Rajesh Thakur । Patna
बिहार के मुंगेर जिले में स्थित हवेली खड़गपुर अनुमंडल 11 जनवरी को अपने स्थापना के 35 वर्ष पूरे कर चुका है और 36 वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। यह महज एक प्रशासनिक इकाई की वर्षगांठ नहीं, बल्कि उस निरंतर यात्रा का प्रतीक है, जिसमें एक अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्र ने समय के साथ विकास, व्यवस्था और पहचान की नयी इबारत लिखी है। पहाड़ों की नगरी के नाम से चर्चित हवेली खड़गपुर अपने सीने में कितने ही राजाओं-महाराजाओं के इतिहास संजोये हुए है। पौराणिक, साहित्यिक और राजनीतिक रूप से उर्वर यह इलाका जंग-ए-आजादी में स्वतंत्रता सेनानियों का सेंटर और शेल्टर दोनों बना हुआ था। न जानें कितने ही नैसर्गिक स्थल इस ऐतिहासिक धरती पर फल-फूल रहे हैं। अब तो यह बड़ा पर्यटक स्थल बनने की राह पर चल पड़ा है। भीमबाँध, ऋषिकुंड, खड़गपुर झील क्या नहीं है यहां… अगर सरकार ध्यान दे तो पर्यटन केंद्रों का एक बड़ा सर्किट के साथ हब बन सकता है। जितना गरम पानी का स्रोत इस इलाके में है, उतना बिहार के किसी भी जिले में नहीं है। लेकिन अपने स्थापना दिवस पर ही यह शहर अन्य दिनों की तरह शांत बना रहा। न राजनीतिक स्तर पर, न प्रशासनिक स्तर पर और न सामाजिक स्तर पर खुशी के पल का कोई बड़ा कोलाहल सुनाई पड़ा। www.mukhiyajee.com और www.raajneetikadda.com (Under Maintenance) की खास पेशकश…
11 जनवरी विशेष दिन : हवेली खड़गपुर अनुमंडल की स्थापना 11 जनवरी 1991 को हुई थी। स्थापना के बाद से हवेली खड़गपुर अनुमंडल ने प्रशासनिक मजबूती के साथ-साथ सामाजिक और बुनियादी ढांचे के स्तर पर भी उल्लेखनीय प्रगति की है। सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, राजस्व व्यवस्था और कानून-व्यवस्था जैसे क्षेत्रों में क्रमिक सुधार इस बात के गवाह हैं कि अनुमंडल ने बीते साढ़े तीन दशकों में खुद को लगातार संवारा है। इन 35 वर्षों के दौरान कुल 15 अनुमंडल पदाधिकारी (SDM) ने यहां प्रशासनिक जिम्मेदारी संभाली। हर एसडीएम अपने साथ शासन की प्राथमिकताएं, कार्यशैली और विकास की अलग दृष्टि लेकर आए। किसी ने बुनियादी ढांचे पर जोर दिया, तो किसी ने प्रशासनिक पारदर्शिता और जनसुनवाई को मजबूत किया। इन्हीं प्रयासों का सम्मिलित परिणाम है कि आज हवेली खड़गपुर अनुमंडल प्रशासनिक रूप से अधिक सशक्त और व्यवस्थित दिखाई देता है। समय के साथ विकास का दायरा भी बढ़ा है। खड़गपुर मुख्यालय से कभी दिन में भी टेटिया बंबर जाने में लोगों को सोचना पड़ता था और शाम में जाना तो गुनाह ही था, वहां अब रात में भी जाकर लोग लौट आते हैं। हवेली खड़गपुर के प्रथम अनुमंडल पदाधिकारी के रूप में भगलू रजक की पोस्टिंग हुई थी। अधिसूचना के समय मुंगेर के प्रभार में था यह अनुमंडल, भगलू रजक के बाद विष्णु कुमार बने। उनके बाद उपेंद्र नारायण