पंचायत प्रतिनिधियों के ‘शक्ति प्रदर्शन’ से चौंका सियासी गलियारा, पक्ष-विपक्ष के साथ तीसरे खेमे भी मची हलचल

Rajesh Thakur / Patna : राजधानी के बापू सभागार में पंचायत प्रतिनिधियों के ‘शक्ति प्रदर्शन’ से बिहार के सियासी जगत में हलचल मच गयी है। इस सम्मेलन में राज्य के 8000 से अधिक पंचायतों से मुखिया, जिला पार्षद, पंच, सरपंच, प्रखंड प्रमुख सहित हजारों की संख्या में अन्य प्रतिनिधि शामिल हुए। इसमें पुरुष के साथ ही काफी संख्या में महिला प्रतिनिधियों ने भी शिरकत की। खास बात कि हर पंचायत प्रतिनिधि के साथ तीन-चार की संख्या में उनके समर्थक भी आए थे। इतनी संख्या में आयी भीड़ ने यह साफ कर दिया कि गाँव की सरकार को इग्नोर करना बिहार के नेताओं के लिए अब आसान नहीं है। पंचायत प्रतिनिधि चाह ले तो वे सियासी गलियारे में एक नया समीकरण गढ़ सकते हैं।

दरअसल, त्रिस्तरीय एवं कचहरी प्रतिनिधियों का महासम्मेलन 24 अगस्त को पटना में हुआ था। इस महासम्मेलन को मुखिया संघ के प्रदेश अध्यक्ष सह त्रिस्तरीय पंचायत प्रतिनिधि संघ के संयोजक मिथिलेश कुमार राय और पंच-सरपंच संघ के प्रदेश अध्यक्ष अमोद कुमार निराला ने आयोजित किया था। इसके आयोजन में बिहार प्रदेश मुखिया संघ, बिहार प्रदेश पंच-सरपंच संघ, पंचायत समिति/ प्रमुख/ उप प्रमुख संघ बिहार, जिला परिषद संघ बिहार, पंचायत वार्ड सदस्य संघ बिहार का भी अहम योगदान रहा। सभी संगठनों के तमाम पदाधिकारी भी शामिल हुए थे। इतना ही नहीं, मंच से संगठन के पदाधिकारियों ने न केवल अपनी 15 सूत्री मांगों को रखा, बल्कि बिहार की एनडीए सरकार को तमाम मांगों को पूरी करने के लिए 15 दिनों का अल्टीमेटम भी दिया है।

सियासी पंडितों की मानें तो बिहार विधानसभा चुनाव के ठीक पहले महासम्मेलन में जिस तरह से पंचायत प्रतिनिधि संगठित रूप से एक मंच पर दिखे, उससे यह साफ मैसेज मिलता है कि उन्हें सरकार या विपक्ष के लोग कमजोर न समझें और न ही उनकी मांगों को इग्नोर करें। वे भविष्य में अपनी राजनीतिक भूमिका को और मजबूत करने के लिए तैयार हैं। पंचायतों की इतनी बड़ी मौजूदगी ने सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों को सतर्क कर दिया है। जिस तरह पंचायत प्रतिनिधियों ने सरकार को खुला अल्टीमेटम दिया है, उससे भी पता चलता है कि वे सरकार और शासन-प्रशासन के उदासीन रवैये से न केवल मायूस हैं, बल्कि काफी आक्रोशित भी हैं। वक्ताओं ने भी खुले मंच से कहा कि सरकार लगातार पंचायत प्रतिनिधियों के साथ भेदभाव कर रही है। मनरेगा का काम बंद कर दिया गया है, जिससे प्रतिनिधि गुस्से में हैं और अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि हमलोग अपना हक सरकार से लेकर रहेंगे।

बता दें कि पूरे बिहार में 534 प्रखंड हैं और पंचायतों की संख्या 8000 से अधिक है। इसमें जितनी संख्या मुखिया की है, उतनी ही संख्या सरपंच की है। इसी तरह, जिला पार्षदों की संख्या 1161 के करीब है। वहीं पंच, पंचायत समिति सदस्य और वार्ड काउंसलरों की संख्या भी लाखों में है। एक अनुमान के अनुसार पंचायत प्रतिनिधियों के सभी आधा दर्जन ईकाइयों को मिलाकर यह संख्या लगभग सवा दो लाख के आसपास है। इसमें 50 परसेंट महिला प्रतिनिधि हैं। दरअसल, बिहार में पंचायत चुनाव में महिलाओं को 50 परसेंट आरक्षण मिला हुआ है। ऐसे में पंचायत प्रतिनिधियों की ताकत को नकारा नहीं जा सकता है। सियासी पंडितों की मानें तो पंचायत प्रतिनिधियों ने महासम्मेलन के जरिए पटना में चुनाव के ठीक पहले शक्ति प्रदर्शन कर सरकार को एक मैसेज देने का काम किया है। यह भी सच है कि सत्ता और सरकार ही नहीं, यह विपक्ष के लिए भी संकेत है।

बहरहाल, अगर पंचायत प्रतिनिधि संगठित होकर अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हैं, तो यह सत्ता ही नहीं विपक्ष के लिए भी मुश्किलें खड़ी कर सकता है। खासकर तब, जब सरकार की योजनाओं को लागू करने की असली जिम्मेदारी इन्हीं प्रतिनिधियों पर होती है। वर्तमान में जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र मामले में पंचायत प्रतिनिधियों ने अपनी ताकत दिखा चुकी है। सियासी गलियारे में यह भी चर्चा है कि मुख्य विपक्षी दल सहित तीसरे मोर्चे की कवायद में जुटे राजनीतिक दल भी इस महासम्मेलन को सरकार विरोधी असंतोष के रूप में देखने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्ष का तर्क है कि पंचायत प्रतिनिधियों की नाराजगी, गाँव-गाँव तक जनमत को प्रभावित कर सकती है और इसका सीधा असर 2025 के चुनावी नतीजों पर दिख सकता है। सियासी पंडित यह भी मानते हैं कि यदि सरकार उनकी मांगों को पूरा नहीं करती है तो जनप्रतिनिधियों का यह संगठन सरकार की टेंशन बढ़ा सकता है और विपक्ष इसे भुनाने की कोशिश करेगा।

मुखिया संघ के अध्यक्ष मिथिलेश कुमार राय ने कहा कि पंचायत प्रतिनिधि सरकार के उदासीन रवैये से काफी नाराज है। उनके अधिकारों की लगातार कटौती हो रही है। जायज मांगों पर भी अधिकारी नहीं सुन रहे हैं। दुखद बात तो यह है कि मुख्यमंत्री के आदेश के बाद भी विभाग पंचायत प्रतिनिधियों को बरगला रहे हैं। पंचायत प्रतिनिधियों को भी पेंशन की सुविधा दी जाए और पंच-सरपंच सहित अन्य पंचायत प्रतिनिधियों को एमएलसी चुनाव में वोटर बनाया जाए, पंचायती राज आयोग का गठन किया जाए आदि हमारी प्रमुख मांगें हैं। मांगों की कॉपी हमने सरकार को भेज दी है। अब उन मांगों को मानना या नहीं मानना सरकार के हाथों में है।