गणतंत्र दिवस 2026 : जलेबी की मिठास में घुला बिहार, बस यह परंपरा जीवित रहे

Rajesh Thakur । Patna
हमारा गणतंत्र 76 साल का हो गया। पूरा देश इसका 77वां समारोह धूमधाम से मना रहा है। इसमें बिहार किसी से पीछे नहीं है। वैशाली के रूप में देश को पहला गणतंत्र बिहार ने ही दिया है। यहां के शहरों से ज्यादा गांवों की माटी में इसकी खुशबू घुली हुई है। कहीं खेत की मेड़ से, कहीं पंचायत की चौखट से, तो कहीं स्कूल के मैदान से; हर जगह ‘जन-गण-मन…’ का सुखद अहसास हो रहा है। इसके लिए न्योता-पेहानी से लेकर कार्ड तक भेजे जा रहे हैं। अब तो सोशल मीडिया का दौर है। लोग व्हाट्सअप पर ज्यादा भरोसा करते हैं। यही तो गणतंत्र की असली तस्वीर है, जो चमकदार मंचों से नहीं, बल्कि देहात की धूल भरी पगडंडियों से होकर देश के मन तक पहुंचती है।

इन सबके बीच बिहार में आजादी के समय से ही एक और परंपरा चली आ रही है, और वह है जलेबी खाने और खिलाने की परंपरा। समय के साथ इसमें भी बदलाव आने लगा है। संस्थानों में जलेबी को ‘रिप्लेस’ किया जा रहा है। उसकी जगह रसगुल्ले-समोसे लेने लगे हैं। लेकिन गांवों में यह परंपरा बरकरार है। दरअसल, यह केवल मिठाई भर नहीं है, बल्कि हमारी संस्कृति का प्रतीक बन गया है। फिर गणतंत्र दिवस हो या स्वतंत्रता दिवस, जलेबी राष्ट्रीय त्योहारों पर जीवन का अहम हिस्सा बन गयी है। यह परंपरा कैसे शुरू हुई, इसका कोई साक्ष्य नहीं है। किंतु बिहार में तिरंगा फहराने के बाद गरमागरम जलेबी के आनंद का नजारा आम है। खासकर यह नजारा गांवों में ज्यों-का-त्यों जीवित है। फिर जलेबी किसी एक वर्ग की नहीं रही। यह जितना झोपड़ी वालों को पसंद है, उतना ही महल वालों को। जितनी साइकिल वाले चाव से खाते हैं, उतने चाव से ही BMW वाले भी स्वाद लेते हैं।

खास बात कि महंगाई के इस दौर में जलेबी की अहमियत और बढ़ गयी है। जहां अच्छी मिठाइयों के दाम आज 800 रुपये किलो से ऊपर पहुंच चुके हैं, और कई जगह यह 1200 से 1600 रुपये तक बिक रही हैं, वहीं जलेबी अब भी 200 रुपये से नीचे मिल जाती है। अब तो यह राष्ट्रीय त्योहारों के साथ ही ‘रोज की परंपरा’ में भी घुल-मिल गयी है। बहरहाल, एक समय था, जब पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक इसके मिठास की तूती बोलती थी। हालांकि, पंचायतों में इसका जलवा अब भी बरकरार है। हां, समय के साथ कुछ संस्थानों ने विकास के नाम पर परंपरा में बदलाव की कोशिश की; कहीं मिठाई का नया नाम, कहीं समोसा और कहीं दिखावटी नाश्ता। लेकिन मुखियाजी डॉट कॉम की यही सलाह और आग्रह है कि जब जलेबी है तो उसे जलेबी ही रहने दिया जाए। परंपरा को बदलिए मत, उसे निभाइए। जलेबी बाहर से भले टेढ़ी-मेढ़ी हो, लेकिन अंदर से उतनी ही मीठी और सच्ची है जितना हमारा लोकतंत्र। 2026 और भी बेहतर हो, इसी उम्मीद के साथ इस गणतंत्र दिवस पर तिरंगे के साथ जलेबी की खुशबू भी बनी रहे।