उरांव, मधु गुप्ता, विपिन कुमार सिन्हा, घनश्याम प्रसाद दफ्तुआर, एसएन श्रीवास्तव, चंदेश्वरी यादव, सलीम अख्तर, राशिद आलम, वसीम अहमद, संजीव कुमार, अमिताभ गुप्ता व आदित्य कुमार झा की पोस्टिंग हुई। वर्तमान में राजीव रोशन यहां के अनुमंडल पदाधिकारी हैं। इनमें से कई अधिकारियों ने मुखियाजी डॉट कॉम से बात भी की है। वहीं भगलू रजक और घनश्याम प्रसाद दफ्तुआर अब इस दुनिया में नहीं हैं। उन दोनों को ‘मुखियाजी’ की ओर से शत-शत नमन। (गांव-जवार की खबरों के लिए पढ़ते रहिए www.mukhiyajee.com, विज्ञापन के लिए व्हाट्सअप करें 9507777555 पर)

पौराणिक थाती : हवेली खड़गपुर का संबंध रामायण और महाभारत काल से है। गरम पानी के लिए प्रसिद्ध ऋषिकुंड इसका गवाह है। पौराणिक किंवदंति है कि सतयुग में रामायण काल से पहले यहां श्रृंगी ऋषि रहते थे। उन्हीं के नाम पर ऋषिकुंड पड़ा। इसी जगह उनकी एक कुटिया गरम पानी के तालाब के किनारे अवस्थित था। इसी कुटिया में श्रृंगी ऋषि रहते थे। उन्हीं के आशीर्वाद और यज्ञ कराने के बाद भगवान श्रीराम और उनके बाकी भाइयों का जन्म हुआ। इसके बाद से ही रामायण काल शुरू हुआ। कहा जाता है कि राजा दशरथ की पुत्री शांता का विवाह श्रृंगी ऋषि से हुआ था। वे श्रीराम की बड़ी बहन थीं। वह राजा दशरथ और रानी कौशल्या की सबसे बड़ी संतान थीं। हालांकि, कौशल्या ने अपनी पुत्री को बड़ी बहन वर्षिणी को गोद दे दिया था। दरअसल, महर्षि विभाण्डक के पुत्र श्रृंगी ऋषि अपनी तपस्या व ज्ञान के लिए प्रसिद्ध थे। अंग देश के राजा रोमपाद के राज्य में पड़े सूखे को समाप्त करने के लिए श्रृंगी ऋषि को बुलाया गया था। उनके यज्ञ से वर्षा हुई, जिससे प्रसन्न होकर रोमपाद और उनकी पत्नी वर्षिणी ने अपनी दत्तक पुत्री शांता का विवाह उनसे करवा दिया। इस तरह, श्रृंगी ऋषि भगवान श्रीराम के बहनोई भी हुए। उन्हीं के यज्ञ से राजा दशरथ का वंश आगे बढ़ा। दूसरी कहानी महाभारत काल से है। जब पांडव को 12 वर्षों का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास हुआ था तो कुंती अपने पांचों पुत्रों और पुत्रवधु द्रौपदी के साथ खड़गपुर के जंगल में आयी थीं। बाद में अज्ञातवास के दौरान भीम इसी जंगल में ठहरा। उसी दौरान हिडिम्बा से उनका प्रेम विवाह हुआ और उन दोनों से घटोत्कच का जन्म हुआ। महाभारत की लड़ाई में पिता-पुत्र दोनों की वीरता की कहानी उल्लेखित है। इसके अलावा मणि नदी के किनारे शाही मस्जिद, मुरली मनोहर ठाकुरबाड़ी भी पौराणिक महत्ता को दर्शाता है। इनसे भी कई कहानियां जुड़ी हुई हैं। (पंचायत से पार्लियामेंट तक की खबरों के लिए Visit us : www.mukhiyajee.com तथा विज्ञापन के लिए व्हाट्सअप करें 9507777555 पर)

