Nidhi Shekhar | Patna
डिजिटल युग ने मनुष्य के जीवन को जितना सहज बनाया है, उतना ही जटिल भी। स्क्रीन, नेटवर्क और डेटा के इस दौर में सुविधा और जोखिम साथ-साथ चलते हैं। एक क्लिक जहां दूरी घटाता है, वहीं यही क्लिक कभी-कभी अनदेखे खतरों के दरवाजे भी खोल देता है। इसी बदलते यथार्थ से रूबरू करा रही है भारतीय पुलिस सेवा के वरीय अधिकारी और वर्तमान में ADG रैंक पर तैनात सुशील कुमार की नयी पुस्तक ‘साइबर कथाएं : डिजिटल सुरक्षा की राह’। लेखक इसके माध्यम से साइबर संसार की परतों को खोलने का प्रयास करते हैं। पुलिस सेवा में वर्षों के अनुभव और समाज को करीब से देखने की दृष्टि के साथ लेखक इस पुस्तक में तकनीक को न तो रहस्य बनाते हैं, न ही डर का औजार। वे साइबर दुनिया को एक समानांतर संसार की तरह देखते हैं, जिसे समझना, पहचानना और सावधानी से बरतना आज की अनिवार्यता है।
क्या कहते हैं लेखक : लेखक सुशील कुमार अपनी किताब के बहाने सोशल मीडिया पर लिखते हैं- ‘याद करिए जब चंदा मामा के पास आकर कटोरी में दूध-भात खाने की कहानियां और लोरियां सुनते-सुनाते दो पीढ़ियां बड़ी होते हुए ढलान पर गयीं। अब तो जेन-एक्स और जेन-जी पीढ़ियां अपने नये संसार के साथ पैदा हो रही हैं और लोरियों वाली पीढ़ियों में इनसे सीखने, इनके समय के तकनीक और संसार को आत्मसात करने की होड़ मची है। जरूरत भी है, मौका भी और दस्तूर भी। मेरी मां ने जब आज से दो साल पहले जब मुझे फेसबुक पर मित्रता निवेदन भेजा तो वो पचहत्तर वसंत देख चुकी थी। अब वो अपने पोते-पोतियों, नाती-नातिनों से व्हाट्सएप पर वीडियो कॉल के माध्यम से बात करती हैं, जबकि 10 साल पहले बटन वाले फीचर फोन भी बमुश्किल चला पाती थी।’


साइबर अब एक संसार है : वे आगे लिखते हैं- ‘साइबर अब एक संसार है। हमारे आसपास के संसार से ज्यादा विस्तृत, रोमांचकारी और खतरों से भरा है और हमारे अर्थशास्त्र और अपराधशास्त्र के ज्ञान को चुनौती देता हुआ रोज पहले से ज्यादा गति से हमारे मस्तिष्क में घुसता चला आ रहा है। संचार तकनीक के उत्तरोत्तर विकास की गाथा हम गाएं, गुनगुनाएं या आगे बढ़ाएं, साइबर तकनीक ने हमारी समय की सारी खिड़कियां खोल दी है और जिनकी आपसी कनेक्टिविटी के लिए किसी माध्यम की जरूरत नहीं रह गयी है। ज्ञान तकनीक, अपराध और उल्लंघनों का जाल हमारे सोचने, काम करने और खुद को बचाये रखने के उपक्रम में तिलिस्म की तरह गुंथा जा रहा है।’


डिजिटल युग में तकनीक से दूरी बनाना होशियारी नहीं : बकौल लेखक सुशील कुमार, ‘इस किताब में हम उस तकनीक के दरवाजे पर दस्तक देकर ये जानने की कोशिश करेंगे कि अंदर कौन क्या कर रहा है, घुसने का रास्ता कैसा हो और सही सलामत निकल जाने के लिए क्या उपक्रम करने चाहिए। कोशिश रहेगी किस्सागोई की, और उसके सहारे साइबर तकनीक, सुरक्षा और अपराध के बहु आयामी पहलुओं को सामने लाने की।’ बहरहाल, डिजिटल युग में तकनीक से दूरी बनाना होशियारी नहीं है, बल्कि उसकी समझ रखना ही सबसे बड़ी सुरक्षा है। यह पुस्तक पाठकों को डराने के बजाय अलर्ट करेगी, ताकि सुविधा और खतरे के इस पैरलल दुनिया में हम आंखें खुली रखकर आगे बढ़ सकें। ऐसे में यह पुस्तक तकनीक से भागने का नहीं, बल्कि उसे समझकर सुरक्षित रहने का मैसेज देती है।




