामले में ये सारे संभावित निष्कर्ष बेमानी हैं। (कु)-तर्क देने वाले तो यहां तक कहते हैं और सवाल दागते हैं कि शहरी क्षेत्र में कौन वोटर्स घर से नहीं निकलते हैं। इसका जवाब भी वही देते हैं। बताते हैं कि शहर के एलीट क्लास के लोग वोट देने नहीं निकलते हैं, शहर के व्यवसायी वर्ग नहीं निकलते हैं। मतलब साफ है कि (कु)-तर्क देने वालों के मन में जनसुराज या राजद के प्रति सहानुभूति है, लेकिन हमें उनके ‘तर्क’ पर सहानुभूति है। वे आंकड़े नहीं देखते हैं कि 2010 से लेकर 2025 तक के चुनावों में वोटिंग परसेंट का रेशियो भी 35-36 परसेंट का ही रहा है। इस बार भी यह परसेंटेज लगभग 35 का ही रहा तो इसका साफ मतलब है जो वोटर्स घर से पहले नहीं निकलते थे, वही वोटर्स इस बार भी नहीं निकले। जहां तक सात परसेंट कम की बात है तो पिछले उपचुनाव यानी 2006 में तो 19 परसेंट ही पोल हुआ था, तब घर से कौन वोटर्स नहीं निकले थे। फिर उस 19 परसेंट में ही भाजपा के नितिन नवीन अब तक के रिकॉर्ड वोट से कैसे जीत गये थे। वे सब संगठन के वोट थे। यही कारण है कि भारतीय चुनावों में संगठन को आज भी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी माना जाता है। सेंधमारी चुनाव को रोचक बना सकती है, मुकाबला कांटे का कर सकती है, लेकिन क्या वह संगठन की कमी पूरी कर सकती है? यही इस बांकीपुर उपचुनाव का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है। ऐसे में अब सारी बहसों, दावों, प्रतिदावों और सियासी गणित पर अंतिम मुहर मतगणना के दिन लगेगी। तब पता चलेगा कि बांकीपुर ने संगठन की ताकत को चुना, परंपरागत सामाजिक समीकरणों पर भरोसा जताया या फिर सेंधमारी की राजनीति को नयी पहचान दी। बस कुछ घंटों की और इंतजारी, उसके बाद तो कहीं खुशी, कहीं गम का ट्रेलर दिखेगा ही। इसी तरह की पंचायत से पार्लियामेंट तक की खबरों को पढ़ने के लिए मुखियाजी डॉट कॉम को विजिट करते रहिए। मुखियाजी का बतकुच्चन के साथ ही गली के सितारे, जल-जीवन-हरियाली, बर-बाजार, ग्राम देवता, कैबिनेट मीटिंग आदि कॉलम में भी रोचक खबरों को पढ़िए।