राजनीतिक थाती : राजनीति के क्षेत्र में भी यह धरती आजादी के समय से ही काफी उर्वर रही है। आजादी के पहले यहां का छोटा-सा घोषपुर गांव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। यह गांव आंदोलनकारियों का सेंटर और शेल्टर दोनों था। यहां स्वतंत्रता सेनानियों की रणनीति भी बनती थी और उन्हें पनाह भी मिलता था। उस आंदोलन में गांव के जंग बहादुर सिंह, हरि सिंह, नरेंद्र सिंह, परमानंद सिंह सहित मिलकी के बनारसी बाबू सहित अन्य ने अहम योगदान निभाया। बता दें कि केबी सहाय जब बिहार के सीएम थे, उस समय परमानंद सिंह मुंगेर जिला कांग्रेस कमिटी में उपाध्यक्ष थे। इनके अलावा भी बहुतों ने आंदोलन को मजबूत बनाया, लेकिन वे सब गुमनाम गली के सितारे हो गए। लिखित में बहुत कुछ नहीं मिल पाता है। इतना ही नहीं, आजादी के बाद भी बिहार पॉलिटिक्स में हवेली खड़गपुर अहम रोल निभा रहा है। बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीबाबू (डॉ श्री कृष्ण सिंह) इसी विधानसभा क्षेत्र से जीते थे और वर्तमान उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भी इसी क्षेत्र से आते हैं। दरअसल, श्रीबाबू के समय हवेली खड़गपुर विधानसभा क्षेत्र था और 2008 के परिसीमन में यह विलुप्त हो गया। इसका आधा भाग जमालपुर और आधा भाग तारापुर विधानसभा क्षेत्र में चला गया। इसी तारापुर क्षेत्र के विधायक हैं सम्राट चौधरी। लगातार दूसरी बार उपमुख्यमंत्री बने हैं और गृह विभाग भी उन्हीं के पास है। ये इसके पहले नगर विकास मंत्री, कृषि मंत्री व पंचायती राज मंत्री रह चुके हैं। इन दोनों के बीच नरेंद्र सिंह, शमशेर जंग बहादुर सिंह, राजेंद्र प्रसाद सिंह, जय प्रकाश नारायण यादव आदि यहां से विधायक चुने जाने पर विभिन्न विभागों के मंत्री बने थे। यहां से अनंत सत्यार्थी भी विधायक बने, लेकिन वे मंत्री पद पर नहीं पहुंच सके थे। मिलकी गांव के बनारसी सिंह मुंगेर के पहले सांसद बने थे। वहीं गौरवडीह के नंदकुमार सिंह कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के पद पर 11 वर्षों तक काबिज रहे। (www.raajneetikadda.com तथा विज्ञापन के लिए व्हाट्सअप करें 9507777555 पर)

प्राकृतिक थाती : प्राकृतिक थाती में तो इस शहर का भूतकाल भी मजबूत रहा है व वर्तमान तो और भी मजबूत है। पहले भीमबाँध की बात करते हैं। इसी आलेख में इसकी धार्मिक महत्ता की चर्चा हमने की है। यह पर्यटन की दृष्टि से भी अतिमहत्वपूर्ण है। सबसे बड़ी बात कि यहां गरम पानी की बहती हुई नदी है, जबकि कुछ जिलों में गरम पानी का कुंड है। बिहार के लोकप्रिय पर्यटक स्थलों की सूची में एक नाम इसका भी है। जाड़े के मौसम में यहां काफी भीड़ लगती है। खासकर दिसंबर और जनवरी में यह सैलानियों का पर्यटक केंद्र बन जाता है। प्रकृति की गोद में अपनी नैसर्गिक छटा बिखेरने वाला भीमबाँध देश के किसी हिल स्टेशन से कम नहीं है। यहां की प्राकृतिक फिजाएं और खूबसूरत पहाड़ी श्रृंखला पर्यटकों को खूब लुभाती हैं। यहां दूर-दूर से सैलानी इस झील की मनमोहक फिजाओं का दीदार करने और पिकनिक मनाने