उत्तर प्रदेश विधानसभा में बोले बिहार के स्पीकर डॉ प्रेम कुमार, जवाबदेही से ही मजबूत होती है विधायिका

Mukhiyajee । Lucknow
जनता के प्रति जवाबदेही को लोकतंत्र की आत्मा बताते हुए बिहार विधान सभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार ने कहा कि विधायिका की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता तभी सुदृढ़ हो सकती है, जब वह पारदर्शिता, निगरानी और नागरिक सहभागिता के सिद्धांतों पर निरंतर कार्य करे। वे लखनऊ स्थित उत्तर प्रदेश विधानसभा में आयोजित 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन के प्लेनरी सत्र को संबोधित कर रहे थे। यह सम्मेलन 19 जनवरी से शुरू हुआ था और आज इसका समापन हुआ। इस राष्ट्रीय सम्मेलन में देश भर की विधानसभाओं और विधान परिषदों के पीठासीन अधिकारियों की सहभागिता रही। सम्मेलन के अंतिम दिन आयोजित प्लेनरी सत्र में उन्होंने ‘जनता के प्रति विधायिका की जवाबदेही’ विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि लोकतंत्र में सत्ता का मूल स्रोत जनता होती है और विधायिका जनता की इच्छा की प्रतिनिधि संस्था होने के नाते उसके प्रति उत्तरदायी रहना अपना मूल दायित्व मानती है।

बिहार विधानसभा अध्यक्ष ने यह भी कहा कि विधायिका की जवाबदेही का पहला और सबसे महत्वपूर्ण आधार पारदर्शिता है। सदन की कार्यवाही, विधायी बहस, प्रश्नोत्तर, समितियों की रिपोर्ट और विधेयकों पर विचार, इन सभी प्रक्रियाओं की खुली और सुलभ प्रस्तुति से ही जनता का विश्वास मजबूत होता है। उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक के माध्यम से कार्यवाही का सीधा प्रसारण, डिजिटल अभिलेख और सार्वजनिक पोर्टलों पर सूचनाओं की उपलब्धता ने विधायिका और नागरिकों के बीच की दूरी को काफी हद तक कम किया है। जवाबदेही का दूसरा अहम पक्ष बताते हुए डॉ. प्रेम कुमार ने निगरानी और नियंत्रण की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि कार्यपालिका की नीतियों, व्यय और प्रशासनिक निर्णयों की प्रभावी समीक्षा विधायिका का संवैधानिक दायित्व है। प्रश्नकाल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव और संसदीय समितियां ऐसे सशक्त उपकरण हैं, जिनके माध्यम से सरकार को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाया जाता है। उन्होंने कहा कि जब ये संसदीय प्रक्रियाएं सक्रिय और सार्थक ढंग से उपयोग में लायी जाती हैं, तो शासन अधिक संवेदनशील और उत्तरदायी बनता है।

तीसरे महत्वपूर्ण बिंदु के रूप में उन्होंने नागरिक सहभागिता पर बल देते हुए कहा कि जनसंवाद, मीडिया और लोकतांत्रिक विमर्श के माध्यम से जनमत की अभिव्यक्ति विधायिका को जनता की अपेक्षाओं से जोड़े रखती है। नागरिकों की सक्रियता और विधायिका की संवाद-तत्परता से ही लोकतंत्र जीवंत और सशक्त बनता है। उन्होंने डिजिटल तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि इन नवाचारों ने अधिकार और जवाबदेही, दोनों को अधिक सहज और प्रभावी बनाया है। विधायिकाओं को इन तकनीकों से सीखते हुए इनके माध्यम से अपने संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन को और सुदृढ़ करना होगा। उन्होंने कहा कि जनता के प्रति जवाबदेही कोई औपचारिक या वैधानिक बाध्यता मात्र नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक नैतिकता का मूल तत्व है। विधायिका जितनी अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी और संवेदनशील होगी, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा। उन्होंने विश्वास जताया कि बिहार विधान सभा इस मूल भावना के साथ निरंतर कार्यरत है और भविष्य में भी जनता के विश्वास को और मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध रहेगी। अंत में गीता के उपदेश का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा- ‘नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः अर्थात् नियत कर्तव्य का पालन ही श्रेष्ठ है, क्योंकि कर्तव्य से विमुख होना कर्म से हीन है।