पहुंचते हैं। इसके अलावा गरम जल स्रोत के लिए ऋषि कुंड की भी व्यापक महत्ता है। पहाड़ी और जंगलों से घिरी हरियाली इसकी खूबसूरती को चार चांद लगाता है। यहां जाड़े के मौसम के अलावा मलेमास मेला लगता है, जो हिंदू कैलेंडर के अनुसार हर तीन वर्ष पर आता है। इसकी भी धार्मिक चर्चा हम ऊपर कर चुके हैं। गरम पानी के जलस्रोत के लिए भौराकुंड और रामेश्वर कुंड भी काफी लोकप्रिय है। हालांकि, रामेश्वर कुंड जाना आसान नहीं है, जबकि भौराकुंड का रास्ता प्रशासनिक स्तर पर इन दिनों बन गया है। भीमबांध जाने के क्रम में आपको ‘सवा लाख बाबा’ का एक छोटा मंदिर है। सुरक्षित यात्रा के लिए लोग यहां मन्नत मांगते हैं। बिहार का नैनीताल माना जाने वाला खड़गपुर झील तो यहां के लिए सदाबहार और जीवंत धरोहर है। 1876 में इसे दरभंगा महाराज ने सिंचाई के उद्देश्य से बनाया था। इसका फायदा 1967 में मिला। उस साल आए अकाल से पूरा बिहार त्रस्त था, लेकिन खड़गपुर इस त्रासदी से अछूता रहा। नववर्ष और मकर संक्रांति में काफी संख्या में सैलानी झील पर पिकनिक मनाने को पहुंचते हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार बुकानन ने खड़गपुर झील की तुलना स्विट्जरलैंड के किलनरी झील से की थी। जहां तक गरम पानी के स्रोत की बात है तो भीमबांध, ऋषिकुंड, भौराकुंड के अलावा भी कई और लोकेशन हैं, जिन पर प्रशासन को काम करने की जरूरत है। (www.mukhiyajee.com पर विज्ञापन के लिए 9507777555 पर व्हाट्सअप करें)




ऐतिहासिक थाती : हवेली खड़गपुर की बात हो और राजा-रानी तालाब का जिक्र नहीं करना बेईमानी होगा। दरअसल, यहां का इतिहास भी काफी बुलंद है। खड़गपुर 14 राजाओं की राजधानी रहा है और इसके अंतिम हिंदू राजा संग्राम सिंह हुए। उन्होंने मुगल आक्रमणकारियों के खिलाफ अंतिम सांस तक लड़ाई लड़े। उनकी शहादत के बाद रानी ज्योतिर्मयी भी मुगलों से बचाने के लिए अपनी शहादत दे दी। कहा जाता है कि उनकी पांचों बेटियां अपनी आबरू बचाने के लिए पहाड़ पर से कूद कर जान दे दी थी। आज भी जंगल के अंदर वह जगह ‘हा-हा पंचकुमारी’ के नाम से ख्यातिलब्ध है। भौराकुंड जाने के क्रम में वह रास्ते में पड़ता है। बाद में मुगल के हावी होने पर अंतिम राजा टोडरमल बना। लेकिन वह अपनी ऐय्याशी की वजह से सबकुछ गंवा बैठा। हटिया पर आज भी जीर्ण-शीर्ण हालत में खंडहर के कुछ अवशेष बचे हुए हैं। कहा जाता है कि वहां उनका रंगमहल था। रियासत काल में ही खड़गपुर-तारापुर मार्ग पर बना राजा-रानी तालाब आज भी उन दिनों के इतिहास को संजोये हुए हैं। उस काल में राजा और रानी के स्नान के लिए अलग-अलग तालाब बनाये गये थे। इतिहास के बीच विश्वप्रसिद्ध चित्रकार आचार्य नंदलाल बसु का जन्म इसी माटी में हुआ था। शांति निकेतन ने उन्हें मास्टर मोशाय का नाम दिया। उन्हीं के बनाये चित्र संविधान की किताब में हर अध्याय में है। इनके अलावा राम प्रसाद साधक भी इस माटी के साहित्यिक थाती ही हैं। भले ही उनका देहावसान हुए वर्षों हो गया, लेकिन उनके यश पताका से आज भी हवेली खड़गपुर गौरवान्वित है। दरअसल, साधक जी राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर के काव्य गुरु थे। इसका जिक्र दिनकर जी ने अपनी आत्मकथा में किया है।
विकास के मुहाने पर खड़गपुर : जनसंख्या में वृद्धि, प्रशासनिक दबाव और विकास की नयी चुनौतियों के बीच हवेली खड़गपुर ने खुद को बदला, ढाला और आगे बढ़ाया। ग्रामीण और शहरी जरूरतों के संतुलन के साथ योजनाओं का क्रियान्वयन इसकी बड़ी उपलब्धियों में शामिल रहा है। स्थापना दिवस केवल अतीत को देखने का अवसर नहीं है, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने का भी क्षण है। अनुमंडल के साढ़े तीन दशक की यह यात्रा बताती है कि सही नीति, निरंतर प्रशासनिक प्रयास और जन सहयोग से क्षेत्रीय विकास को नयी ऊंचाइयों तक ले जाया जा सकता है। हवेली खड़गपुर अनुमंडल अपने अतीत पर गर्व करता है और आने वाले वर्षों में और अधिक सशक्त, समावेशी और विकासोन्मुख बनने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। आज शायद ही कोई गांव हो, जहां पक्की सड़क या बिजली नहीं पहुंची हो। जंगल से सटे गांवों में विकास की रोशनी ‘चमक’ ही नहीं रही है, बल्कि ‘जगमगा’ रही है। उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की पहल पर भीमबांध और खड़गपुर झील सहित अन्य पिकनिक स्पॉट का प्रारूप तैयार हो रहा है। भीमबांध को तो विश्वस्तरीय नक्शे पर पहुंचाया जाएगा। यहां का अनुमंडलीय अस्पताल भी अब देखने लायक हो गया है। लोगों को उम्मीद है कि उसी स्तर से इलाज भी होगा। मुंगेर-जमुई वाया खड़गपुर मार्ग को भी फोर लेन बनाने की बात चल रही है। यदि ऐसा होता है तो क्षेत्र के लोगों को काफी राहत होगी और इलाके का विकास होगा।


दंश और उम्मीद : बेशक खड़गपुर का विकास लगातार हो रहा है। लेकिन, इसमें चार चांद लगाने के लिए कुछ और विकास की जरूरत है। इसी में जितनी जल्दी खड़गपुर-जमुई और खड़गपुर-तारापुर फोर लेन तैयार हो जाये, उतना जल्दी क्षेत्र का विकास होगा। एक उम्मीद यह भी है कि बरियारपुर-जमुई वाया खड़गपुर रेलवे लाइन को सरकार पूरा कर अपना वादा निभाए। वहीं, लोगों को इस बात का घोर दुख है कि हवेली खड़गपुर विधानसभा क्षेत्र 2008 के परिसीमन में विलुप्त हो गया। 2028 में फिर से परिसीमन होने वाला है। यहां की जनता को उम्मीद है कि हवेली खड़गपुर विधानसभा क्षेत्र फिर से अस्तित्व में आ सकता है। एक दंश यह भी है कि आज सोशल मीडिया और मोबाइल के दौर में यहां का सिनेमा हॉल बंद हो गया। एक समय था, जब ज्योति टॉकीज में सिनेमा देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुँचते थे और टिकट के लिए मार होती थी; वह सब केवल यादों में हैं। इस सिनेमा हॉल का उद्घाटन 1971 में तत्कालीन जिलाधीश शिव कुमार श्रीवास्तव ने किया था। इसकी दुर्लभ तस्वीर सिनेमा हॉल के मालिक स्व नंदकिशोर केशरी के पुत्र राजकिशोर उर्फ मंटू केशरी ने मुखियाजी डॉट कॉम को उपलब्ध करायी है। वर्ष 2000 की बाढ़ त्रासदी लोग भूले नहीं होंगे। अत्यधिक बारिश की वजह से खड़गपुर झील का एक डैम टूट गया था। इससे इलाके को बाढ़ त्रासदी का भीषण संकट झेलना पड़ा था। यह भी दुःखद है कि जिस उद्देश्य से दरभंगा महाराज ने नहर प्रणाली को शुरू किया था, वह आज लगभग ध्वस्त हो गया है। किसानों को अब अपने दम पर सिंचाई करनी पड़ती है। हालांकि, कुछ क्षेत्रों में सिंचाई प्रणाली अब भी बची हुई है। लेकिन इस क्षेत्र के लिए सबसे बड़ी दुखदायी घटना रही मुंगेर के तत्कालीन एसपी सुरेंद्र बाबू सहित 5 जवानों की हत्या। ये सभी भीमबांध के जंगल में नक्सली माइंस ब्लास्ट में मारे गए थे। यह ऐसा घाव है, जो कभी भर नहीं पाएगा। इसी दौरान लोगों का भीम बांध जाना बंद हो गया था। वहीं एक अन्य मामले में तत्कालीन आरक्षी उपाधीक्षक (वर्तमान में सेवानिवृत डीआईजी) की व्यक्तिगत पहल पर आचार्य नंदलाल बसु की प्रतिमा तो स्थापित कर दी गयी है, लेकिन उनका जन्म स्थान आज भी उद्धारक की बाट जोह रहा है। इसके अलावा लोगों की मांग है कि खड़गपुर झील की दोनों पहाड़ियों को जोड़ने के लिए सरकार की पहल पर रोपवे बनाया जाए, साथ ही सभी स्थानीय पर्यटन केंद्रों को एक सर्किट में जोड़ दिया जाए तो बेशक ‘पर्यटन हब’ के रूप में हवेली खड़गपुर को जबरदस्त लाभ मिलेगा। खास बात यह भी शहर के बीचोबीच मणि नदी है। यदि व्यवस्थित ढंग से इसमें बोटिंग की सुविधा बहाल की जाए तो यह बड़े शहरों को भी मात दे देगा, साथ ही राजस्व में भी इजाफा होगा। जिस तरह गंगा का पानी खड़गपुर झील में लाने की बात चल रही है, इससे यह भी संभव है। और हां, खड़गपुर को इस बात पर गर्व है कि यहां महात्मा गांधी अकेले भी और अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी के साथ भी कई दफे आए थे। मल्टीपर्पस स्कूल के वरीय शिक्षक मनोज सिंह ने स्कूल कैंपस में महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी, दोनों की मूर्ति एक साथ स्थापित की है। उन्होंने बताया कि दोनों की एक साथ मूर्ति इसके अलावा बिहार में और कहीं नहीं है। और हां, इस बात पर भी खड़गपुर काफी खुश है कि यहां की बेटी मोना दास अमेरिका में काउंसिलर (सांसद) रही हैं।

क्या कहते हैं पुराने अनुमंडल पदाधिकारी
हवेली खड़गपुर के दूसरे अनुमंडल पदाधिकारी रहे विष्णु कुमार इन दिनों झारखंड सेवा में अपर सचिव रैंक से रिटायर हुए हैं। वे अंतिम पोस्टिंग के रूप में चाईबासा के डीडीसी रहे। उन्होंने हवेली खड़गपुर के स्थापना दिवस पर चौंक पड़े और भावुक पलों की यादों में डूब गए। उन्होंने फोन पर मुखियाजी डॉट कॉम को बताया कि वह अनुमंडल का शुरुआती दौर था। सारी चीजों को व्यवस्थित करना भी बड़ी चुनौती थी। विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों के अलावा स्थानीय लोगों का भरपूर साथ मिला। आज वहां का नजारा हमें पूरी तरह याद है। वहां के लोगों को शुभकामनाएं हैं।

हवेली खड़गपुर के तीसरे अनुमंडल पदाधिकारी उपेंद्र नारायण उरांव भी बिहार बंटने के बाद झारखंड प्रशासनिक सेवा में चले गए। वे वहां विशेष सचिव संवर्ग से रिटायर हुए हैं। आज घरेलु जिंदगी का लुत्फ उठा रहे हैं। लगभग दो दशक के बाद फोन पर अचानक मेरी आवाज सुनकर वे चौंक पड़े। उनसे अंतिम बार मेरी मुलाकात 2000 के आसपास झंझारपुर में हुई थी। तब वे वहां के एसडीएम थे। उन्होंने सबसे पहले खड़गपुर के लोगों को स्थापना दिवस की बधाई दी। कहा- स्थानीय लोगों का भरपूर समर्थन मिला। पहाड़ों के किनारे बसा हवेली खड़गपुर एक जीवंत शहर है। साहित्य तो वहां के रग-रग में बसा है। सच में वहां काम करने में बड़ा मजा आया।

इसी तरह, 1998-99 में एसडीएम रहे विपिन कुमार सिन्हा ने बताया कि खड़गपुर की यादें आज भी मेरे मन में ताजा है। पत्रकारों के साथ ही हमें पुलिस पदाधिकारियों का भी साथ मिला। जंगल के गांवों में उस दौरान एक बीमारी फैल गयी थी तो वहां के पीड़ितों के बीच दवा का वितरण सामाजिक स्तर पर कराया गया था। इसमें उन्हें बाजार के लोगों का काफी सहयोग मिला था। विपिन सिन्हा स्वास्थ्य विभाग के निदेशक के पद से रिटायर कर इन दिनों रांची में रह रहे हैं।

अब बात तत्कालीन एसडीएम रहे राशिद आलम की। वे वर्तमान में पटना में जिला पंचायती राज पदाधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। वे उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि तब जंगल एरिया में नक्सल प्रभाव काफी था। मेरी पोस्टिंग के ठीक पहले मुंगेर के तत्कालीन एसपी केसी सुरेंद्र बाबू की नक्सलियों ने हत्या कर दी थी। उसके बाद लॉ एंड ऑर्डर को बनाये रखना बड़ी चुनौती थी। बख्तरबंद गाड़ियों से निरीक्षण में निकलना पड़ता था। जनता का स्नेह मिलता रहा। खासकर छठपर्व के मौके पर युवाओं का सहयोग घाटों की सफाई में काफी मिलता था।

अब बात करते हैं वसीम अहमद की। वे भी एसडीएम रहे हैं और वर्तमान में पंचायती राज विभाग में संयुक्त सचिव सह विशेष कार्य पदाधिकारी हैं। सचिवालय में पोस्टेड वसीम अहमद हवेली खड़गपुर की चर्चा पर काफी प्रफुल्लित होकर कहते हैं कि वहां काम करना काफी अच्छा रहा। शहर की आबो-हवा इतनी अच्छी है कि शहर से मन कभी उबा नहीं। पर्व-त्यौहार पर भी लोग बढ़-चढ़ कर मदद को सामने आते थे। कुल मिलाकर कार्यकाल काफी अच्छा रहा।

खड़गपुर में 2017 से 2021 के बीच लगभग साढ़े तीन साल तक अनुमंडल पदाधिकारी के रूप में काम करने वाले संजीव कुमार वर्तमान में सीतामढ़ी में एडीएम के पद पर पोस्टेड हैं। वे कहते हैं कि हमें अपने कार्यकाल में खुलकर कार्य करने का मौका मिला। यह हमारे लिए खुशी की बात है कि खड़गपुर से उसी दौरान नक्सल गतिविधि लगभग खत्म हो गयी। भीमबांध जाना फिर से शुरू हो गया। हमने तो भीमबांध और खड़गपुर झील का काफी चक्कर लगाया। कहें तो मैं प्रशासनिक कार्यों को लोगों के बीच एन्जॉय के रूप में किया। लोगों का भरपूर साथ मिला।

बिहार प्रशासनिक सेवा के अधिकारी आदित्य कुमार झा भी वहां एसडीएम रह चुके हैं। झा जी वर्तमान में बिहार के उपमुख्यमंत्री सह गृहमंत्री सम्राट चौधरी के ओएसडी हैं। वे भी सबसे पहले हवेली खड़गपुर के लोगों को शुभकामनाएं दी। कहा कि लॉ एंड ऑर्डर से लेकर प्रशासनिक तक के कार्यों में किसी प्रकार की प्रॉब्लम नहीं हुई। ग्राउंड लेवल पर काम हुआ। पानी की समस्या हो या बिजली की, जनता को उससे निजात दिलाने की सार्थक कोशिश हुई। लोगों ने भी दिल से साथ निभाया। वहां पत्रकारों का भी अच्छा साथ मिला। जनता की सुविधाओं को प्राथमिकता दी गयी।

वर्तमान एसडीओ राजीव रोशन की अब बात करते हैं। ये भी बिहार प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं और जल्द ही एडीएम बनने वाले हैं। वे कहते हैं कि यह जानकर खुशी हुई कि यह अनुमंडल अपने सफर का 35 वर्ष पूरा कर लिया और 36वें साल में प्रवेश कर गया। इसका गवाह बनना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने मुखियाजी डॉट कॉम को बताया कि लॉ एंड ऑर्डर से लेकर प्रशासनिक कार्यों तक में कोई परेशानी नहीं है। यहां का नैसर्गिक नजारा भी देखने लायक है। खड़गपुर झील तो बिलकुल स्विट्जरलैंड की झील जैसी है। जब हमने बताया कि इतिहासकार बुकानन ने भी इस झील की तुलना वहां की किलनरी झील से की है तो उन्हें खुशी का ठिकाना नहीं रहा। फिर हमने बताया कि इसका जिक्र मुंगेर गजेटियर में भी है। उन्हें यह भी बताया कि जब हम 1994 में हवेली खड़गपुर से हिंदुस्तान अखबार का संवाददाता था तो इस पर काफी स्टोरी की थी। राजीव रोशन ने भी यहां की जनता को 35वें स्थापना दिवस की बधाई दी।

अब ऐसी शख्सियत की बात करते हैं, जो वहां के लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। अनुमंडल के जन्म के साथ ही उनका प्रोफेशनल करियर शुरू हुआ है। वर्तमान में वे सीतामढ़ी के सिविल सर्जन हैं। हम बात कर रहे हैं डॉ अखिलेश कुमार की। उन्होंने भी मुखियाजी डॉट कॉम से खुलकर बात की है। उन्होंने कहा कि 30-32 वर्षों में खड़गपुर ने हमें पूरा साथ दिया। शहरी क्षेत्र हो ग्रामीण क्षेत्र, वे हमें परिवार की तरह मानते हैं। प्रकृति की गोद में बसा यह शहर बिहार के लिए वरदान है। हम उम्मीद करते हैं कि जिस तरह इसका इतिहास बुलंद है, उसी बुलंदी पर यह फिर से पहुंचे…। (नोट : इस रिपोर्ट में कुछ छूटा भी हो, तो पाठक 9507777222 पर व्हाट्सअप कर अपना सुझाव-सलाह दे सकते हैं। अच्छा लगे या खराब प्रतिक्रिया जरूर शेयर करें। वे चाहें तो इस स्टोरी को अपने फेसबुक पर भी शेयर कर सकते हैं, इसमें कोई मनाही नहीं है…)






